आकाशगंगा में खुला तारों का छिपा रहस्य, एक समझा जाने वाला समूह निकला दो अलग-अलग तारापुंज

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  • Nov 05, 2026
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भारतीय खगोलविदों ने 4,892 प्रकाश वर्ष दूर स्थित यूबीसी-63 की नई पहचान की 21 और 562 मिलियन वर्ष पुराने दोनों तारापुंज 

छह मिलियन वर्ष पहले महज 23 प्रकाश वर्ष की दूरी पर आ गए थे

 

नई दिल्ली, 5 नवंबर 2026। आकाशगंगा में तारों की दुनिया से जुड़ा एक नया रहस्य भारतीय खगोलविदों ने उजागर किया है। वैज्ञानिकों ने अब तक एक ही तारापुंज माने जा रहे यूबीसी-63 को दो अलग-अलग तारकीय समूहों के रूप में पहचानकर उसकी नई परिभाषा दी है। यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के गैया मिशन से प्राप्त आंकड़ों और उन्नत कंप्यूटिंग तकनीकों की मदद से हुई इस खोज में सामने आया है कि दोनों समूहों की उम्र में करीब 541 मिलियन वर्ष का अंतर है। लगभग छह मिलियन वर्ष पहले ये एक-दूसरे के बेहद करीब आ गए थे। इस खोज से आकाशगंगा में तारापुंजों की गति, गुरुत्वाकर्षण संबंधी अंतःक्रियाओं और उनके विकास को समझने का नया रास्ता खुला है।
एक समूह नहीं, दो अलग-अलग तारापुंज
पृथ्वी से लगभग 4,892 प्रकाश वर्ष दूर स्थित यूबीसी-63 कम तारों वाला और अपेक्षाकृत कमजोर गुरुत्वाकर्षण बंधन वाला गैलेक्टिक ओपन क्लस्टर माना जाता था। भारतीय शोधकर्ताओं ने इसके तारों के निर्माण, संरचना और गतिशीलता का अध्ययन शुरू किया तो पता चला कि यह वास्तव में यूबीसी-63ए और यूबीसी-63बी नाम के दो अलग-अलग तारापुंजों से मिलकर बना है। दोनों समूह हाल के खगोलीय इतिहास में एक-दूसरे के बेहद करीब से गुजरे हैं।
इस अध्ययन में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के इंस्पायर वरिष्ठ शोध अध्येताओं, गुवाहाटी विश्वविद्यालय और विभाग के स्वायत्त संस्थान भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान के शोधकर्ता शामिल थे। दल ने यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के गैया मिशन के आंकड़ों का विश्लेषण किया। गैया आकाशगंगा में तारों की स्थिति और उनकी गति का अत्यंत सटीक मापन उपलब्ध कराता है।
रंग और चमक ने खोला दो समूहों का राज
शोधकर्ताओं ने यूबीसी-63 के तारों की चमक और रंगों का अध्ययन किया। कलर-मैग्निट्यूड डायग्राम यानी रंग-परिमाण आरेख में तारों के दो अलग-अलग क्रम दिखाई दिए। यह खगोलीय उपकरण तारों की चमक और रंग के आधार पर उनके विकास के चरणों को समझने में मदद करता है। दो अलग-अलग क्रम मिलने से संकेत मिला कि यूबीसी-63 में दो स्वतंत्र तारकीय प्रणालियां मौजूद हैं।
इसके बाद मशीन लर्निंग तकनीकों और उच्च प्रदर्शन गणना पर आधारित उन्नत गतिक सिमुलेशन से तारों की गति तथा अन्य विशेषताओं का विश्लेषण किया गया। इससे दो अलग-अलग तारापुंजों की मौजूदगी की पुष्टि हुई।
एक की उम्र 21, दूसरे की 562 मिलियन वर्ष
अध्ययन में दोनों तारापुंजों की उम्र में बड़ा अंतर सामने आया है। यूबीसी-63ए अपेक्षाकृत नया समूह है, जिसकी उम्र लगभग 21 मिलियन वर्ष आंकी गई है। वहीं यूबीसी-63बी करीब 562 मिलियन वर्ष पुराना है। दोनों की उम्र में लगभग 541 मिलियन वर्ष का अंतर इस बात का संकेत है कि इनका निर्माण एक साथ नहीं हुआ था और इनका विकास क्रम भी अलग-अलग रहा है।
23 प्रकाश वर्ष तक सिमट गई थी दूरी
शोधकर्ताओं ने आकाशगंगा में दोनों तारापुंजों की गति का सिमुलेशन कर उनके निकट आने की ऐतिहासिक घटना का भी पता लगाया। गणना के अनुसार, जब नया तारापुंज बना था, तब दोनों समूहों के बीच लगभग 60 पारसेक यानी 196 प्रकाश वर्ष की दूरी थी। करीब छह मिलियन वर्ष पहले इनके बीच की दूरी घटकर महज सात पारसेक यानी लगभग 23 प्रकाश वर्ष रह गई थी।
वर्तमान में दोनों समूह लगभग 26 पारसेक यानी 85 प्रकाश वर्ष की दूरी पर हैं। उनकी गति के अध्ययन से स्पष्ट हुआ कि वे गुरुत्वाकर्षण के कारण एक-दूसरे से बंधे हुए नहीं हैं। निकट आने के बाद अब दोनों तारापुंज एक-दूसरे से दूर जा रहे हैं।
आकाशगंगा के विकास को समझने में मिलेगी नई मदद
तारापुंज आकाशगंगाओं के निर्माण की महत्वपूर्ण इकाइयां हैं। गैस और धूल के विशाल भंडारों में जन्म लेने वाले ये तारकीय समूह अपने गुरुत्वाकर्षण और आसपास के आकाशगंगीय वातावरण के प्रभाव में विकसित होते हैं। दो तारापुंजों का एक-दूसरे के इतने करीब से गुजरना दुर्लभ घटना है। ऐसे में इस घटना के बाद उनकी पहचान से वैज्ञानिकों को यह समझने का अवसर मिला है कि गुरुत्वाकर्षण संबंधी अंतःक्रियाएं तारापुंजों की संरचना, गति और दीर्घकालिक विकास को किस तरह प्रभावित करती हैं।
यह शोध आधुनिक खगोलीय सर्वेक्षणों की क्षमता भी प्रदर्शित करता है। गैया जैसे मिशन तारों की वास्तविक स्थिति और गति के आधार पर ऐसी छिपी संरचनाओं को सामने ला रहे हैं, जिन्हें केवल आकाश में तारों की द्वि-आयामी तस्वीर देखकर पहचानना कठिन है।
अंतरराष्ट्रीय शोध दल ने किया अध्ययन
यह शोध खगोलीय पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। शोध दल में गुवाहाटी विश्वविद्यालय के इंस्पायर वरिष्ठ शोध अध्येता सम्राट बिस्वास, बिमान जे. मेधी, भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान के महेश्वर गोपीनाथन और राम सागर सहित भारत तथा विदेश के कई वैज्ञानिक शामिल रहे। इनमें इटली की कैटेनिया खगोलीय भौतिकी वेधशाला के सर्जियो मेसिना, शंघाई नॉर्मल यूनिवर्सिटी के झानपेंग झू, शंघाई खगोलीय वेधशाला की सोंगमेई किन, कपास विश्वविद्यालय के सुकांत देब, गुवाहाटी विश्वविद्यालय के इंस्पायर शोध अध्येता ए.एच. शेख, असम विश्वविद्यालय के एच.एस. दास और टोक्यो विश्वविद्यालय के मोटोहाइड तमुरा शामिल हैं।

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