उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन का रणनीतिक नेतृत्व पर जोर; हर संप्रभु राष्ट्र समान, सीमाओं का अतिक्रमण स्वीकार्य नहीं

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  • Oct 12, 2026
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राष्ट्रीय संकल्प को ठोस परिणामों में बदलना जरूरी, भारत का लक्ष्य किसी पर प्रभुत्व नहीं, अपनी शर्तें थोपने से रोकना है


उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने राष्ट्रीय रक्षा महाविद्यालय के 66वें पाठ्यक्रम को किया संबोधित

 41 मित्र देशों के अधिकारियों सहित 122 प्रतिभागियों से एकीकृत रणनीति और अंतरराष्ट्रीय सहयोग का आह्वान


नई दिल्ली, 12 अक्टूबर 2026। उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने कहा है कि भारत का लक्ष्य एक अग्रणी वैश्विक शक्ति के रूप में उभरना है, लेकिन दूसरों पर प्रभुत्व स्थापित करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि कोई देश भारत पर अपनी शर्तें न थोप सके। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रत्येक संप्रभु राष्ट्र समान है, चाहे वह बड़ा हो या छोटा। किसी भी देश को दूसरे देश की क्षेत्रीय सीमाओं का अतिक्रमण नहीं करना चाहिए। राष्ट्रीय रणनीति ऐसी होनी चाहिए, जो राष्ट्रीय उद्देश्य को कार्रवाई और राष्ट्रीय संकल्प को ठोस परिणामों में बदले।


रणनीतिक सोच और राष्ट्रीय मूल्यों पर जोर
उपराष्ट्रपति ने सोमवार को नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय रक्षा महाविद्यालय (एनडीसी) के 66वें पाठ्यक्रम के प्रतिभागियों को संबोधित किया। उनका व्याख्यान ‘भारत के मूल मूल्य, राष्ट्रीय हित और राष्ट्रीय उद्देश्य’ विषय पर केंद्रित था। उन्होंने समकालीन सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए रणनीतिक सोच, एकीकृत नीति निर्माण और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को आवश्यक बताया। कार्यक्रम में भारतीय सशस्त्र बलों, सिविल सेवाओं, पुलिस और अन्य सरकारी संगठनों के अधिकारियों के साथ मित्र देशों के 41 अधिकारियों सहित कुल 122 प्रतिभागी शामिल हुए।
‘वसुधैव कुटुंबकम’ भारत की वैश्विक दृष्टि का आधार
राधाकृष्णन ने कहा कि राष्ट्रीय मूल्य किसी देश की पहचान की आधारशिला होते हैं और विश्व के साथ उसके संबंधों को दिशा देते हैं। भारत का सभ्यतागत दर्शन ‘वसुधैव कुटुंबकम’—अर्थात पूरा विश्व एक परिवार है—इसी दृष्टि को अभिव्यक्त करता है। उन्होंने कोविड-19 महामारी के दौरान भारत की वैक्सीन मैत्री पहल, आपदाओं के समय सहायता उपलब्ध कराने में भारत की भूमिका तथा जलवायु परिवर्तन और आपदा प्रबंधन से जुड़ी अंतरराष्ट्रीय पहलों में उसके नेतृत्व को इन मूल्यों के व्यावहारिक उदाहरण बताया।
संप्रभुता, लोकतंत्र और राष्ट्रीय अखंडता सर्वोच्च प्राथमिकताएं
उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत के राष्ट्रीय हित संप्रभुता, लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, न्याय, स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व तथा राष्ट्र की एकता और अखंडता जैसे संवैधानिक मूल्यों से प्रेरित हैं। उन्होंने पांच व्यापक प्राथमिकताओं को रेखांकित किया। इनमें भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा करना; लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और संघीय स्वरूप को बनाए रखना; रणनीतिक, राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य उद्देश्यों को आगे बढ़ाना; विकास एवं मानव विकास के लिए स्थिर और सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित करना; तथा अंतरराष्ट्रीय शांति और स्थिरता में योगदान देना शामिल है।
आतंकवाद से साइबर खतरे तक, साझा रणनीति जरूरी
राष्ट्रीय सुरक्षा की बढ़ती परस्पर निर्भरता का उल्लेख करते हुए राधाकृष्णन ने आतंकवाद, साइबर खतरों, महामारियों, जलवायु परिवर्तन और अंतरराष्ट्रीय अपराध जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए वैश्विक सहयोग बढ़ाने की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय हितों की रक्षा और साझा वैश्विक हितों को आगे बढ़ाना अक्सर एक-दूसरे के पूरक होते हैं। इसके लिए देशों के बीच समन्वित कार्रवाई, सूचना का आदान-प्रदान और आपसी विश्वास जरूरी है।
2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य
उपराष्ट्रपति ने वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को महत्वपूर्ण राष्ट्रीय संकल्प बताते हुए कहा कि दीर्घकालिक दृष्टि को उपलब्ध संसाधनों, ठोस नीतिगत विकल्पों और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुरूप बनाना होगा। राष्ट्रीय सुरक्षा का अर्थ केवल सीमाओं की रक्षा तक सीमित नहीं है। इसमें भारत की भूमि, हवाई क्षेत्र, समुद्री हितों और साइबर क्षेत्र की सुरक्षा के साथ सतत विकास और समृद्धि के लिए अनुकूल परिस्थितियां तैयार करना भी शामिल है।
वैश्विक दक्षिण के साथ सहयोग और भ्रष्टाचार पर प्रहार
राधाकृष्णन ने वैश्विक दक्षिण के देशों के साथ मजबूत संबंधों की वकालत की। उन्होंने पारस्परिक सम्मान, संप्रभु समानता और साझा विकास प्राथमिकताओं को सहयोग का आधार बताया। देशों से प्रौद्योगिकी, व्यापार, संपर्क, शिक्षा, नवाचार और क्षमता निर्माण के क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने का आग्रह करते हुए उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार वैश्विक दक्षिण के सामने बड़ी चुनौतियों में से एक है। इसे समाप्त करने के लिए सामूहिक प्रयास आवश्यक हैं।
भावी रणनीतिक नेताओं को दिया स्पष्ट संदेश
उपराष्ट्रपति ने पाठ्यक्रम के प्रतिभागियों से संस्थागत और व्यावसायिक सीमाओं से ऊपर उठकर एकीकृत तथा दूरदर्शी दृष्टिकोण अपनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि भावी रणनीतिक नेताओं को अपने राष्ट्र के मूल्यों को समझना, संरक्षित किए जाने वाले हितों की पहचान करना, स्पष्ट लक्ष्य तय करना और उन्हें उचित प्राथमिकता देना सीखना चाहिए। रणनीति का वास्तविक उद्देश्य राष्ट्रीय संकल्पों को ऐसे ठोस परिणामों में बदलना है, जिनसे देश की सुरक्षा, क्षमता और विकास मजबूत हों।
कार्यक्रम में राष्ट्रीय रक्षा महाविद्यालय के कमांडेंट एयर मार्शल मनीष कुमार गुप्ता, संकाय सदस्य और 66वें एनडीसी पाठ्यक्रम के प्रतिभागी उपस्थित थे।

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