सशक्त राज्य एक सशक्त संघ के निर्माण में योगदान देते हैं:उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन

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  • Oct 22, 2026
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उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने सहकारी संघवाद को बताया जनकल्याण की कुंजी

विधि आयोग ने प्रस्तावित किया ‘सिटिजन फ्रिक्शन टेस्ट’, कानूनों से नागरिकों का समय, खर्च और प्रक्रियात्मक बोझ घटाने पर जोर


नई दिल्ली, 22 अक्टूबर 2026। कानूनों का उद्देश्य केवल व्यवस्था चलाना नहीं, बल्कि नागरिकों को समय पर न्याय देना और उनका जीवन आसान बनाना भी है। इसके लिए केंद्र और राज्यों को मिलकर विधिक सुधार करने होंगे, जबकि राज्यों की संवैधानिक स्वायत्तता और क्षेत्रीय जरूरतों का सम्मान भी जरूरी है। उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने विज्ञान भवन में भारत के 23वें विधि आयोग के राष्ट्रीय सम्मेलन ‘सहकारी संघवाद और विधिक सुधार: राष्ट्रीय और राज्य परिप्रेक्ष्य’ का उद्घाटन करते हुए यह बात कही। उन्होंने कहा कि सशक्त राज्य मजबूत संघ के निर्माण में योगदान देते हैं और सहकारी शासन संवैधानिक आदर्शों को जनकल्याण में बदलने का माध्यम है।

एकरूपता नहीं, साझा लक्ष्यों के लिए सहयोग

उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत की सबसे बड़ी ताकत विविधता में एकता है। संविधान केंद्र की शक्तियों और राज्यों की जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाते हुए राज्यों को उनकी वैध स्वायत्तता भी प्रदान करता है। सहकारी संघवाद का अर्थ हर मामले में एक जैसे कानून बनाना नहीं, बल्कि उन विषयों पर मिलकर काम करना है जहां केंद्र और राज्यों की संवैधानिक जिम्मेदारियां एक-दूसरे से जुड़ती हैं। उन्होंने भारत के विधि आयोग, राज्य विधि आयोगों और राज्यों के विधि विभागों के बीच बेहतर समन्वय, आपसी परामर्श, सर्वोत्तम कार्यप्रणालियों के आदान-प्रदान तथा पुराने कानूनों की व्यवस्थित समीक्षा पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि विकसित भारत-2047 के लक्ष्य के लिए प्रभावी कानून, पारदर्शी संस्थान, कुशल प्रशासन और सभी को न्याय मिलना जरूरी है।

विधिक सुधार की चार प्राथमिकताएं

केंद्रीय विधि एवं न्याय राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अर्जुन राम मेघवाल ने कहा कि विधिक सुधारों में राष्ट्रीय संवैधानिक उद्देश्यों के साथ राज्यों के सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक अनुभवों को भी शामिल करना होगा। उन्होंने चार प्राथमिकताएं रेखांकित कीं—संस्थानों के बीच निरंतर संवाद, साक्ष्य-आधारित एवं भागीदारीपूर्ण सुधार, मानवीय निगरानी के साथ तकनीक का इस्तेमाल और नागरिक-केंद्रित कानूनी ढांचा। संविधान के अनुच्छेद 1 तथा संविधान सभा में डॉ. बी.आर. आंबेडकर के विचारों का उल्लेख करते हुए उन्होंने भारत को ‘राज्यों का संघ’ बताया। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘टीम इंडिया’ की अवधारणा का जिक्र करते हुए कहा कि राष्ट्रीय लक्ष्य और राज्यों का अनुभव मिलकर सुधारों को अधिक प्रभावी बना सकते हैं।
मेघवाल ने कारोबार करने में सुगमता, जीवन जीने में सुगमता और न्याय पाने में सुगमता को एक साथ आगे बढ़ाने की जरूरत बताई। उन्होंने स्पष्ट किया कि कानूनों को सरल बनाते समय नागरिकों के अधिकारों और सुरक्षा उपायों से समझौता नहीं होना चाहिए। उनका कहना था कि सशक्त राज्य, सशक्त भारत, सरल कानून और सुलभ न्याय ही साझा दिशा होनी चाहिए।

