खुरपका-मुंहपका रोग के खतरे से निपटने की तैयारी तेज, बेंगलुरु में राष्ट्रीय अभ्यास ‘वज्र-सैट’ संपन्न

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  • Nov 06, 2026
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25 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों के 83 विशेषज्ञों ने लिया हिस्सा

 निगरानी, त्वरित जांच, आपात टीकाकरण और अंतरराज्यीय समन्वय की तैयारियों को परखा

बेंगलुरु, 6 नवंबर। मवेशियों में खुरपका और मुंहपका रोग (एफएमडी) के नए सीरोटाइप सैट-1 के संभावित खतरे से निपटने के लिए भारत ने अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। इसी कड़ी में पशुपालन एवं डेयरी विभाग ने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के राष्ट्रीय पशु चिकित्सा महामारी विज्ञान एवं रोग सूचना विज्ञान संस्थान (एनआईवीईडीआई), बेंगलुरु के समन्वय से आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय टेबलटॉप अभ्यास ‘वज्र-सैट’ संपन्न किया। 4 और 5 नवंबर को आयोजित इस अभ्यास में 25 राज्यों, तीन केंद्र शासित प्रदेशों और प्रमुख राष्ट्रीय संस्थानों के 83 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लेकर बीमारी की निगरानी, शुरुआती पहचान, प्रयोगशाला जांच और आपातकालीन प्रतिक्रिया की तैयारियों को परखा।
भारत में सैट-1 का कोई मामला नहीं
‘जल्दी पहचान, तेजी से पुष्टि और समन्वित कार्रवाई’ की थीम पर आयोजित इस अभ्यास का उद्देश्य सीमापार पशु रोगों से निपटने के लिए राष्ट्रीय तैयारियों को मजबूत करना है। भारत में अब तक एफएमडी के सीरोटाइप सैट-1 का कोई मामला सामने नहीं आया है। हालांकि, अफ्रीका से पश्चिम एशिया के कुछ हिस्सों तक इसके भौगोलिक प्रसार को देखते हुए पशुधन, किसानों की आजीविका और पशुधन आधारित अर्थव्यवस्था की सुरक्षा के लिए एहतियाती तैयारी जरूरी मानी गई।
अभ्यास में राज्य पशुपालन विभागों, आईसीएआर संस्थानों, पशु चिकित्सा निदान प्रयोगशालाओं, पशु चिकित्सा विश्वविद्यालयों, टीका निर्माताओं तथा रक्षा एवं सीमा सुरक्षा एजेंसियों के प्रतिनिधि शामिल हुए। संभावित रोग प्रकोप जैसी परिस्थितियां बनाकर शुरुआती पहचान, प्रयोगशाला में पुष्टि, महामारी विज्ञान संबंधी जांच, पशुओं की आवाजाही पर नियंत्रण, आपातकालीन टीकाकरण, जोखिम संचार और विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वित कार्रवाई की प्रक्रिया पर विमर्श किया गया।
रोग की शुरुआती पहचान और सीमा सतर्कता पर जोर
अभ्यास का उद्घाटन 4 नवंबर को पशुपालन एवं डेयरी विभाग की पशुपालन आयुक्त डॉ. नवीना बी.एम. ने किया। उन्होंने केंद्र और राज्य की एजेंसियों के बीच अग्रिम तैयारी, रोग की समय रहते पहचान, त्वरित कार्रवाई और प्रभावी समन्वय को संक्रमण नियंत्रण के लिए महत्वपूर्ण बताया।
आईसीएआर-एनआईवीईडीआई के निदेशक डॉ. बलदेव आर. गुलाटी ने एफएमडी सैट-1 की उभरती महामारी विज्ञान संबंधी स्थिति की जानकारी देते हुए जोखिम आधारित निगरानी, महामारी संबंधी सूचनाओं और प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों को मजबूत करने पर जोर दिया। आईसीएआर-एनआईएफएमडी के निदेशक डॉ. जे.के. महापात्रा ने प्रयोगशालाओं की तैयारी, त्वरित रोग निदान और टीकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने की आवश्यकता बताई। राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय के निदेशक ब्रिगेडियर एम.एम. रामचंद्र ने सीमापार पशु रोगों की रोकथाम में विभिन्न एजेंसियों के तालमेल और सीमा पर सतर्कता को अहम बताया।
प्रयोगशालाओं की क्षमता बढ़ाने पर जोर
5 नवंबर को समापन सत्र की अध्यक्षता पशुपालन एवं डेयरी विभाग के अपर सचिव (पशुधन स्वास्थ्य) रमाशंकर सिन्हा ने की। उन्होंने आईसीएआर-एनआईएफएमडी के तकनीकी सहयोग से क्षेत्रीय एफएमडी प्रयोगशालाओं और क्षेत्रीय रोग निदान प्रयोगशालाओं (आरडीडीएल) सहित राष्ट्रीय एवं राज्य स्तरीय व्यवस्थाओं को मजबूत करने तथा प्रयोगशालाओं की जांच क्षमता बढ़ाने की जरूरत बताई।
समापन सत्र में प्रतिभागियों ने समय पर रोग की सूचना देने, तेजी से प्रयोगशाला पुष्टि, प्रभावी निगरानी, पशुओं की आवाजाही पर नियंत्रण, टीकाकरण की तैयारी और राज्यों के बीच समन्वय को प्राथमिकता देने की सिफारिश की। अभ्यास से प्राप्त अनुभव, सुझाव और निष्कर्ष एफएमडी सैट-1 की रोकथाम तथा संभावित प्रकोप की स्थिति में समन्वित कार्रवाई की राष्ट्रीय रणनीति को मजबूत करने में उपयोगी होंगे।
एफएमडी-मुक्त क्षेत्रों के लिए अलग तकनीकी बैठक
इससे पहले 5 नवंबर को अपर सचिव (पशुधन स्वास्थ्य) और पशुपालन आयुक्त की सह-अध्यक्षता में राज्यों की भागीदारी के साथ एफएमडी-मुक्त कंपार्टमेंटलाइजेशन पर अलग तकनीकी बैठक भी हुई। इसमें वीर्य उत्पादन केंद्रों और वीर्य बैंकों को एफएमडी-मुक्त क्षेत्र के रूप में विकसित करने पर चर्चा की गई। इस पहल का उद्देश्य रोग की रोकथाम को प्रभावी बनाना, मूल्यवान पशुधन आनुवंशिक संसाधनों की सुरक्षा करना और सुरक्षित पशुधन व्यापार को बढ़ावा देना है।

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