चिन्मय मिशन की आध्यात्मिक चेतना से विकसित भारत तक का संकल्प, पीएम मोदी ने युवा शक्ति को बताया राष्ट्र निर्माण की धुरी

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  • Oct 23, 2026
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चिन्मय अमृत महोत्सव वैश्विक सम्मेलन का भारत मंडपम में उद्घाटन

प्रधानमंत्री बोले—मिशन ने दशकों से भारतीय आध्यात्मिक ज्ञान को विश्व तक पहुंचाया, 2047 के विकसित भारत के लक्ष्य से जुड़ें हर नागरिक

 

नई दिल्ली, 23 अक्टूबर 2026। चिन्मय मिशन की आध्यात्मिक चेतना, भारतीय ज्ञान परंपरा और राष्ट्र निर्माण के संकल्प को विकसित भारत की यात्रा से जोड़ते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि राष्ट्र हमारी संस्कृति की जन्मभूमि ही नहीं, बल्कि हमारे अस्तित्व की नींव भी है। चिन्मय मिशन ने दशकों से समाज की सेवा करते हुए भारत के आध्यात्मिक ज्ञान को दुनिया तक पहुंचाया है। आज मिशन के प्रयासों से लाखों युवा भारतीय मूल्यों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने वाले सांस्कृतिक दूत बन रहे हैं। प्रधानमंत्री ने शुक्रवार को नई दिल्ली के भारत मंडपम में चिन्मय अमृत महोत्सव वैश्विक सम्मेलन का उद्घाटन किया।

‘चिन्मय’ विचार अमर चेतना का प्रतीक

प्रधानमंत्री ने कहा कि चिन्मय मिशन केवल एक संस्था नहीं, बल्कि एक गहन ‘चिन्मय’ विचार है। इसकी स्थापना एक ‘चिन्मय’ ऋषि ने की और इसकी दशकों लंबी यात्रा पवित्र संकल्पों से भरी रही है। जो ‘चिन्मय’ है, वह स्वाभाविक रूप से अमर और शाश्वत अमृत से परिपूर्ण है। उन्होंने सम्मेलन के नाम की सार्थकता बताते हुए कहा कि मिशन की आध्यात्मिक चेतना और सेवा भाव इसकी पहचान हैं।
सम्मेलन में आधुनिक तकनीक के माध्यम से होलोबोट पर श्रद्धेय गुरुदेव स्वामी चिन्मयानंद के साथ संवाद का अनुभव प्रधानमंत्री के लिए भावनात्मक रहा। उन्होंने कहा कि यह अनुभव उन्हें 1993 में वडोदरा में गुरुदेव से हुई मुलाकात की स्मृतियों में ले गया। गुरुदेव की आत्मीयता, संवाद और आशीर्वाद को याद करते हुए उन्हें लगा, मानो वे एक बार फिर उनकी साक्षात उपस्थिति में खड़े हों। प्रधानमंत्री ने इस भावपूर्ण श्रद्धांजलि के लिए मिशन के सदस्यों का आभार व्यक्त किया।

युवा शक्ति से मजबूत भारत का संकल्प

स्वामी विवेकानंद के ऐतिहासिक संबोधन के 100 वर्ष पूरे होने पर 1993 में आयोजित विश्व धर्म संसद के शताब्दी समारोह को याद करते हुए मोदी ने बताया कि फरवरी-मार्च में उन्होंने स्वामी चिन्मयानंद को शिकागो आमंत्रित करने के लिए अमेरिका की यात्रा की थी। गुरुदेव ने 3 अगस्त को सैन डिएगो में अपने निधन से पहले इस आयोजन के लिए पूरे अमेरिका में लोगों को एकजुट करने का अथक प्रयास किया था। 11 सितंबर को शिकागो में आयोजित सभा में उनकी अनुपस्थिति गहराई से महसूस की गई।
प्रधानमंत्री ने गुरुदेव के साथ अपनी अंतिम बातचीत का उल्लेख करते हुए कहा कि उसका मूल संदेश युवा शक्ति का निर्माण और उसके माध्यम से मजबूत तथा सक्षम भारत का निर्माण करना था। गुजरात के मुख्यमंत्री का पद संभालने से लेकर सरकार के प्रमुख के रूप में 25 वर्षों की अपनी सेवा यात्रा का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि देश के युवा हमेशा उनकी नीतियों के केंद्र में रहे हैं।
चिन्मय अमृत महोत्सव के युवा स्वयंसेवकों की सराहना करते हुए प्रधानमंत्री ने बताया कि उन्होंने 300 दिनों में 40 हजार किलोमीटर की यात्रा कर एक लाख से अधिक युवा नागरिकों से संपर्क किया। उन्होंने इस महत्वपूर्ण प्रयास के लिए पूरी टीम को बधाई दी।

