मोतिहारी में आध्यात्मिक एवं धार्मिक नेतृत्व संवाद, 102 साधु-संतों ने लिया हिस्सा

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  • Oct 16, 2026
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संघ के सह-सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल ने सनातन परंपरा, सामाजिक समरसता और लोककल्याण में संत समाज की भूमिका पर रखे विचार

मोतिहारी।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के निमित्त संघ, चंपारण की ओर से रैमसन प्लाजा में आध्यात्मिक एवं धार्मिक नेतृत्व संवाद का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह-सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहे। संवाद में चंपारण विभाग के विभिन्न क्षेत्रों से आए 102 साधु-संतों और आध्यात्मिक नेतृत्वकर्ताओं ने सहभागिता की। इनमें 57 मठों के महंत, 22 आध्यात्मिक संगठनों के प्रमुख, कथावाचक, सन्यासी और प्रमुख गुरुद्वारों के ग्रंथी सहित अन्य धार्मिक प्रतिनिधि शामिल रहे।

कार्यक्रम का उद्देश्य सनातन परंपरा, भारतीय संस्कृति, सामाजिक समरसता और वर्तमान सामाजिक परिदृश्य में आध्यात्मिक नेतृत्व की भूमिका पर विचार-विमर्श करना था। आयोजन का शुभारंभ भारत माता के चित्र पर पुष्पार्चन के साथ हुआ। इसके बाद मंचासीन अतिथियों का परिचय कराया गया। सह प्रांत संघचालक प्रो. राजकिशोर ने संघ के शताब्दी वर्ष के अंतर्गत आयोजित किए जा रहे विभिन्न कार्यक्रमों की जानकारी दी।

सनातन परंपरा में सेवा और लोककल्याण का महत्व

मुख्य वक्ता डॉ. कृष्ण गोपाल ने भारतीय संस्कृति, सनातन जीवन-दृष्टि और समाजजीवन में आध्यात्मिक मूल्यों की भूमिका पर विचार रखे। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में साधु-संतों का योगदान केवल आध्यात्मिक मार्गदर्शन तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि उन्होंने समाज को संस्कारित करने, जीवन मूल्यों को सुरक्षित रखने और लोकमंगल की भावना को जागृत करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

उन्होंने सनातन परंपरा के मूल्यों का उल्लेख करते हुए सेवा, सदाचार, करुणा, आत्मानुशासन और लोककल्याण को सामाजिक जीवन के लिए महत्वपूर्ण बताया। इन मूल्यों को आचरण में उतारने से समाज में सद्भाव, आत्मीयता और उत्तरदायित्व की भावना मजबूत होती है। आध्यात्मिक नेतृत्व इन मूल्यों को जनजीवन में प्रतिष्ठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

डॉ. कृष्ण गोपाल ने संत परंपरा को भारतीय समाज की सांस्कृतिक चेतना का संवाहक बताते हुए कहा कि संतों और सामाजिक-सांस्कृतिक क्षेत्र में कार्यरत संगठनों के बीच संवाद से समाजहित के विभिन्न विषयों पर परस्पर समझ और समन्वय को मजबूत किया जा सकता है।

संतों ने साझा किए मठ-मंदिरों के कार्यों और सामाजिक योगदान से जुड़े अनुभव

बौद्धिक सत्र के बाद साधु-संतों और आध्यात्मिक एवं धार्मिक नेतृत्वकर्ताओं के साथ संवाद आयोजित किया गया। इसमें विभिन्न संतों ने अपने विचार रखे और मठ-मंदिरों की गतिविधियों तथा समाज के प्रति उनके योगदान पर चर्चा की।

संतों ने अपने मठों, मंदिरों और आध्यात्मिक संगठनों की वर्तमान स्थिति, समाज के साथ उनके जुड़ाव तथा समसामयिक सामाजिक विषयों से जुड़े अनुभव साझा किए। धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण और सामाजिक जीवन में आध्यात्मिक संस्थाओं की भूमिका पर भी विचार-विमर्श हुआ।

कार्यक्रम का समापन कल्याण मंत्र के साथ किया गया।

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