बलिया में विजयादशमी पर निकला संघ का पथ संचलन, अनुशासन और राष्ट्रसेवा का दिया संदेश

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  • Oct 23, 2026
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चार स्थानों से शुरू होकर शहीद पार्क चौक पर एकत्र हुए संचलन; बौद्धिक कार्यक्रम में मुकुल कानिटकर ने शाखा को बताया व्यक्ति निर्माण और सामाजिक समरसता का माध्यम

बलिया। 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्थापना दिवस एवं विजयादशमी उत्सव के अवसर पर गुरुवार को बलिया नगर में पथ संचलन निकाला गया। पूर्ण गणवेश में बड़ी संख्या में शामिल स्वयंसेवकों ने घोष की धुन पर कदमताल करते हुए अनुशासन, एकता, संगठन और राष्ट्र के प्रति समर्पण का संदेश दिया।

पथ संचलन नगर के चार स्थानों—टाउन हॉल परिसर, पशु चिकित्सालय, दयानंद विद्या मंदिर (आर्य समाज रोड) और बिचला घाट स्थित श्री हनुमान मंदिर से एक साथ प्रारंभ हुआ। विभिन्न मार्गों से गुजरते हुए चारों संचलन शहीद पार्क चौक पर एकत्र हुए। इसके बाद वीर लोरिक स्पोर्ट्स स्टेडियम में बौद्धिक कार्यक्रम आयोजित किया गया।

कार्यक्रम का शुभारंभ अध्यक्ष अनुज सरावगी, मुख्य वक्ता मुकुल कानिटकर और अन्य अतिथियों ने भारत माता, मां दुर्गा एवं भगवान श्रीराम के चित्रों के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित कर किया। अतिथियों के परिचय और एकलगीत के बाद मुख्य वक्ता मुकुल कानिटकर ने संघ की कार्यपद्धति और शाखा की भूमिका पर विचार रखे।

शाखा के प्रत्यक्ष अनुभव से समझा जा सकता है संघ

मुकुल कानिटकर ने कहा कि जिस प्रकार गंगा में स्नान किए बिना उसके पवित्रता के अनुभव को पूरी तरह समझना कठिन है, उसी प्रकार संघ को केवल पुस्तकों के माध्यम से नहीं जाना जा सकता। संघ की कार्यशैली, संस्कारों और वातावरण को समझने के लिए शाखा में आकर उसका प्रत्यक्ष अनुभव करना आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि पुस्तकें संघ का परिचय दे सकती हैं और संवाद के माध्यम से जिज्ञासाओं का समाधान हो सकता है, लेकिन शाखा का अनुभव संघ के जीवन को निकट से समझने का अवसर देता है। शाखा केवल दैनिक गतिविधियों का केंद्र नहीं, बल्कि व्यक्ति निर्माण, अनुशासन, आत्मीयता, सेवा और सामूहिक उत्तरदायित्व विकसित करने का माध्यम है।

चरित्रवान नागरिकों और संगठित समाज से होगा राष्ट्र का उत्थान

कानिटकर ने कहा कि संघ की सौ वर्षों की यात्रा इस विचार को रेखांकित करती है कि राष्ट्र का उत्थान केवल शासन या व्यवस्थाओं के बल पर नहीं, बल्कि चरित्रवान व्यक्तियों, संगठित समाज और कर्तव्यनिष्ठ नागरिकों के सामूहिक प्रयासों से होता है। राष्ट्र की उन्नति के लिए प्रत्येक व्यक्ति का अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक होना जरूरी है।

उन्होंने सामाजिक भेदभाव से ऊपर उठकर परस्पर आत्मीयता, सामाजिक समरसता और सहयोग की भावना विकसित करने पर बल दिया। उनके अनुसार, सेवा कार्यों के माध्यम से समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचना और नई पीढ़ी में संस्कार, स्वाभिमान तथा राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना जागृत करना समय की आवश्यकता है।

पथ संचलन सामूहिकता और राष्ट्रनिष्ठा का प्रतीक

मुख्य वक्ता ने कहा कि पथ संचलन केवल कदमताल का प्रदर्शन नहीं, बल्कि अनुशासन, एकता, सामूहिकता और राष्ट्र के प्रति समर्पण का प्रतीक है। स्वयंसेवकों की एकरूपता यह संदेश देती है कि व्यक्तिगत स्वार्थों से ऊपर उठकर समाज और राष्ट्र के हित में कार्य करना ही संगठित जीवन का सार है।

उन्होंने कहा कि संघ का शताब्दी वर्ष आत्ममंथन करने और भविष्य के लिए नए संकल्प लेने का अवसर है। प्रत्येक स्वयंसेवक को अपने आचरण, सेवा और सामाजिक सहभागिता के माध्यम से राष्ट्रजीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने का प्रयास करना चाहिए। परिवार में संस्कार, समाज में समरसता, जीवन में अनुशासन और राष्ट्र के प्रति अटूट निष्ठा सशक्त भारत के निर्माण की आधारशिला हैं।

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