अमृत काल में भारत की ज्ञान परंपरा का पुनर्जागरण

उपनिषद के मंत्र ‘वयम् अमृतस्य पुत्राः’ का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत सहस्राब्दियों से ज्ञान और प्रकाश का साधक बना हुआ है, क्योंकि उसकी चेतना और ज्ञान अमर हैं। इसी भावना से स्वतंत्रता की 75वीं वर्षगांठ पर अमृत महोत्सव का आह्वान किया गया था। यह विकसित भारत की आधारशिला रखने और मानवता के कल्याण के प्रति भारत की हजारों वर्ष पुरानी प्रतिबद्धता को पुनर्जीवित करने का अवसर है।
उन्होंने कहा कि आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक संस्थाओं ने महत्वपूर्ण पड़ावों पर पवित्र संकल्प लिए हैं। अमृत काल अभियान में चिन्मय मिशन की सहभागिता का स्वागत करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि यह ‘अमृतस्य पुत्र’ होने का सच्चा प्रमाण है।
वैदिक आह्वान ‘वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः’ का उल्लेख करते हुए मोदी ने कहा कि स्वामी चिन्मयानंद ने आध्यात्मिकता के साथ राष्ट्रीय प्राथमिकताओं पर भी मुखरता से विचार रखे। उन्होंने सिखाया कि राष्ट्र हमारी संस्कृति और अस्तित्व का आधार है। आध्यात्मिक उन्नति व्यक्तिगत विकास के साथ राष्ट्रीय प्रगति का माध्यम भी बननी चाहिए।
राष्ट्रीय स्वाभिमान जगाने और उपनिषदों, वेदांत तथा शास्त्रों का ज्ञान जन-जन तक पहुंचाने के लिए स्वामीजी ने गीता ज्ञान यज्ञ की शुरुआत की। इसी प्रेरणा से आज चिन्मय मिशन के लाखों युवा भारतीय मूल्यों को आगे बढ़ा रहे हैं। प्रधानमंत्री ने इसे भारत के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पुनर्जागरण का महत्वपूर्ण अध्याय बताया।

ज्ञान, कर्म और भक्ति का संगम थे स्वामी चिन्मयानंद

प्रधानमंत्री ने 2015 में गुरुदेव की जन्म शताब्दी पर स्मारक सिक्के के विमोचन को याद करते हुए स्वामी चिन्मयानंद के जीवन को ज्ञान, कर्म और भक्ति का अद्भुत संगम बताया। उन्होंने कहा कि स्वामीजी ने अपने गुरु स्वामी शिवानंद के आशीर्वचन—‘जाओ, शेर की तरह दहाड़ो’—को सार्थक किया। उनकी आवाज में झलकता आत्मविश्वास और आंतरिक शक्ति श्रोताओं के हृदय पर विचारों की अमिट छाप छोड़ती थी। उनका रेडियो कार्यक्रम ‘आर्ट ऑफ मैन मेकिंग’ भी अनगिनत लोगों के लिए जीवन मार्गदर्शन का माध्यम बना।
मोदी ने कहा कि महान व्यक्तित्वों के मिशन उनके जीवनकाल के बाद भी जारी रहते हैं। चिन्मय मिशन के देशभर में 100 से अधिक शैक्षणिक संस्थान लाखों विद्यार्थियों का भविष्य संवार रहे हैं। इन संस्थानों में आधुनिक शिक्षा के साथ भारतीय मूल्यों को भी आत्मसात कराया जा रहा है।
स्वामी चिन्मयानंद जैसे विचारकों की स्वतंत्रता के बाद की परिकल्पना को वर्तमान प्रयासों से जोड़ते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत नए राष्ट्र निर्माण के लिए शिक्षा को आधुनिक बनाने का दायित्व निभा रहा है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भारतीय ज्ञान परंपरा, मातृभाषा में शिक्षा, आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी को एक साथ महत्व दिया गया है।

