एआई और जीन थेरेपी बदलेंगे इलाज की दुनिया, भारत बनेगा वैश्विक स्वास्थ्य शक्ति

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  • Oct 22, 2026
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चेन्नई में एसआरआईएचईआर के 42वें दीक्षांत समारोह में डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा—नई तकनीक के साथ सटीक चिकित्सकीय निर्णय भी जरूरी

युवाओं में मधुमेह और हृदय रोग की रोकथाम राष्ट्रीय प्राथमिकता


चेन्नई, 22 अक्टूबर 2026। चिकित्सा जगत आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), जीनोमिक्स और जीन आधारित सटीक चिकित्सा के नए दौर में प्रवेश कर रहा है और भारत उन्नत स्वास्थ्य समाधानों के प्रमुख प्रदाताओं में उभर रहा है। केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने चेन्नई स्थित श्री रामचंद्र उच्च शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (एसआरआईएचईआर) के 42वें दीक्षांत समारोह में यह बात कही। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी के चिकित्सकों को अत्याधुनिक तकनीकों का लाभ मिलेगा, लेकिन उन्हें इन तकनीकों को मरीजों के उपचार में प्रभावी ढंग से शामिल करने की चुनौती भी स्वीकार करनी होगी। चिकित्सा का भविष्य तकनीकी प्रगति और सटीक चिकित्सकीय निर्णय के तालमेल पर निर्भर करेगा।

युवाओं में बढ़ती जीवनशैली संबंधी बीमारियां चिंता का विषय

डॉ. सिंह ने अपने लगभग चार दशक के चिकित्सकीय अनुभव का उल्लेख करते हुए कहा कि चिकित्सा क्षेत्र में संक्रामक रोगों के साथ अब मधुमेह और हृदय रोग जैसी जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों का बोझ भी तेजी से बढ़ा है। बढ़ती जीवन प्रत्याशा के कारण स्वास्थ्य सेवाओं की जरूरतें बदल रही हैं, जबकि संक्रामक और गैर-संक्रामक दोनों तरह के रोग चुनौती बने हुए हैं। उन्होंने कहा कि कम उम्र में दीर्घकालिक बीमारियों की शुरुआत रोकने के लिए बचाव, शुरुआती पहचान और निरंतर उपचार पर अधिक ध्यान देना होगा।
उन्होंने बताया कि मधुमेह और हृदय रोग, जो पहले अधिकतर उम्रदराज लोगों से जुड़े माने जाते थे, अब युवाओं को भी प्रभावित कर रहे हैं। 30 वर्ष की उम्र में मधुमेह होने पर व्यक्ति को कई दशकों तक इसके दुष्परिणाम झेलने पड़ सकते हैं। ऐसे में महत्वपूर्ण अंगों की सुरक्षा और जटिलताओं की रोकथाम चिकित्सकों, परिवारों तथा मरीजों की साझा जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि युवाओं के स्वास्थ्य की रक्षा भारत की मानव क्षमता को सुरक्षित रखने और 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य हासिल करने के लिए जरूरी है।

एआई और जीनोमिक्स बदलेंगे मरीजों के उपचार का तरीका

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि एआई आधारित स्वास्थ्य सेवाएं और जीन आधारित सटीक चिकित्सा निदान, उपचार और व्यक्तिगत देखभाल के नए रास्ते खोलेंगी। जीनोमिक जानकारी को मरीज की चिकित्सकीय स्थिति, जीवनशैली और पर्यावरणीय कारकों से जोड़कर उसके अनुरूप उपचार तय करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, तकनीक का इस्तेमाल करते समय चिकित्सकों को नैदानिक अनुभव, विवेक और मरीज की जरूरतों को प्राथमिकता देनी होगी, ताकि नवाचार का वास्तविक लाभ उपचार के परिणामों में दिखाई दे।

