बस्तर में सुरक्षा कैंप अब बन रहे जनसेवा के केंद्र, 70 कैंपों को ‘शहीद वीर गुंडाधुर सेवा डेरा’ में बदलने की पहल

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  • Oct 26, 2026
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दूरदराज के गांवों तक पहुंच रहीं सरकारी योजनाएं, एक ही छत के नीचे डिजिटल सेवाएं, बैंकिंग, स्वास्थ्य और कौशल प्रशिक्षण की सुविधा

महिला स्व-सहायता समूहों को मिल रहा स्वरोजगार का संबल, इमली प्रसंस्करण और पारंपरिक ढेंकी से चावल तैयार कर बढ़ा रहीं आय

रायपुर, 26 अक्टूबर 2026। 

कभी नक्सल हिंसा और दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के कारण बुनियादी सुविधाओं से दूर रहे बस्तर के गांवों में अब विकास और जनविश्वास की नई कहानी लिखी जा रही है। जिन क्षेत्रों में कभी भय का माहौल था, वहां सुरक्षा कैंप अब जनसेवा और विकास के केंद्र के रूप में विकसित किए जा रहे हैं। बस्तर के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में स्थापित लगभग 200 सुरक्षा कैंपों को ‘शहीद वीर गुंडाधुर सेवा डेरा’ के रूप में विकसित करने की योजना पर काम चल रहा है। पहले चरण में 70 कैंपों को सेवा डेरों में बदला जा रहा है।

इन केंद्रों के माध्यम से ग्रामीणों को डिजिटल सेवाएं, बैंकिंग सुविधाएं, कौशल प्रशिक्षण और स्वरोजगार से जुड़ने के अवसर उपलब्ध कराए जा रहे हैं। इससे दूरस्थ क्षेत्रों के लोगों को स्थानीय स्तर पर जरूरी सुविधाएं मिलने के साथ समय और संसाधनों की बचत हो रही है।

विकास की मुख्यधारा से जुड़ रहा बस्तर

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में बस्तर को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने के प्रयास किए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के संकल्प से बस्तर नक्सलवाद के प्रभावों से मुक्त होने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। सरकार का लक्ष्य बस्तर को देश के अग्रणी विकसित जनजातीय क्षेत्रों में शामिल करना है।

‘नियद नेल्ला नार’ योजना के माध्यम से सुदूर अंचलों तक सड़क, बिजली, पेयजल, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं पहुंचाने पर जोर दिया जा रहा है। वहीं, कृषि, पशुपालन और सिंचाई से जुड़ी योजनाओं के माध्यम से ग्रामीणों की आजीविका मजबूत करने के प्रयास किए जा रहे हैं।

शहीद वीर गुंडाधुर के नाम पर जनसुविधा केंद्र

केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने 18 मई 2026 को बस्तर जिले के नेतानार स्थित सीआरपीएफ कैंप परिसर में देश के पहले ‘शहीद वीर गुंडाधुर सेवा डेरा’ जनसुविधा केंद्र का उद्घाटन किया था। अब इस पहल का विस्तार किया जा रहा है।

नेतानार बस्तर के जननायक शहीद वीर गुंडाधुर की जन्मस्थली है। वर्ष 1910 के ऐतिहासिक भूमकाल विद्रोह में गुंडाधुर ने आदिवासी अस्मिता, स्वाभिमान और जल-जंगल-जमीन के अधिकारों के लिए अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध संघर्ष किया था। इसी ऐतिहासिक भूमि पर स्थापित सेवा डेरा अब स्थानीय समुदायों को सरकारी सुविधाओं से जोड़ने और स्वावलंबन को बढ़ावा देने के केंद्र के रूप में विकसित हो रहा है।

एक ही छत के नीचे मिल रहीं सरकारी सेवाएं

पहले बस्तर के ग्रामीणों को आधार कार्ड बनवाने, बैंक खाता खुलवाने और जाति, निवास या आय प्रमाण पत्र प्राप्त करने जैसे कार्यों के लिए कई किलोमीटर दूर जाना पड़ता था। सेवा डेरा के माध्यम से अब ऐसी अनेक सुविधाएं स्थानीय स्तर पर उपलब्ध कराई जा रही हैं।

