कचरे से उत्सर्जन तक की निगरानी आसान, शहरों के लिए लॉन्च हुआ डिजिटल जीएचजी कैलकुलेटर

  • Admin
  • Sep 17, 2026
  • 3,718 views

नई दिल्ली, 17 सितंबर 2026। शहरों में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन को अधिक वैज्ञानिक, प्रभावी और कम-उत्सर्जन वाला बनाने की दिशा में केंद्र सरकार ने डिजिटल पहल शुरू की है। भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार प्रो. अजय कुमार सूद ने 16 सितंबर को ठोस अपशिष्ट प्रबंधन प्रौद्योगिकियों के लिए विकसित लाइफ साइकिल असेसमेंट (एलसीए) फ्रेमवर्क और जीएचजी कैलकुलेटर वेब एप्लिकेशन की समीक्षा की। यह डिजिटल प्लेटफॉर्म शहरी स्थानीय निकायों को अलग-अलग कचरा प्रबंधन विकल्पों से होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का आकलन करने और कम कार्बन फुटप्रिंट वाले विकल्प चुनने में मदद करेगा।

बैठक में वैज्ञानिक सचिव डॉ. परविंदर मैनी सहित प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार कार्यालय, आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय, भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) बेंगलुरु तथा परियोजना से जुड़े अन्य विशेषज्ञ शामिल हुए। विभिन्न शहरी स्थानीय निकायों के प्रतिनिधियों ने भी वर्चुअल माध्यम से भाग लिया।

छह शहरों के अध्ययन से तैयार हुआ मॉडल

‘वेस्ट टू वेल्थ मिशन’ और ‘स्वच्छ भारत मिशन-अर्बन’ के उद्देश्यों के अनुरूप प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार कार्यालय ने वर्ष 2024 में इस परियोजना को समर्थन दिया था। आईआईएससी बेंगलुरु, आईआईटी मद्रास और आईआईटी (बीएचयू) वाराणसी के सहयोग से विकसित परियोजना का उद्देश्य भारत की परिस्थितियों के अनुरूप एलसीए फ्रेमवर्क और जीएचजी कैलकुलेटर तैयार करना था।

परियोजना में बेंगलुरु, मैसूरु, तुमकुरु, चेन्नई, दिल्ली और वाराणसी के केस स्टडी शामिल किए गए। अध्ययन में बायोमाइनिंग, एनारोबिक डाइजेशन, वेस्ट-टू-एनर्जी, कंपोस्टिंग, रीसाइक्लिंग और लैंडफिलिंग जैसी विभिन्न अपशिष्ट प्रबंधन तकनीकों का आकलन किया गया।

एक प्लेटफॉर्म पर दिखेगा कार्बन फुटप्रिंट

जीएचजी कैलकुलेटर को विशेष रूप से शहरी स्थानीय निकायों के लिए उपयोगकर्ता-अनुकूल बनाया गया है। इसके माध्यम से मौजूदा अपशिष्ट प्रबंधन व्यवस्था से होने वाले उत्सर्जन का आकलन किया जा सकता है। प्लेटफॉर्म नेट उत्सर्जन, बचाए गए उत्सर्जन, लॉजिस्टिक्स उत्सर्जन और कुल कार्बन फुटप्रिंट की जानकारी उपलब्ध कराएगा।

इसमें मीथेन, कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रस ऑक्साइड और ब्लैक कार्बन जैसे विभिन्न ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जनों से संबंधित आंकड़ों का भी आकलन किया जा सकेगा।

विकल्पों की तुलना कर सकेंगे निकाय

डिजिटल प्लेटफॉर्म में सिनारियो कम्पेरिजन मॉड्यूल भी शामिल है। इसके जरिए शहरी निकाय अलग-अलग अपशिष्ट प्रबंधन तकनीकों और परिचालन परिस्थितियों की तुलना कर सकेंगे। इससे ऐसे विकल्पों की पहचान में मदद मिलेगी, जिनमें अपेक्षाकृत कम जीएचजी उत्सर्जन और कार्बन फुटप्रिंट हो।

नई परियोजनाओं के पर्यावरणीय आकलन, सलाहकारों द्वारा तैयार विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) और निविदाओं में अपेक्षित पर्यावरणीय प्रदर्शन मानकों के निर्धारण में भी इस एप्लिकेशन का इस्तेमाल किया जा सकेगा।

विज्ञान आधारित योजना को मिलेगा आधार

प्रो. अजय कुमार सूद ने एलसीए फ्रेमवर्क और डिजिटल एप्लिकेशन को शहरी अपशिष्ट प्रबंधन की योजना के लिए महत्वपूर्ण उपकरण बताया। उन्होंने कहा कि विज्ञान आधारित ये समाधान शहरी स्थानीय निकायों को अधिक स्मार्ट, मजबूत और कम-उत्सर्जन वाली ठोस अपशिष्ट प्रबंधन प्रणालियों की ओर बढ़ने में मदद कर सकते हैं।

डॉ. परविंदर मैनी ने परियोजना के स्वच्छ भारत मिशन-अर्बन के साथ तालमेल को रेखांकित करते हुए देशभर में ऐसे समाधानों के व्यापक क्रियान्वयन के लिए संस्थागत व्यवस्था विकसित करने की आवश्यकता पर जोर दिया।

परियोजना के तहत मौजूदा और भविष्य की ठोस अपशिष्ट प्रबंधन प्रणालियों की दक्षता बढ़ाने के लिए रणनीतिक सुझाव भी दिए गए हैं। साथ ही, जलवायु-अनुकूल और कम-उत्सर्जन वाले अपशिष्ट प्रबंधन की दिशा में भारत के लिए राष्ट्रीय रोडमैप का प्रस्ताव रखा गया है।

सम्बन्धित खबरें