पूर्वोत्तर भारत को जानने- समझने का अवसर है ‘तवांग तीर्थ यात्रा’

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  • Sep 26, 2026
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19 से 25 नवंबर तक होगा 15वीं तवांग तीर्थ-यात्रा का आयोजन

भारत तिब्बत सहयोग मंच तिब्बत की आजादी, कैलाश मानसरोवर की मुक्ति, हिमालय की रक्षा, पर्यावरण की सुरक्षा एवं अन्य सम-सामयिक मुद्दों को लेकर 27 वर्षों से अनवरत कार्य कर रहा है। मंच कार्यक्रमों एवं जन- जागरण के माध्यम से नित नई उपलब्धियों के साथ आगे बढ़ता जा रहा है। उपलब्धियों की दृष्टि से मंच की बात की जाए तो एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है, तवांग तीर्थ यात्रा। तवांग तीर्थ यात्रा को मंच के मार्गदर्शक इन्द्रेश कुमार जी ने वर्ष 2012 में प्रारम्भ किया था। इस वर्ष 15वीं तीर्थ यात्रा 19 से 25 नवम्बर तक आयोजित होगी।

तवांग तीर्थ यात्रा के सम्बन्ध में भारत तिब्बत सहयोग मंच के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री एवं तवांग तीर्थ यात्रा समिति के संयोजक पंकज गोयल जी का कहना है कि यह कोई सामान्य यात्रा नहीं है, बल्कि यह एक विशेष यात्रा है। इस यात्रा में भारत की आत्मा रची-बसी हुई है और यात्रा पूर्वोत्तर भारत को जानने- समझने का अवसर है। तवांग तीर्थ यात्रा राजनीतिक, आर्थिक सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, राष्ट्रीय एकता- अखंडता एवं देशभक्ति से परिपूर्ण है या यूँ कहें कि समग्र दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है। यात्रा के माध्यम से संपूर्ण भारत के लोगों को पूर्वोत्तर भारत को जानने एवं समझने का अवसर प्राप्त होता है। जब इस यात्रा की शुरुआत की थी तो मन में यही भाव था कि सम्पूर्ण भारत के लोग पूर्वोत्तर भारत को ठीक से जानें व समझें। इसके साथ ही पूर्वोत्तर के लोग भी राष्ट्र की मुख्य धारा से अपने को सदैव जोड़े रहें।

जिस अरुणाचल प्रदेश को मक्कार चीन अपना बताता है, उस प्रदेश के अंतिम जिले तवांग में बुमला बॉर्डर पर तवांग तीर्थ यात्री जाते हैं और वहां पहुँच कर स्थानीय लोगों के साथ मिलकर भारत माँ यानी भारत भूमि का पूजन एवं वंदन करते हैं। पूर्वोत्तर भारत के जो भाई–बहन भारत भ्रमण नहीं कर पाते हैं, वे भारत के कोने-कोने से आए तीर्थ यात्रियों से मिलकर प्रफुल्लित होते हैं।

बात सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है। तवांग तीर्थ यात्रियों के स्वागत- सम्मान में पूर्वोत्तर भारत के लोग अनेक सामाजिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन भी करते हैं। पूर्वोत्तर के लोगों की आत्मीयता, अपनत्व, अतिथि सत्कार की भावना, सरलता, मधुरता एवं मिलनसारिता तवांग तीर्थ यात्रियों को आकर्षित कर लेती है। पूर्वोत्त्तर भारत के लोग जिस तरह से अपनी लोक कला, लोक संस्कृति एवं लोक व्यवहार को बचाए हुए हैं, और उसे अधिक मजबूत करते जा रहे हैं, उससे सम्पूर्ण भारत को अपनी जड़ों से जुड़े रहने की प्रेरणा भी मिलती है।

प्रकृति ने पूर्वोत्तर भारत पर खूब कृपा बरसाई है। यहाँ के प्राकृतिक दृश्य देखते ही बनते हैं। प्राकृतिक दृश्यों, झीलों एवं झरनों से भरपूर पूर्वोत्तर भारत की यात्रा पर जाने वाले तवांग तीर्थ यात्रियों को ब्रह्मपुत्र नदी के टापू पर बना विश्व का एक मात्र शिव जी का मन्दिर, तेजपुर का महादेव मन्दिर, भगवान श्री कृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध जी का अग्निगढ़ मन्दिर, चित्रलेखा उद्यान, अरुणाचल का प्रवेश द्वार ‘भालूक पोंग’, पश्चिम कामेंग जिले का मुख्यालय ‘बोमडिला’, सैनिक जसवंत सिंह की स्मृति में बना जसवंतगढ़, भारत–चीन युद्ध में बलिदान हुए वीरों के स्मारक, छठे दलाई लामा जी की जन्मस्थली ‘तवांग मठ’, दलाई लामा जी के पद चिन्ह, गुरु नानक देव जी की तपस्या स्थली भूमि पर बना ‘नानक लामा’; जोगिन्दर बाबा का स्मारक सहित अन्य ऐतिहासिक स्थानों को देखने, जानने एवं समझने का अवसर मिलता है।

यात्रा को नवम्बर मास में आयोजित करने का एक ख़ास मकसद यह भी है कि दुष्ट चीन ने 20 अक्तूबर 1962 को हिन्दी चीनी भाई-भाई के नारे की आड़ में भारत पर आक्रमण कर दिया था। इसी अरुणाचल प्रदेश में हमारे वीर सैनिकों ने अपर्याप्त संसाधनों के बावजूद चीनी सैनिकों को मुंहतोड़ जवाब दिया था। सैनिकों की वीरता से घबराकर चीनी सैनिकों को पीछे हटने को मजबूर होना पड़ा था। सन् 1962 में ही 14 नवम्बर को भारतीय संसद के दोनों सदनों के संयुक्त सत्र में यह संकल्प लिया गया था कि चीन द्वारा कब्जाई गई भूमि का एक-एक इंच वापस लिया जाएगा। ज़ब तक सारी भूमि वापस नहीं ली जाएगी, तब तक चैन से नहीं बैठा जाएगा। यात्रा के माध्यम से उस संकल्प को पूरा करने का स्मरण करवाया जाता है।

तेरा वैभव अमर रहे माँ, हम दिन चार रहें न रहें – इस वाक्य को सदैव ध्यान में रखते हुए तवांग तीर्थ यात्रा से स्वयं जुड़ें एवं अन्य लोगों को जोड़ने में अपनी भूमिका का निर्वाह करें। व्यक्ति निर्माण से ही सशक्त राष्ट्र निर्माण का मार्ग प्रशस्त होता है। राष्ट्र प्रथम का भाव मन में लेकर हम सभी को आगे बढ़ते रहना है।भारत तिब्बत सहयोग मंच

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