स्वदेशी टीकों और जीन थेरेपी में भारत की प्रगति

डॉ. सिंह ने कहा कि भारत ने स्वदेशी चिकित्सा अनुसंधान में महत्वपूर्ण प्रगति की है और वैश्विक स्वास्थ्य नवाचार में योगदान बढ़ाया है। उन्होंने कोविड-19 के खिलाफ विकसित स्वदेशी डीएनए टीके तथा डेंगू और मलेरिया के टीका अनुसंधान का उल्लेख किया। हीमोफीलिया के लिए जीन थेरेपी में हुई प्रगति को भी उन्होंने देश की बढ़ती वैज्ञानिक क्षमता का उदाहरण बताया।
उन्होंने सामुदायिक स्तर पर होने वाले जीवाणुजनित निमोनिया के उपचार के लिए विकसित नेफिथ्रोमाइसिन और तीव्र लिम्फोब्लास्टिक ल्यूकेमिया तथा फैटी लिवर रोग से संबंधित परमाणु चिकित्सा अनुसंधान का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार, ये प्रयास जटिल बीमारियों के लिए नए उपचार विकसित करने और चिकित्सा अनुसंधान में भारत की भूमिका मजबूत करने की क्षमता दर्शाते हैं।

जीनोमिक्स, बायोमैन्युफैक्चरिंग और परमाणु चिकित्सा में सहयोग का आह्वान

केंद्रीय मंत्री ने एसआरआईएचईआर को जीनोमिक्स, बायोमैन्युफैक्चरिंग और परमाणु चिकित्सा जैसे उभरते क्षेत्रों में राष्ट्रीय अनुसंधान पहलों के साथ सहयोग बढ़ाने के लिए आमंत्रित किया। उन्होंने कहा कि सरकारी अनुसंधान संस्थानों, विश्वविद्यालयों, अस्पतालों और उद्योग के बीच साझेदारी से वैज्ञानिक खोजों को मरीजों के उपचार में उपयोगी बनाया जा सकता है। इससे नवाचार को गति देने के साथ प्रभावी और किफायती स्वास्थ्य समाधान विकसित करने में मदद मिलेगी।
उन्होंने संस्थान को अपनी अनुसंधान क्षमताओं, चिकित्सकीय विशेषज्ञता और स्टार्टअप तंत्र को मजबूत करने के लिए भी प्रोत्साहित किया। नई चिकित्सा पद्धतियों और प्रौद्योगिकियों को आगे बढ़ाने के लिए शोधकर्ताओं, चिकित्सकों और तकनीक विकसित करने वालों के बीच निकट सहयोग को महत्वपूर्ण बताया।

दीक्षांत समारोह में विद्यार्थियों को बधाई

डॉ. सिंह ने स्नातक, स्नातकोत्तर और सुपर-स्पेशियलिटी पाठ्यक्रमों के विद्यार्थियों तथा स्वर्ण पदक विजेताओं को बधाई दी। उन्होंने संस्थान की प्रगति और चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान में उसके योगदान पर संतोष व्यक्त किया। कार्यक्रम में संस्थान के कुलाधिपति वी.आर. वेंकटचलम, प्रो-चांसलर आर.वी. सिंह रुतवार और अन्य वरिष्ठ सदस्य उपस्थित रहे। मंत्री ने अनुपस्थित रहीं कुलपति डॉ. उमा के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना भी की।
अपने संबोधन के अंत में डॉ. सिंह ने कहा कि युवाओं में बढ़ती दीर्घकालिक बीमारियों की रोकथाम को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया जाना चाहिए। विकसित भारत-2047 के लक्ष्य के लिए युवाओं के स्वास्थ्य और उत्पादक क्षमता की रक्षा जरूरी है। इसके लिए रोकथाम, चिकित्सा अनुसंधान, तकनीकी नवाचार और जिम्मेदार चिकित्सकीय अभ्यास पर निरंतर काम करना होगा।

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