धर्म परिवर्तन मात्र से नहीं मिलेगा पिछड़ा वर्ग मुस्लिम का दर्जा, सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार की अपील खारिज की

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  • Oct 15, 2026
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मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा; अदालत ने कहा—इस्लाम अपनाने से किसी अधिसूचित पिछड़े मुस्लिम समुदाय की सदस्यता स्वतः नहीं मिलती

नई दिल्ली।

सर्वोच्च न्यायालय ने तमिलनाडु सरकार को बड़ा कानूनी झटका देते हुए उस सरकारी आदेश को रद्द करने के मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है, जिसके तहत कुछ पिछड़े वर्गों, अति पिछड़े वर्गों, विमुक्त समुदायों और अनुसूचित जातियों से इस्लाम अपनाने वाले लोगों को ‘पिछड़ा वर्ग मुस्लिम’ का प्रमाणपत्र जारी करने का प्रावधान किया गया था। न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति चंद्रशेखर की पीठ ने राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी।

यह मामला तमिलनाडु सरकार के 9 मार्च 2024 के सरकारी आदेश से जुड़ा था। इसके तहत पहले से आरक्षण का लाभ ले रहे पिछड़े वर्गों, अति पिछड़े वर्गों और विमुक्त समुदायों के कुछ ऐसे लोगों को इस्लाम अपनाने के बाद राज्य में मान्यता प्राप्त सात पिछड़े मुस्लिम समुदायों में से किसी समुदाय का प्रमाणपत्र जारी करने की व्यवस्था की गई थी। मद्रास हाईकोर्ट ने 25 जून 2026 को इस आदेश को असंवैधानिक ठहराते हुए निरस्त कर दिया था।

धर्म परिवर्तन से समुदाय की सदस्यता स्वतः नहीं मिलती

सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि इस्लाम अपनाने मात्र से कोई व्यक्ति तमिलनाडु में अधिसूचित सात पिछड़े मुस्लिम समुदायों में से किसी एक का सदस्य नहीं बन जाता। धर्म परिवर्तन से पहले व्यक्ति जिस जाति या सामाजिक समुदाय से संबंधित था, उसकी पहचान और उससे जुड़ी सामाजिक स्थिति को स्वतः नए धार्मिक समुदाय में स्थानांतरित नहीं किया जा सकता।

अदालत के अनुसार, आरक्षण का लाभ प्राप्त करने के लिए संबंधित अधिसूचित समुदाय की सदस्यता और उससे जुड़ी कानूनी शर्तों को पूरा करना आवश्यक है। केवल धर्म परिवर्तन या पहले से मौजूद सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर किसी विशेष पिछड़े मुस्लिम समुदाय का दर्जा हासिल नहीं किया जा सकता।

अनुसूचित जाति के दर्जे पर संवैधानिक प्रावधान

संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के पैरा 3 में अनुसूचित जाति के दर्जे के लिए धर्म संबंधी शर्तें निर्धारित हैं। मौजूदा प्रावधान के तहत हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा अन्य धर्म मानने वाले व्यक्ति को अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जाता।

हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय के इस मामले का मुख्य प्रश्न यह था कि धर्म परिवर्तन के बाद किसी व्यक्ति को तमिलनाडु के अधिसूचित पिछड़े मुस्लिम समुदायों में शामिल मानने के लिए क्या केवल उसकी पूर्व सामाजिक पहचान पर्याप्त है। अदालत ने स्पष्ट किया कि पुराने सामाजिक दर्जे के आधार पर नए समुदाय की सदस्यता स्वतः नहीं मानी जा सकती।

तमिलनाडु सरकार की दलील नहीं आई काम

तमिलनाडु सरकार ने हाईकोर्ट के फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। सरकार की ओर से सरकारी आदेश को निरस्त करने की प्रक्रिया और हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र से संबंधित दलीलें भी रखी गईं। सर्वोच्च न्यायालय ने मामले की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

अदालत ने माना कि 9 मार्च 2024 का सरकारी आदेश पिछड़े वर्ग मुस्लिम समुदाय की सदस्यता निर्धारित करने के लिए आवश्यक सामाजिक और कानूनी आधार सुनिश्चित नहीं करता। इसी आधार पर हाईकोर्ट द्वारा आदेश को निरस्त किए जाने के फैसले को बरकरार रखा गया।

इस फैसले से स्पष्ट हुआ है कि आरक्षण संबंधी लाभों के लिए केवल धर्म परिवर्तन या पूर्व जातिगत पहचान पर्याप्त नहीं है। संबंधित समुदाय की वैधानिक सदस्यता और लागू संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप पात्रता का निर्धारण आवश्यक है। <Cite refs={["turn751480search4","turn751480search6"]}/>

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