उज्जैनी शॉर्ट फिल्म फेस्टिवल का शुभारंभ, भारतीयता और सांस्कृतिक विरासत पर सिनेमा की भूमिका पर मंथन

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  • Oct 24, 2026
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जे. नंदकुमार बोले—फिल्मों में सामने आए भारत का सत्य और गौरवशाली अतीत; 240 प्रविष्टियों में से चयनित 35 फिल्मों की हो रही स्क्रीनिंग

उज्जैन, 24 अक्टूबर 2026। 

भारतीयता, सांस्कृतिक विरासत और सभ्यतागत मूल्यों को सिनेमा के माध्यम से स्थापित करने के उद्देश्य से आयोजित उज्जैनी शॉर्ट फिल्म फेस्टिवल के चौथे संस्करण का शनिवार को शुभारंभ हुआ। विश्व संवाद केंद्र मालवा और सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय फेस्टिवल का उद्घाटन विश्वविद्यालय के स्वर्ण जयंती सभागार में प्रज्ञा प्रवाह के अखिल भारतीय संयोजक जे. नंदकुमार और अभिनेता संजय मेहता ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया।

भारतीयता और सांस्कृतिक स्मृतियों को सिनेमा में मिले स्थान

उद्घाटन सत्र में जे. नंदकुमार ने भारतीय सिनेमा के अतीत और वर्तमान में वैचारिक संघर्ष के विभिन्न पहलुओं पर विचार रखे। उन्होंने कहा कि सिनेमा का उद्देश्य आनंद और बोध प्रदान करने के साथ भारतीयता को स्थापित करना भी है। उनके अनुसार, भारत की सभ्यतागत और सांस्कृतिक स्मृतियों को धुंधला करने के प्रयास हुए हैं। ऐसे में फिल्मों के माध्यम से भारत का सत्य सामने आना चाहिए।

नंदकुमार ने कहा कि फिल्मों में देश के गौरवशाली अतीत के चित्रण के साथ वर्तमान की विकृतियों को भी सामने लाया जाना चाहिए, लेकिन इसका उद्देश्य भारतीय भाव और सांस्कृतिक मूल्यों का संरक्षण होना चाहिए। उन्होंने फिल्मकारों से भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को सहेजने और उसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने की दिशा में काम करने का आह्वान किया।

उन्होंने कहा कि पूर्वोत्तर के वीरों से लेकर दक्षिण भारत के महान राजाओं और भारतीय जीवन मूल्यों से जुड़ी कहानियों को सिनेमा के माध्यम से समाज तक पहुंचाने की जरूरत है। उनके अनुसार, सिनेमा केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि सभ्यताओं और सांस्कृतिक स्मृतियों को संरक्षित करने तथा उन्हें पुनर्जीवित करने का प्रभावी माध्यम भी है। युवा पीढ़ी और फिल्मकारों को अपनी मिट्टी, संस्कृति और परंपराओं से जुड़ी सार्थक कहानियों को पर्दे पर उतारना चाहिए।

वैचारिक विमर्श और फिल्म निर्माण पर चर्चा

अभिनेता संजय मेहता ने वैचारिक विमर्श में सिनेमा की भूमिका के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने सिनेमा को विचारों और सामाजिक दृष्टिकोण को अभिव्यक्त करने का प्रभावी माध्यम बताया।

फेस्टिवल के पहले दिन फिल्म निर्देशक कामाख्या नारायण सिंह ने फिल्म निर्माण और निर्देशन की बारीकियों पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि सार्थक सिनेमा बनाने के लिए सामाजिक अनुभूति और सामाजिक उद्देश्य की समझ आवश्यक है।

स्क्रीनप्ले लेखक शैलेष प्रताप सिंह ने पटकथा लेखन में अध्ययन और शोध के महत्व पर संवाद किया। वहीं, दिलीप लोकरे ने कहानी को शॉर्ट फिल्म के रूप में ढालने की प्रक्रिया और उससे जुड़ी रचनात्मक चुनौतियों पर अपने विचार साझा किए।

240 प्रविष्टियों में से 35 फिल्मों का चयन

फेस्टिवल में कुल 240 फिल्म प्रविष्टियां प्राप्त हुईं, जिनमें से 35 चयनित फिल्मों की स्क्रीनिंग की जा रही है। इस आयोजन के माध्यम से विभिन्न विषयों पर बनी लघु फिल्मों को मंच प्रदान करने के साथ फिल्म निर्माण से जुड़े लोगों और दर्शकों के बीच संवाद को प्रोत्साहित किया जा रहा है।

दो दिवसीय उज्जैनी शॉर्ट फिल्म फेस्टिवल का उद्देश्य सिनेमा के माध्यम से भारतीय समाज, सांस्कृतिक परंपराओं और जीवन मूल्यों से जुड़े विषयों पर विचार-विमर्श को आगे बढ़ाना है।

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