प्रकृति के संरक्षण में ही सतत विकास का आधार, भारतीय ज्ञान परंपरा से सीखने की जरूरत: मंत्री इंदर सिंह परमार

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  • Oct 15, 2026
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भोपाल, 16 अक्टूबर 2026। भारतीय ज्ञान परंपरा में प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और उसके संरक्षण का भाव महत्वपूर्ण स्थान रखता है। विकास के साथ पर्यावरण का संतुलन बनाए रखना और प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग जरूरत के अनुसार करना आज की आवश्यकता है। यह बात उच्च शिक्षा, तकनीकी शिक्षा एवं आयुष मंत्री इंदर सिंह परमार ने भोपाल में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी को संबोधित करते हुए कही।

अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय, भोपाल और मध्य प्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद के संयुक्त तत्वावधान में ‘पर्यावरण संरक्षण एवं सतत विकास’ विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है। मंत्री परमार ने इसके उद्घाटन सत्र में प्रकृति संरक्षण, भारतीय ज्ञान परंपरा और पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली के महत्व पर प्रकाश डाला।

प्रकृति से उतना ही लें, जितना आवश्यक हो

मंत्री इंदर सिंह परमार ने कहा कि भारतीय संस्कृति में पृथ्वी को मां मानने की परंपरा प्रकृति के प्रति सम्मान और संवेदनशीलता को दर्शाती है। हमारे पूर्वजों ने प्रकृति संरक्षण के लिए ऐसी मान्यताएं विकसित कीं, जिनमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी दिखाई देता है।

उन्होंने कहा कि प्रकृति से उतना ही ग्रहण करना चाहिए, जितना आवश्यक हो। इसके साथ ही प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और उसे लौटाने का भाव भी बनाए रखना जरूरी है। यही भारतीय दर्शन और विचार परंपरा का मूल आधार है।

पर्यावरण संरक्षण को व्यवहार में उतारना जरूरी

मंत्री ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में मौजूद पर्यावरण संरक्षण संबंधी मान्यताओं के वैज्ञानिक पक्ष को व्यापक स्तर पर समाज के सामने लाने की आवश्यकता है। पर्यावरण संरक्षण केवल विचार-विमर्श तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसे हर व्यक्ति के दैनिक जीवन का हिस्सा बनाना होगा।

उन्होंने प्लास्टिक का उपयोग कम करने और पर्यावरण के अनुकूल आदतें अपनाने पर जोर दिया। इसके लिए जनजागरूकता बढ़ाने के साथ व्यक्तिगत व्यवहार में भी बदलाव लाना आवश्यक है।

विद्यार्थियों में पर्यावरण संरक्षण के संस्कार विकसित करने पर जोर

इंदर सिंह परमार ने कहा कि विद्यार्थियों में प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता और संरक्षण की भावना विकसित करने में शिक्षकों एवं प्राध्यापकों की महत्वपूर्ण भूमिका है। शिक्षकों को अपने आचरण से ऐसे मूल्यों का उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए, ताकि विद्यार्थी भी उन्हें अपने जीवन में अपनाएं।

उन्होंने कहा कि विकास और भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के प्रयासों के कारण वन संपदा को नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए। विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाते हुए प्रकृति के प्रति उत्तरदायित्व की भावना विकसित करना समय की जरूरत है।

सरस्वती वंदना और दीप प्रज्ज्वलन से हुआ शुभारंभ

राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ मां सरस्वती की वंदना और दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. देव आनंद हिंडोलिया ने की। कुलसचिव स्वाति वशिष्ठ और संगोष्ठी संयोजक डॉ. चित्रलेखा सोनी (कड़ेल) ने अतिथियों का स्वागत किया।

विशिष्ट अतिथि डॉ. अनिल कोठारी ने अपने संबोधन में पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन स्थापित करने के महत्व पर विचार रखे।

तकनीकी सत्रों में पर्यावरणीय चुनौतियों पर चर्चा

संगोष्ठी के पहले दिन दो तकनीकी सत्र आयोजित किए गए। प्रो. रविन्द्र कान्हेरे ने बीज वक्तव्य प्रस्तुत किया। पहले तकनीकी सत्र में प्रो. गौतम ने पर्यावरण के वैश्विक दृष्टिकोण पर विचार रखे, जबकि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के निदेशक डॉ. विद्यार्थी ने पर्यावरण के सामने मौजूद विभिन्न चुनौतियों पर प्रकाश डाला।

इस दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण, सतत विकास और प्रकृति के प्रति उत्तरदायी जीवनशैली के महत्व पर चर्चा को प्रोत्साहित करना है। कार्यक्रम के अंत में कुलसचिव स्वाति वशिष्ठ ने अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त किया।

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