भारत की समुद्र से अंतरिक्ष तक छलांग: 2028 में 6,000 मीटर गहराई में उतरेगा पहला मानवयुक्त डीप-सी मिशन

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  • Nov 04, 2026
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आईपीआरडी-2026 में डॉ. जितेंद्र सिंह ने बताई महासागर अनुसंधान की रणनीति

 स्वदेशी तकनीक, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और निजी निवेश से वैश्विक नेतृत्व का लक्ष्य
डीप ओशन मिशन बनेगा विकसित भारत-2047 के आर्थिक विकास का नया आधार

अनुसंधान एवं नवाचार के लिए 1 लाख करोड़ रुपये के कोष का भी उल्लेख


नई दिल्ली, 4 नवंबर 2026। भारत अंतरिक्ष में मानव भेजने की तैयारी के साथ अब समुद्र की अतल गहराइयों में भी अपनी ताकत दिखाने जा रहा है। वर्ष 2028 तक देश का पहला मानवयुक्त डीप-सी मिशन तीन समुद्र-अन्वेषकों को 6,000 मीटर की गहराई तक ले जाने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है। केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि स्वदेशी तकनीक, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और वैश्विक स्तर पर साझा अनुसंधान के जरिए भारत महासागर विज्ञान और अन्वेषण में प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता विकसित कर रहा है। उन्होंने यह बात रक्षा मंत्रालय के अधीन राष्ट्रीय समुद्री फाउंडेशन की ओर से आयोजित हिंद-प्रशांत क्षेत्रीय संवाद (आईपीआरडी)-2026 को संबोधित करते हुए कही।
समुद्रयान से 6,000 मीटर गहराई तक पहुंचने की तैयारी
डॉ. सिंह ने बताया कि चेन्नई स्थित राष्ट्रीय महासागर प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईओटी) ने मध्य हिंद महासागर बेसिन में 5,000 से 6,000 मीटर की गहराई पर परीक्षण करने की क्षमता विकसित कर ली है। ओशन मिनरल एक्सप्लोरर के जरिए जलतापीय सल्फाइड निक्षेपों का उच्च-रिजॉल्यूशन अन्वेषण किया जा रहा है। ऐसे कई निक्षेपों की पहचान पहले ही हो चुकी है।
समुद्रयान मिशन के तहत तैयार मत्स्य सबमर्सिबल तीन समुद्र-अन्वेषकों को 5,000 से 6,000 मीटर की गहराई तक ले जाने में सक्षम होगा। डॉ. सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के संबोधनों में दो बार डीप ओशन मिशन का उल्लेख किया है। यह महासागरीय संसाधनों के रणनीतिक महत्त्व और देश के भविष्य के लिए उनकी प्राथमिकता को दर्शाता है।
अंतरिक्ष और समुद्र में एक साथ भारतीय उपलब्धि की कल्पना
मंत्री ने भारत के मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम और गहरे समुद्र के अन्वेषण के बीच समानता बताते हुए कहा कि देश दोनों क्षेत्रों में उल्लेखनीय समेकन की दिशा में आगे बढ़ रहा है। उन्होंने ऐसी स्थिति की कल्पना की, जब एक भारतीय लगभग 6,000 मीटर की गहराई में समुद्र की यात्रा कर रहा हो और उसी समय कोई दूसरा भारतीय अंतरिक्ष में पहुंच रहा हो। उनके अनुसार, यह भारत की बढ़ती वैज्ञानिक और तकनीकी क्षमता का प्रतीक होगा।
महासागर अनुसंधान में अंतरिक्ष आधारित तकनीक की भूमिका भी लगातार बढ़ रही है। समर्पित उपग्रह महासागरीय रंग, समुद्र की सतह के तापमान और पवन की दिशा एवं गति से जुड़े आंकड़े उपलब्ध करा रहे हैं। इससे समुद्र के व्यापक अवलोकन और भविष्य में महासागरीय पवन तथा सौर ऊर्जा सहित नवीकरणीय ऊर्जा संसाधनों की खोज में मदद मिलेगी।
कई वैज्ञानिक संस्थानों की तकनीक का साझा इस्तेमाल
डॉ. सिंह ने कहा कि भारत के वैज्ञानिक मिशन अब अलग-अलग मंत्रालयों और संस्थानों तक सीमित नहीं हैं। मिशन मोड में महासागर विज्ञान, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, परमाणु विज्ञान, भू-विज्ञान, इलेक्ट्रॉनिक्स और रोबोटिक्स को एक साथ जोड़कर काम किया जा रहा है।
उन्होंने समुद्री जल के विलवणीकरण में परमाणु तकनीक के योगदान का उल्लेख किया। भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र के सहयोग से कल्पक्कम में विलवणीकरण संयंत्र स्थापित किया गया है, जबकि पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के माध्यम से लक्षद्वीप में निम्न-तापमान विलवणीकरण सुविधा विकसित की गई है। ये तकनीकें विशेष रूप से तटीय और द्वीपीय क्षेत्रों में पेयजल उपलब्ध कराने जैसी जरूरतों को पूरा करने में उपयोगी हैं।
महासागर के संसाधनों से आर्थिक मूल्य संवर्धन