विवेकानंद स्मारक से सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण तक

भारतीय विरासत के संरक्षण के प्रति स्वामी चिन्मयानंद के समर्पण को याद करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि गुरुदेव ने कन्याकुमारी में समुद्र के बीच विवेकानंद रॉक मेमोरियल के निर्माण के लिए एकनाथ रानाडे के संकल्प का दृढ़ समर्थन किया था। उन्होंने इस परियोजना के लिए पहला आर्थिक योगदान भी दिया। आज यह स्मारक दुनिया के लाखों लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। भारतीय विरासत पर गर्व करना और उसका संरक्षण करना स्वामीजी के जीवन का महत्वपूर्ण मिशन था।
देश में उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक हो रहे सांस्कृतिक पुनर्जागरण का उल्लेख करते हुए मोदी ने काशी विश्वनाथ धाम, अयोध्या में श्रीराम मंदिर, उज्जैन के महाकाल महालोक तथा केदारनाथ और बद्रीनाथ के भव्य पुनरुद्धार की चर्चा की। उन्होंने सांस्कृतिक स्थलों को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किए जाने का भी उल्लेख किया।
प्रधानमंत्री ने कहा कि पहले चोरी की गई भारतीय पुरावशेषों को विदेशों में बेचा जाता था, लेकिन पिछले 12 वर्षों में ऐसी धरोहरों को वापस लाने के लिए महत्वपूर्ण प्रयास हुए हैं। इस अवधि में साढ़े छह सौ से अधिक प्राचीन मूर्तियां भारत वापस लाई गई हैं।
स्वामी चिन्मयानंद द्वारा भारतीय दर्शन को विश्व तक पहुंचाने और अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के माध्यम से आज दुनिया को भारत से जोड़ने के प्रयासों में समानता बताते हुए मोदी ने कहा कि विरासत पर बढ़ता गर्व और औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति इस बात के प्रमाण हैं कि देश प्राचीन ऋषियों और देशभक्तों के परिकल्पित मार्ग पर आगे बढ़ रहा है। इन महान विभूतियों की बौद्धिक विरासत भारत की सबसे बड़ी ताकत है।

2047 के विकसित भारत के लक्ष्य से जुड़ें हर नागरिक

प्रधानमंत्री ने कहा कि विभिन्न संगठन भले ही अलग-अलग लक्ष्यों के लिए काम करते हों, लेकिन उनके रास्ते अंततः राष्ट्रीय विकास और गौरव के साझा गंतव्य तक पहुंचते हैं। जिस तरह स्वामी चिन्मयानंद ने अपने समय की चुनौतियों के अनुरूप संकल्प लिए थे, उसी तरह आज की पीढ़ी को आधुनिक सामाजिक विकृतियों और चुनौतियों का समाधान करना चाहिए।
उन्होंने विभाजनकारी ताकतों के खिलाफ समाज को एकजुट करने, आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने और प्रत्येक नागरिक को 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य से जोड़ने के लिए सक्रिय प्रयासों का आह्वान किया।
वर्ष 2047 में भारत की स्वतंत्रता के 100 वर्ष और चिन्मय मिशन की शताब्दी यात्रा के ऐतिहासिक संगम का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि दोनों यात्राओं के लक्ष्य समान हैं और इन्हें साथ-साथ आगे बढ़ना चाहिए। उन्होंने विश्वास जताया कि मिशन के आचार्य, साधक और स्वयंसेवकों का वैश्विक परिवार गुरुदेव की विरासत तथा दशकों के अनुभव के आधार पर विकसित भारत के निर्माण में योगदान देगा। प्रधानमंत्री ने सभी को विभिन्न पर्वों की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि चिन्मय मिशन की शताब्दी यात्रा और विकसित भारत की यात्रा साथ-साथ आगे बढ़ेंगी।

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