वन्यजीव संरक्षण में भारत की बढ़ती भूमिका, जयपुर सम्मेलन में वैश्विक सहयोग और सामुदायिक भागीदारी पर जोर

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  • Sep 21, 2026
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जयपुर, 21 सितंबर। वन्यजीव संरक्षण अब केवल संरक्षित क्षेत्रों तक सीमित विषय नहीं, बल्कि स्थानीय समुदायों की भागीदारी और प्रकृति के साथ सहअस्तित्व से जुड़ा वैश्विक दायित्व है। जयपुर में आयोजित डब्ल्यूडब्ल्यूएफ वैश्विक संरक्षण सम्मेलन में केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने संरक्षण प्रयासों को समुदाय-केंद्रित बनाने और वैश्विक स्तर पर साझा कार्रवाई को गति देने का आह्वान किया।

सौ से अधिक देशों के प्रतिनिधियों को संबोधित करते हुए यादव ने कहा कि संरक्षण के क्षेत्र में हुई प्रगति से आत्मविश्वास लेते हुए आगे की चुनौतियों के लिए साझा दृष्टि, आशा और दिशा विकसित करने की आवश्यकता है। उन्होंने भारत के वन्यजीव संरक्षण मॉडल में स्थानीय समुदायों की भूमिका और प्रकृति के साथ सहअस्तित्व को महत्वपूर्ण बताया।

एक दशक में बढ़ा संरक्षित क्षेत्रों का दायरा

यादव ने भारत में पिछले दशक के दौरान संरक्षण के क्षेत्र में हुए विस्तार का उल्लेख करते हुए बताया कि देश में संरक्षित क्षेत्रों की संख्या करीब 750 से बढ़कर 1,000 से अधिक हो गई है। इसी अवधि में बाघ अभयारण्यों की संख्या 47 से बढ़कर 58, हाथी अभयारण्यों की संख्या 30 से बढ़कर 33 और रामसर स्थलों की संख्या 24 से बढ़कर 101 हुई है।

उन्होंने भारत में चीतों के पुनः आगमन को भी वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण पहल के रूप में रेखांकित किया।

संरक्षण में संस्कृति और संवैधानिक दायित्व का मेल

पर्यावरण मंत्री ने कहा कि भारत की प्रजाति संरक्षण की प्रतिबद्धता संवैधानिक प्रावधानों के साथ-साथ देश की सांस्कृतिक परंपराओं में भी निहित है। संविधान वन्यजीव संरक्षण को राज्य के दायित्व और नागरिकों के कर्तव्य से जोड़ता है।

भारत सीआईटीईएस, प्रवासी प्रजातियों पर कन्वेंशन (सीएमएस), जैव विविधता पर कन्वेंशन (सीबीडी) और रामसर कन्वेंशन का पक्षकार है। बाघ, हाथी, गैंडा और एशियाई शेर जैसी प्रजातियों के संरक्षण कार्यक्रमों को उन्होंने निरंतर संरक्षण प्रयासों का उदाहरण बताया।

वैज्ञानिक निगरानी से संरक्षण रणनीति को मिल रहा आधार

यादव ने कहा कि वैज्ञानिक अनुसंधान और नियमित निगरानी ने भारत के संरक्षण प्रयासों को अधिक प्रभावी बनाने में मदद की है। बाघ, हाथी, डॉल्फिन, शेर और हिम तेंदुए जैसी प्रजातियों के अखिल भारतीय जनसंख्या आकलन से पर्यावास सुधार, वन्यजीव गलियारों की सुरक्षा और बड़े वन्यजीवों के संरक्षण के लिए व्यापक रणनीति तैयार करने में महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है।

राजस्थान में ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (जीआईबी) के संरक्षण प्रजनन कार्यक्रम और ओरण पवित्र उपवनों के सामुदायिक संरक्षण प्रयासों का भी सम्मेलन में उल्लेख हुआ। इन पहलों को भूमि क्षरण रोकने और स्थानीय स्तर पर जैव विविधता संरक्षण से जोड़ा गया।

घास के मैदान और आर्द्रभूमि भी संरक्षण के केंद्र में

पर्यावरण मंत्री ने कहा कि वन संरक्षण के साथ आर्द्रभूमि और घास के मैदानों पर भी समान ध्यान देना जरूरी है। उन्होंने विशाल शाकाहारी जीवों के संरक्षण के लिए भारत की रणनीति साझा करते हुए एक सींग वाले गैंडे और जंगली जल भैंस के संरक्षण के लिए चल रहे कार्यक्रमों की जानकारी दी।

उन्होंने वन्यजीव संरक्षण से जुड़े विशेषज्ञों और संगठनों से केवल उपलब्धियों का आकलन करने के बजाय सफल उपायों को व्यापक स्तर पर लागू करने और संरक्षण के नए रास्ते तलाशने का आह्वान किया।

सम्मेलन में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, राजस्थान सरकार तथा डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के वरिष्ठ अधिकारी और सौ से अधिक देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए।

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