डॉ. सिंह ने कहा कि विकसित भारत-2047 के लक्ष्य को हासिल करने के लिए अर्थव्यवस्था में मूल्य संवर्धन के नए स्रोत तलाशने होंगे। महासागरों की गहराइयों में ऐसे अनेक संसाधन हैं, जिनकी अब तक खोज नहीं हुई है या जिनका सीमित अन्वेषण हुआ है। डीप ओशन देश के लिए ऐसा ही एक बड़ा अवसर है।
उन्होंने कहा कि महासागरीय संसाधनों का उपयोग शांतिपूर्ण, सतत और न्यायसंगत तरीके से होना चाहिए। इसके लिए अनुसंधान के साथ संसाधनों के संरक्षण और उनके समान अवसर आधारित उपयोग पर भी ध्यान देना जरूरी है।
हिंद-प्रशांत में साझा ज्ञान और सहयोग पर जोर
मंत्री ने कहा कि महासागर राजनीतिक सीमाओं का पालन नहीं करते। समुद्री प्रदूषण और समुद्र के तापमान में बदलाव जैसे मुद्दों का प्रभाव राष्ट्रीय अधिकार क्षेत्र से बाहर तक पहुंचता है। इसलिए इनके समाधान के लिए देशों के बीच सामूहिक वैज्ञानिक प्रयास जरूरी हैं।
उन्होंने संयुक्त वैज्ञानिक मिशन, अनुसंधान सुविधाओं तक पारस्परिक पहुंच और आंकड़ों के आदान-प्रदान पर आधारित वैश्विक साझेदारियों का आह्वान किया। उनके अनुसार, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग का मार्गदर्शक सिद्धांत ‘एक महासागर, साझा ज्ञान और न्यायसंगत समृद्धि’ होना चाहिए। इस क्षेत्र की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक विविधता को सहयोग मजबूत करने के अवसर के रूप में देखना चाहिए।
उन्होंने क्षेत्रीय सहयोग की प्राथमिकताओं में महासागर अवलोकन से जुड़ी कमियों को दूर करना, चरम मौसमी घटनाओं का पूर्वानुमान बेहतर बनाना, तटीय और द्वीपीय क्षेत्रों के लिए क्षेत्रीय जलवायु सेवा साझेदारियां विकसित करना, जिम्मेदार और सुलभ महासागरीय तकनीक को बढ़ावा देना तथा गहरे समुद्र के अनुसंधान और संसाधनों के न्यायसंगत उपयोग को मजबूत करना शामिल बताया।
अनुसंधान के लिए निजी निवेश को बढ़ावा
डॉ. सिंह ने अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन की स्थापना और अनुसंधान एवं विकास में निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने के लिए घोषित 1 लाख करोड़ रुपये के अनुसंधान, विकास एवं नवाचार (आरडीआई) कोष का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि इस कोष में 50:50 इक्विटी आधारित दृष्टिकोण रखा गया है, ताकि निजी क्षेत्र के हितधारक और निवेशक अनुसंधान तथा उभरती तकनीकों में सरकार के साथ भागीदारी कर सकें।
उन्होंने कहा कि नई तकनीकों और अनुसंधान के क्षेत्रों को विकसित करने के लिए सरकारी विभागों, वैज्ञानिक संस्थानों, निजी कंपनियों और निवेशकों को मिलकर काम करना होगा।
परमाणु ऊर्जा और समुद्री परिवहन में स्वच्छ विकल्प
प्रतिभागियों के सवालों का जवाब देते हुए डॉ. सिंह ने परमाणु ऊर्जा से संचालित पोतों और समुद्री परिवहन में स्वच्छ ऊर्जा की संभावनाओं पर भी बात की। उन्होंने शांति अधिनियम के तहत परमाणु क्षेत्र को हाल ही में निजी भागीदारी के लिए खोले जाने और वर्ष 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा क्षमता हासिल करने के भारत के लक्ष्य का उल्लेख किया।
उन्होंने कहा कि डीप ओशन मिशन के तहत महासागरों से नवीकरणीय ऊर्जा हासिल करने के विकल्प भी तलाशे जा रहे हैं। इनमें सौर पैनल, महासागरीय पवन और तापमान अथवा ऊर्जा प्रवणताओं के जरिए बिजली उत्पादन की संभावनाएं शामिल हैं।
हर साल चल रहा महासागर स्वच्छता अभियान
स्वच्छ भारत अभियान को समुद्रों तक विस्तार देने के सुझाव पर मंत्री ने बताया कि सरकार ने वार्षिक महासागर स्वच्छता अभियान शुरू किया है। स्वतंत्रता के 75 वर्ष पूरे होने के अवसर पर शुरू हुई यह पहल अब नियमित अभियान का रूप ले चुकी है। इसमें तटीय जिलों के प्रशासन, भारतीय नौसेना, भारतीय तटरक्षक बल, गैर-सरकारी संगठनों और अन्य हितधारकों की भागीदारी होती है।
उन्होंने कहा कि समुद्री प्रदूषण किसी एक देश तक सीमित नहीं रहता। महासागरों को स्वच्छ बनाने के प्रयासों से पूरे हिंद-प्रशांत क्षेत्र को लाभ मिलेगा। डॉ. सिंह ने अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों और वैज्ञानिक ज्ञान के जिम्मेदाराना आदान-प्रदान के साथ भारत की स्वदेशी क्षमताओं को मजबूत करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि महासागरीय संसाधनों का शांतिपूर्ण, सतत और न्यायसंगत उपयोग ही विकसित भारत-2047 के राष्ट्रीय लक्ष्य को साकार करने में महत्त्वपूर्ण योगदान देगा।

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