भीलवाडा – वनवासी कल्याण आश्रम केन्द्रीय कार्यकारी मण्डल बैठक में पारित प्रस्ताव

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  • Oct 03, 2026
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प्रस्ताव – वागड़ के जलियांवाला बाग” मानगढ़ धाम को अविलम्ब राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया जाए

यह सर्वज्ञात है कि देश के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जनजातीय समुदायों ने असंख्य बलिदान दिए। इन बलिदानों में वागड़ के संत श्री गोविंद गुरु के नेतृत्व में चल रहे भगत आंदोलन को कुचलने के लिए 17 नवम्बर सन् 1913 में मानगढ़ धाम पर अंग्रेजों द्वारा किया गया नरसंहार एक अत्यंत महत्वपूर्ण बलिदानी घटना है। मानगढ़ धाम की घटना भी जलियांवाला बाग हत्याकांड-1919 के समान ही उससे भी 6 वर्ष पूर्व हुआ भीषण नरसंहार था। यह आन्दोलन दक्षिण राजस्थान के भील समाज का अपनी राष्ट्रीय अस्मिता की रक्षा तथा जबरन धर्मांतरण की गतिविधियों के विरु‌द्ध था। भगत आंदोलन वन सहित अन्य दमनकारी औपनिवेशिक कानूनों एवं अंग्रेजी शासन के विरुद्ध श्रद्धेय गोविंद गुरु जी के नेतृत्व में एक अहिंसक स्वाधीनता आंदोलन था। इस आन्दोलन ने जनजाति समाज की परंपरागत संस्कृति, आस्था एवं जीवन मूल्यों को भी जागृत किया था। गुजरात एवं मध्यप्रदेश से लगते राजस्थान के बांसवाड़ा जिले में मानगढ़ पहाड़ी स्थित इस धाम में अंग्रेजी शासन द्वारा की गई क्रूरतापूर्वक गोलीबारी में 1500 से भी अधिक जनजातीय महिला-पुरुष, बच्चे मार गए।

इस क्रूर नरसंहार ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश एवं महाराष्ट्र के जनजाति क्षेत्रों में स्वतंत्रता संग्राम की ज्वाला को और अधिक प्रज्वलित कर दिया। आन्दोलन के दौरान “भूरेटीया नइ मानू, नइ मानू… दिल्ली में म्हारी कलम है..” अरे अंग्रेज मैं तुम्हारे शासन को नहीं मानता.. इस देश का सारा भू-भाग हमारा है, इन स्वरों के गीत गूंजने लगे जिसने सुदूर जंगल-जनजाति क्षेत्रों में भी अंग्रेजी शासन के विरुद्ध स्वाधीनता संग्राम की ज्वाला को पहुंचा दिया।

आज़ादी के बाद तत्कालीन सरकारों ने इन सारे तथ्यों, जनजातियों के गौरवशाली बलिदानों को हमारे इतिहास में, इतिहास की पाठ्य-पुस्तकों में समुचित स्थान नहीं देने का पाप किया है, जनजातियों का अपमान किया है। यह विडम्बना ही है कि स्वाधीनता संग्राम में दिए बलिदान को मान्यता दिलाने के लिए भी जनजाति समाज को मांग करनी पड़ रही है।

प्राचीन स्मारक तथा पुरातात्विक स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958 एवं कैबिनेट निर्णयों ‌द्वारा देश में स्वतंत्रता संग्राम से संबंधित अनेक स्थानों एवं घटनाओं को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त है, परंतु देश की स्वाधीनता के 80 वर्ष बाद भी मानगढ़ धाम को अभी तक वह राष्ट्रीय पहचान नहीं मिल सकी है, जिसका वह हकदार है। यह भी उल्लेखनीय है कि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिनांक 1 नवंबर, 2022 को मानगढ़ धाम का दौरा किया था तथा ‘मानगढ़ धाम की गौरव यात्रा’ कार्यक्रम में बलिदानी वीर, देशभक्त एवं स्वाभिमानी समाज और उसकी विरासत को नमन करते हुए अपनी श्र‌द्धांजलि दी। राष्ट्रपति महोदया ने भी दिनांक 4 अक्तूबर, 2024 को मानगढ़ धाम पहुंचकर जनजाति बलिदानियों को श्र‌द्धांजलि अर्पित की थी।

मानगढ़ धाम पर जनजातीय समुदाय द्वारा स्वतंत्रता एवं अस्मिता की रक्षा के लिए किए गए संघर्ष तथा उनके बलिदानों को दृष्टिगत रखते हुए राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग द्वारा उक्त स्थल को राष्ट्रीय धरोहर के रूप में मान्यता प्रदान किए जाने की संस्तुति भी की जा चुकी है। आयोग द्वारा डॉ. धर्मवीर शर्मा, सेवानिवृत्त निदेशक, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के नेतृत्व में गठित तीन सदस्यीय दल ने अगस्त 2022 में मानगढ़ धाम के ऐतिहासिक महत्त्व एवं बलिदानों का विस्तृत अध्ययन कर एक शोध-आधारित रिपोर्ट सरकार को प्रस्तुत की थी।

कल्याण आश्रम की स्पष्ट मान्यता है कि यह न केवल जनजातीय समाज के लिए, बल्कि इस सम्पूर्ण क्षेत्र के लिए गौरव की बात होगी कि देश के स्वतंत्रता संग्राम में योगदान देने वाले इस ऐतिहासिक आंदोलन एवं बलिदान को राष्ट्रीय स्तर पर उचित सम्मान प्रदान किया जाए। इसलिए कल्याण आश्रम का कार्यकारी मण्डल भारत सरकार से मांग करता है कि मानगढ़ धाम को अब बिना और समय गंवाए राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने के साथ ही इसके ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्त्व के अनुरूप मानगढ़ धाम का संरक्षण एवं विकास सुनिश्चित किया जाए। इससे यहाँ इस घटना के दबे पड़े और महत्वपूर्ण साक्ष्य भी उजागर होंगे।

राजस्थान, गुजरात एवं मध्यप्रदेश तीनों प्रान्तों की राज्य सरकारें इसमें सहयोगी बनें और अपने-अपने राज्यों के स्कूल-कॉलेज की पाठ्य-पुस्तकों में मानगढ़ के गौरवशाली इतिहास को समुचित स्थान दें।

कार्यकारी मण्डल इस क्षेत्र के सभी सामाजिक-धार्मिक नेताओं और निर्वाचित जन-प्रतिनिधियों से भी अपील करता है कि वे जनजातियों की अस्मिता और गौरव से जुड़े इस मुद्दे को सभी प्रकार के मतभेदों को भुलाकर सम्मिलित रूप से इसके लिए भरसक प्रयास करें।

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