नागपुर में विजयादशमी उत्सव: संजय गुप्ता ने चरित्र निर्माण और नागरिक कर्तव्यों को बताया राष्ट्र की प्रगति का आधार

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  • Oct 20, 2026
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दैनिक जागरण के संपादकीय सरोकारों और संघ के सामाजिक उद्देश्यों में समानता का किया उल्लेख, भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों और सामाजिक समरसता पर दिया जोर

नागपुर। 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 101वें स्थापना दिवस के अवसर पर नागपुर में आयोजित विजयादशमी उत्सव में प्रमुख अतिथि संजय गुप्ता ने राष्ट्र निर्माण, भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों, नागरिक कर्तव्यों और चरित्र निर्माण की आवश्यकता पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि किसी भी राष्ट्र की पहचान केवल उसकी आर्थिक प्रगति से नहीं, बल्कि वहां के लोगों के संस्कारों, नैतिकता और सामाजिक उत्तरदायित्व से भी होती है। उनके अनुसार, भारत को समृद्ध और सशक्त राष्ट्र बनाने के लिए नागरिकों में कर्तव्यबोध, अनुशासन और राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना विकसित करना आवश्यक है।

अपने संबोधन की शुरुआत में संजय गुप्ता ने विजयादशमी और संघ के स्थापना दिवस की शुभकामनाएं दीं। उन्होंने आयोजन में आमंत्रित किए जाने पर आभार व्यक्त करते हुए कहा कि संघ की स्थापना के समय भारत स्वतंत्र नहीं था और उस दौर की सामाजिक परिस्थितियां आज से अलग थीं। उन्होंने कहा कि संघ की स्थापना के पीछे हिंदू समाज को एकजुट और सामर्थ्यवान बनाने तथा देश को पराधीनता की मानसिकता से बाहर निकालने का विचार प्रमुख था।

संघ की ऐतिहासिक भूमिका और भारतीयता पर विचार

संजय गुप्ता ने कहा कि स्वतंत्रता के बाद संघ ने व्यक्ति निर्माण, भारतीयता और राष्ट्रनिष्ठा को अपने कार्यों का प्रमुख आधार बनाया। उन्होंने दावा किया कि स्वतंत्रता के बाद राजनीतिक क्षेत्र के एक वर्ग ने संघ की विचारधारा को स्वीकार नहीं किया, लेकिन विभिन्न चुनौतियों के बावजूद संगठन अपने कार्यों में आगे बढ़ता रहा।

उन्होंने भारतीय जनसंघ की स्थापना और बाद में भारतीय जनता पार्टी के विस्तार का उल्लेख करते हुए कहा कि संघ की वैचारिक दृष्टि और संगठनात्मक क्षमता ने भारतीय राजनीति को प्रभावित किया है। उन्होंने भाजपा के अनेक नेताओं में भारतीयता, राष्ट्रीयता और भारतीय संस्कारों के प्रति समझ विकसित होने का श्रेय संघ से मिली वैचारिक प्रेरणा को दिया।

उन्होंने संघ और उससे प्रेरित संगठनों पर हिंदू अतिवाद को बढ़ावा देने के आरोपों का उल्लेख करते हुए कहा कि उनके विचार में संघ ने हिंदू संस्कारों और भारतीय जीवन पद्धति के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने मुगल और ब्रिटिश शासन के लंबे दौर के बाद भारतीय सांस्कृतिक पहचान के वैश्विक स्तर पर उभरने को भी इसी संदर्भ में देखा।

अगले सौ वर्षों में चरित्र निर्माण पर जोर

संघ के शताब्दी वर्ष के बाद की भूमिका पर चर्चा करते हुए संजय गुप्ता ने कहा कि आने वाले समय में सामाजिक बदलाव और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों की स्थापना महत्वपूर्ण चुनौतियां होंगी। उन्होंने सामाजिक कुरीतियों को दूर करने और समाज में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए संघ जैसे संगठनों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया।

उन्होंने कहा कि सामाजिक सुधार राजनीतिक दलों की भी जिम्मेदारी है, लेकिन चुनावी राजनीति और राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के कारण कई बार सामाजिक मुद्दों पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जाता। ऐसे में सामाजिक और सांस्कृतिक संगठनों की प्रासंगिकता बढ़ जाती है।