इन केंद्रों पर आधार कार्ड बनवाने और अपडेट कराने, केवाईसी, मोबाइल नंबर लिंक करने तथा जन्म-मृत्यु, आय और जाति प्रमाण पत्र से संबंधित ऑनलाइन सेवाओं की सुविधा दी जा रही है। इसके साथ ही बैंकिंग, स्वास्थ्य परामर्श, आंगनबाड़ी और प्राथमिक शिक्षा जैसी बुनियादी सेवाओं तक ग्रामीणों की पहुंच आसान बनाने का प्रयास किया जा रहा है।

बैंक सखियों के माध्यम से गांव में बैंकिंग सुविधा

ग्रामीण महिलाओं को बैंक सखी के रूप में प्रशिक्षित किया जा रहा है। इसके माध्यम से गांवों में ही पैसे निकालने, जमा करने और बैंक खातों से जुड़ी सेवाएं उपलब्ध कराने में मदद मिल रही है। स्थानीय स्तर पर बैंकिंग सुविधा मिलने से दूरस्थ क्षेत्रों के ग्रामीणों को छोटी-छोटी जरूरतों के लिए लंबी दूरी तय करने की आवश्यकता कम हो रही है।

महिला स्व-सहायता समूहों से बढ़ रहे स्वरोजगार के अवसर

शहीद वीर गुंडाधुर सेवा डेरा स्थानीय संसाधनों और पारंपरिक कौशल को आजीविका से जोड़ने का माध्यम भी बन रहा है। नेतानार में गुंडाधुर महिला स्व-सहायता समूह की महिलाएं इमली का प्रसंस्करण कर इमली का पल्प तैयार कर रही हैं। समूह की सदस्य लंबी नाग के अनुसार, इस कार्य से जुड़कर महिलाएं सालाना एक लाख रुपये तक की आय अर्जित करने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं।

सेवा डेरा की सुविधाओं से ग्रामीण महिलाओं की रोजमर्रा की परेशानियां भी कम हो रही हैं। उदाहरण के तौर पर, सुखदेवी जैसी महिलाओं को अब अपनी छोटी बच्ची का आधार कार्ड बनवाने के लिए दूर नहीं जाना पड़ता।

महिलाएं पारंपरिक ढेंकी से चावल तैयार कर उसकी बिक्री के माध्यम से अतिरिक्त आमदनी भी अर्जित कर रही हैं। इस प्रक्रिया में निकलने वाली धान की भूसी का उपयोग पशु आहार के रूप में किया जा रहा है। इसके अलावा, सिलाई प्रशिक्षण केंद्र के माध्यम से महिलाओं को हुनर सिखाकर आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास किया जा रहा है।

उत्पादों की पैकेजिंग और ब्रांडिंग पर जोर

बस्तर के स्थानीय उत्पादों को बड़े बाजारों तक पहुंचाने के लिए उनकी गुणवत्ता, पैकेजिंग और ब्रांडिंग पर भी ध्यान दिया जा रहा है। हाल ही में अहमदाबाद स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजाइन की टीम ने नेतानार पहुंचकर सिलाई, इमली प्रसंस्करण और पारंपरिक ढेंकी से चावल तैयार करने से जुड़ी गतिविधियों का जायजा लिया। टीम ने उत्पादों की आकर्षक पैकेजिंग और ब्रांडिंग की संभावनाओं पर चर्चा की।

इस पहल से स्थानीय महिलाओं के उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचाने के अवसर विकसित हो सकते हैं। इससे पारंपरिक कौशल को प्रोत्साहन मिलने के साथ ग्रामीण महिलाओं के लिए रोजगार और आय के नए रास्ते खुलने की संभावना है।

शहीद वीर गुंडाधुर की धरती पर सुरक्षा कैंपों को सेवा डेरा के रूप में विकसित करने की पहल बस्तर में सुरक्षा व्यवस्था के साथ जनसुविधाओं और आजीविका के अवसरों के विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इसका उद्देश्य दूरदराज के गांवों तक सरकारी सेवाएं पहुंचाना, स्थानीय संसाधनों का बेहतर उपयोग करना और ग्रामीणों को आत्मनिर्भर बनने के अवसर उपलब्ध कराना है।

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