कानूनों की ‘नागरिक घर्षण जांच’ का प्रस्ताव

भारत के विधि आयोग के अध्यक्ष और सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी ने कानूनों के वास्तविक प्रभाव को परखने के लिए ‘सिटिजन फ्रिक्शन टेस्ट’ यानी नागरिक घर्षण जांच का प्रस्ताव रखा। इसके तहत आकलन किया जाएगा कि कोई प्रस्तावित कानून नागरिकों का समय और खर्च घटाता है या नहीं तथा प्रक्रियात्मक बोझ कम करता है या बढ़ाता है। उन्होंने राष्ट्रीय और राज्य-स्तरीय विधिक सुधार संस्थानों के बीच साझा कार्यसूची, संयुक्त अध्ययन और कानून लागू होने के बाद उसकी समीक्षा के लिए अधिक व्यवस्थित ढांचा बनाने का सुझाव दिया। उन्होंने यह भी प्रस्तावित किया कि संबंधित विधि आयोग और समकक्ष निकाय लगभग छह महीने के भीतर अपने पहले संयुक्त मुद्दा-पत्र सरकारों के विचारार्थ प्रस्तुत कर सकते हैं।
न्यायमूर्ति माहेश्वरी ने कहा कि नागरिक के लिए न्याय सातवीं अनुसूची की अलग-अलग सूचियों में बंटा हुआ नहीं है। न्याय की अपेक्षा एक है, इसलिए न्याय उपलब्ध कराने की प्रतिबद्धता भी समान होनी चाहिए।

‘विधिक सुधार की मूल इकाई कानून नहीं, नागरिक है’

विधि आयोग की सदस्य सचिव डॉ. अंजू राठी राणा ने कहा कि आयोग राष्ट्रीय और राज्य-स्तरीय संस्थानों के बीच सेतु की भूमिका निभा सकता है, ताकि एक क्षेत्र का उपयोगी कानूनी अनुभव दूसरे क्षेत्रों तक भी पहुंचे। उन्होंने ‘नागरिक देवो भव’ की अवधारणा और ‘जन विश्वास’ सुधारों का उल्लेख करते हुए कहा कि विधिक सुधार की मूल इकाई कोई कानून नहीं, बल्कि नागरिक है। उनका कहना था कि उद्देश्य सभी राज्यों को एक जैसा सोचने के लिए बाध्य करना नहीं, बल्कि ऐसा संवाद स्थापित करना है जिसमें किसी राज्य को सुधारों पर अकेले विचार न करना पड़े।

कानूनों में सुधार के तरीकों पर मंथन

सम्मेलन में दो तकनीकी सत्र आयोजित किए गए। इनमें ‘कानून में सुधार: आवश्यकताएं और तरीके’ तथा ‘निर्धारित शक्तियां, साझा लक्ष्य: सहयोगात्मक न्यायशास्त्र के माध्यम से भविष्य की रूपरेखा’ विषयों पर चर्चा हुई। प्रतिभागियों ने परिस्थितियों के अनुरूप और साक्ष्य-आधारित कानून बनाने, न्याय, कर्तव्य और लोककल्याण जैसी अवधारणाओं को समानता, स्वतंत्रता और गरिमा से जोड़ने तथा राज्यों की स्वायत्तता और क्षेत्रीय विविधता का सम्मान करते हुए संस्थागत सहयोग बढ़ाने के उपायों पर विचार किया।
सम्मेलन में राष्ट्रीय और राज्य-स्तरीय विधिक सुधार संस्थानों, कानूनविदों, पूर्व न्यायाधीशों, नीति-निर्माताओं, शिक्षाविदों, विधि विद्यार्थियों और बार के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। दिनभर चले विचार-विमर्श का उद्देश्य कानूनों को अधिक प्रभावी बनाना और उनके क्रियान्वयन को देश के विभिन्न राज्यों की वास्तविक जरूरतों के अनुरूप ढालना रहा। सम्मेलन का समापन विदाई सत्र के साथ हुआ।

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