उन्होंने भारत की आर्थिक प्रगति की संभावनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि आने वाले 20 से 25 वर्षों में देश समृद्ध राष्ट्र के रूप में उभर सकता है। हालांकि, उन्होंने सवाल उठाया कि क्या आर्थिक समृद्धि के साथ समाज की नैतिक और वैचारिक चेतना भी मजबूत होगी।

उनके अनुसार, जातिगत भेदभाव, वर्ग विभाजन, धार्मिक आधार पर दूरी, सहिष्णुता की कमी और नागरिक कर्तव्यों के प्रति उदासीनता जैसी चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि नागरिकों को केवल यह नहीं सोचना चाहिए कि देश उन्हें क्या दे रहा है, बल्कि यह भी विचार करना चाहिए कि वे देश और समाज को क्या योगदान दे सकते हैं।

दैनिक जागरण के सात सरोकारों का उल्लेख

संजय गुप्ता ने दैनिक जागरण की संपादकीय नीति का उल्लेख करते हुए कहा कि समाचार पत्र सनातन भारतीय मूल्यों, राष्ट्रभक्ति, सकारात्मक सोच, समरसता और सद्भावना को महत्व देता है। उन्होंने कहा कि समाचार माध्यमों की जिम्मेदारी केवल घटनाओं की जानकारी देना नहीं, बल्कि नागरिकों को उनके सामाजिक और राष्ट्रीय दायित्वों के प्रति जागरूक करना भी है।

उन्होंने कहा कि संघ और दैनिक जागरण की विचारधारा में भारतीय संस्कृति तथा राष्ट्र के प्रति निष्ठा और समर्पण के बिंदुओं पर समानता दिखाई देती है। उन्होंने दैनिक जागरण के सात सरोकारों का उल्लेख किया—सुशिक्षित समाज, पर्यावरण संरक्षण, जल संरक्षण, स्वस्थ समाज, नारी सशक्तिकरण, गरीबी उन्मूलन और जनसंख्या नियोजन। उनके अनुसार, इन विषयों के माध्यम से सामाजिक और राष्ट्रीय उत्थान के लिए निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं।

भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों और सामाजिक एकता की आवश्यकता

संजय गुप्ता ने कहा कि किसी भी राष्ट्र के संस्कार और मूल्य उसकी पहचान निर्धारित करते हैं। उन्होंने भारतीय सांस्कृतिक परंपरा की ऐतिहासिक भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि देश में अनेक पंथ और जीवन पद्धतियां प्रचलित हैं। उन्होंने इन परंपराओं के ऐतिहासिक संबंधों को हिंदू सांस्कृतिक मूल से जोड़ने वाला अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत किया।

उन्होंने आशंका जताई कि यदि समाज में जातिगत विभाजन और आपसी दूरियां बढ़ती रहीं, तो हिंदू समाज की एकता प्रभावित हो सकती है। उनके अनुसार, सामाजिक समरसता और साझा सांस्कृतिक चेतना को मजबूत करना आवश्यक है।

राष्ट्र निर्माण के लिए चरित्रवान नागरिक जरूरी

अपने संबोधन के अंतिम हिस्से में संजय गुप्ता ने कहा कि पिछली सदी में संघ के सामने सामाजिक और सांस्कृतिक चुनौतियां प्रमुख थीं, जबकि आने वाले सौ वर्षों में चरित्र निर्माण को प्राथमिकता देना आवश्यक होगा। उन्होंने कहा कि चरित्रवान नागरिक ही राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों को सही ढंग से समझते और उनका पालन करते हैं।

विजयादशमी को अन्याय पर न्याय और असत्य पर सत्य की विजय का पर्व बताते हुए उन्होंने संघ नेतृत्व के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने दैनिक जागरण समूह की ओर से प्रार्थना की कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारत को परम वैभव तक पहुंचाने के अपने उद्देश्य की दिशा में निरंतर कार्य करता रहे और अधिक सामर्थ्यवान बने। उन्होंने अपने संबोधन का समापन ‘भारत माता की जय’ के उद्घोष के साथ किया।

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