सुनंदा ताई पटवर्धन: 50 वर्षों तक शिक्षा, महिला स्वावलंबन और आदिवासी विकास के लिए किया जीवन समर्पित

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  • Oct 18, 2026
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झुग्गियों के बच्चों को शिक्षा से जोड़ने से शुरू हुई सेवा यात्रा, ‘प्रगति प्रतिष्ठान’ के माध्यम से हजारों किसानों, महिलाओं और जरूरतमंद परिवारों के जीवन में लाई बदलाव

ठाणे। झुग्गी-बस्तियों में अशिक्षा से जूझते बच्चों को देखकर एक मां के मन में उठी पीड़ा ने सेवा की ऐसी यात्रा को जन्म दिया, जिसने ठाणे और आसपास के क्षेत्रों के सैकड़ों बच्चों को शिक्षा से जोड़ा। यह प्रेरक कहानी सुनंदा ताई पटवर्धन की है, जिन्होंने अपने जीवन के 50 वर्ष बच्चों की शिक्षा, महिलाओं को स्वावलंबी बनाने और आदिवासी समुदायों के विकास के लिए समर्पित कर दिए।

सुनंदा ताई का मानना था कि दूसरों को देने का सुख शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। उनकी सेवा भावना और समर्पण ने जरूरतमंद परिवारों के जीवन में बदलाव लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ठाणे की झुग्गी-बस्तियों में रहने वाले परिवारों की समस्याओं को अपना समझते हुए उन्होंने बच्चों की शिक्षा और उनकी माताओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए निरंतर प्रयास किए। इन प्रयासों को संगठित रूप देने के लिए उन्होंने स्वैच्छिक संस्था ‘प्रगति प्रतिष्ठान’ की स्थापना की।

विवाह के बाद सेवा कार्यों को मिली नई दिशा

9 मार्च 1939 को महाराष्ट्र के वाई में जन्मीं सुनंदा ताई का शुरुआती नाम शशिकला घोटवाडेकर था। वर्ष 1956 में राजनीतिक और सामाजिक कार्यों से जुड़े वसंतराव से विवाह के बाद उनकी सेवा भावना को व्यापक दिशा मिली। यहीं से उनकी सामाजिक कार्यों की यात्रा शुरू हुई, जो पांच दशक तक निरंतर जारी रही।

इसी दौरान उन्हें जवाहर क्षेत्र के आदिवासी समुदायों की कठिन परिस्थितियों के बारे में जानकारी मिली। उन्होंने बिना देर किए वहां पहुंचकर लोगों के जीवन में सुधार लाने के प्रयास शुरू किए। वनवासी महिलाओं को संगठित कर बचत समूह बनाए गए और हस्तशिल्प पर आधारित कुटीर उद्योगों को बढ़ावा दिया गया। इन पहलों से महिलाओं के लिए आजीविका के अवसर विकसित हुए और बच्चों के शहरों की ओर पलायन को रोकने में मदद मिली।

ग्रामीण क्षेत्रों में लोग उन्हें स्नेहपूर्वक ‘वहिनी’ और आदिवासी क्षेत्र के लोग ‘भगिनी’ कहकर पुकारते थे। ये संबोधन उनके साथ लोगों के आत्मीय संबंधों को दर्शाते थे।

बच्चों के पोषण से किसानों की आय तक बदलाव के प्रयास

सुनंदा ताई के प्रयासों से 300 से अधिक बच्चों को पोषण अभियान का लाभ मिला। वहीं, 3,000 से अधिक किसान एक से अधिक फसलें उगाने लगे। उन्होंने आंगनवाड़ी केंद्र शुरू कराने के साथ-साथ ग्रामीण उत्पादों को बाजार तक पहुंचाने के लिए नेटवर्क विकसित करने में भी योगदान दिया।

इन प्रयासों से जवाहर के आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा, पोषण, महिला स्वावलंबन और कृषि के क्षेत्र में बदलाव की राह बनी। गांव-गांव तक उनके काम की पहचान पहुंची और बड़ी संख्या में परिवारों को विकास की गतिविधियों से जुड़ने का अवसर मिला।

सम्मान के बाद भी सेवा को प्राथमिकता

अपनी सेवा यात्रा के दौरान सुनंदा ताई को 24 प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। हालांकि, उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि जरूरतमंद लोगों के जीवन में आया बदलाव था। संस्था के 50 वर्ष पूरे होने पर उन्होंने वैराग्य भाव से संगठन की जिम्मेदारी नई पीढ़ी को सौंप दी। सक्षम कार्यकर्ताओं की टीम के हाथों में प्रगति प्रतिष्ठान की बागडोर देकर उन्होंने संस्था के कार्यों को निरंतर आगे बढ़ाने का मार्ग प्रशस्त किया।

आज सुनंदा ताई हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके प्रयासों से स्थापित ‘प्रगति प्रतिष्ठान’ निर्धन बच्चों, वनवासी महिलाओं और किसानों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए काम कर रहा है। उनकी जीवन यात्रा यह संदेश देती है कि समाज के प्रति संवेदना, निरंतर प्रयास और सामूहिक सहभागिता से वंचित समुदायों के लिए विकास के नए अवसर तैयार किए जा सकते हैं।

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