भारतीय विदुषी महिलाओं का इतिहास पाठ्यक्रम में अनिवार्य रूप से शामिल हो: डॉ. गौरी माहुलीकर

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  • Oct 10, 2026
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‘भारतीय विदुषी आणि लेखिका : सन 1 ते 1857’ पुस्तक के मराठी, हिंदी और अंग्रेजी संस्करणों का लोकार्पण

पुणे, 9 अक्टूबर 2026।

चिन्मय विश्वविद्यालय की अधिष्ठाता एवं लेखिका डॉ. गौरी माहुलीकर ने कहा कि भारतीय पाठ्यक्रम में विदुषी महिलाओं के गौरवशाली इतिहास को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जहां यूरोपीय परंपरा में महिलाओं की भूमिका को लंबे समय तक घर-परिवार, सिलाई-कढ़ाई और बच्चों के पालन-पोषण तक सीमित करने की धारणा को बढ़ावा मिला, वहीं भारत में महिलाओं की बौद्धिक परंपरा सहस्राब्दियों से समृद्ध रही है। यहां महिलाओं ने ज्ञान, साहित्य, वेदांत और दर्शन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

डॉ. माहुलीकर महाराष्ट्र साहित्य परिषद के माधवराव पटवर्धन सभागृह में आयोजित एक समारोह को संबोधित कर रही थीं। ‘दृष्टि स्त्री अध्ययन प्रबोधन केंद्र’ के तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम में पुस्तक ‘भारतीय विदुषी आणि लेखिका : सन 1 ते 1857’ के मराठी, हिंदी और अंग्रेजी संस्करणों का लोकार्पण किया गया। इस अवसर पर पुस्तक के लेखक एवं विचारक मिलिंद ओक और डॉ. अंजलि देशपांडे उपस्थित रहे।

गुरुकुलों, मठों और मंदिरों में महिलाओं को मिलती थी उच्च शिक्षा

डॉ. माहुलीकर ने कहा कि भारतीय इतिहास में राजा-महाराजाओं, युद्धों और विद्वान पुरुषों का उल्लेख प्रमुखता से मिलता है, लेकिन काव्य, साहित्य और वेदांत का गंभीर अध्ययन करने वाली विदुषियों का योगदान अपेक्षाकृत उपेक्षित रहा है।

उन्होंने कहा कि प्राचीन काल में गुरुकुलों, मठों और मंदिरों के माध्यम से महिलाओं को उच्च शिक्षा प्राप्त करने के अवसर मिलते थे। शिलालेखों, ताम्रपत्रों और प्राचीन पांडुलिपियों में उनके योगदान के प्रमाण मिलते हैं। वैदिक, जैन, तंत्र, बौद्ध और भक्ति परंपराओं से जुड़ी महिलाओं ने भारतीय ज्ञान और साहित्य को समृद्ध किया। इनमें अनेक महिलाएं केवल साक्षर नहीं थीं, बल्कि आचार्या और प्रख्यात साहित्यकार के रूप में भी प्रतिष्ठित थीं। उन्होंने इस परंपरा को पाठ्यक्रम में उचित स्थान देने की आवश्यकता पर बल दिया।

भारतीय परंपरा में स्त्री-शिक्षा के अनेक ऐतिहासिक प्रमाण

पुस्तक के लेखक मिलिंद ओक ने भारत में स्त्री-शिक्षा की ऐतिहासिक परंपरा पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि वात्स्यायन ने महिलाओं के लिए 64 कलाओं के ज्ञान का उल्लेख किया है, जो उस समय महिलाओं की विविध क्षेत्रों में शिक्षा और कौशल की परंपरा को दर्शाता है।

उन्होंने तंजावुर राजवंश के दरबार की उन विदुषी महिलाओं का भी उल्लेख किया, जो अष्टावधान में पारंगत थीं, कई भाषाएं जानती थीं और विभिन्न ग्रंथों का अनुवाद करती थीं। उनके अनुसार, रानी भटारिका की संस्कृत कविता से प्रसिद्ध मराठी कवयित्री शांता शेळके को अपनी चर्चित रचना ‘तोच चंद्रमा नभात’ की प्रेरणा मिली थी।

मिलिंद ओक ने दसवीं शताब्दी की विदुषी अवंतीसुंदरी का उदाहरण देते हुए बताया कि वह प्राकृत भाषा की विद्वान थीं। बारहवीं शताब्दी में आचार्य हेमचंद्र ने अपने ग्रंथ ‘देशीनाममाला’ में उन्हें प्रामाणिक संदर्भ के रूप में स्वीकार किया था।

उन्होंने भारतीय महिलाओं को ऐतिहासिक रूप से शिक्षा से वंचित रखने संबंधी धारणा पर भी सवाल उठाया। उनके अनुसार, ब्रिटिश काल के मूल दस्तावेज और रिपोर्टें पारंपरिक घरेलू पाठशालाओं में बालिकाओं की शिक्षा का उल्लेख करती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि अंग्रेजी शिक्षा पद्धति के दौर में 1840 से 1860 के बीच देशभर में 500 से अधिक बालिका विद्यालय शुरू हुए थे।

मिलिंद ओक ने महात्मा फुले द्वारा स्थापित कन्या विद्यालय का उल्लेख करते हुए कहा कि शुरुआती विरोध के बावजूद तीन वर्षों के भीतर विद्यालय की 250 बालिकाओं ने परीक्षा उत्तीर्ण की और धीरे-धीरे समाज का समर्थन भी बढ़ा।

पुस्तक में दो हजार वर्षों की शिक्षण परंपरा का संकलन

डॉ. अंजलि देशपांडे ने पुस्तक को भारतीय संस्कृति की समृद्ध ज्ञान परंपरा का महत्वपूर्ण संकलन बताया। उन्होंने कहा कि इसके माध्यम से भारतीय स्त्रियों की लगभग दो हजार वर्षों की शिक्षण परंपरा और बौद्धिक योगदान को समझने का अवसर मिलता है।

उन्होंने भारतीय महिलाओं की शिक्षा और अभिव्यक्ति से जुड़ी ऐतिहासिक धारणाओं पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता भी रेखांकित की।

कार्यक्रम की प्रस्तावना रंजना खरे ने प्रस्तुत की। पुस्तक का मुखपृष्ठ सागर नेने ने तैयार किया है, जबकि कार्यक्रम का संचालन स्वाती लेले ने किया।

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