अमित शाह की मौजूदगी में चार दशक पुरानी किशाऊ परियोजना पर बनी सहमति

चार दशक पुरानी किशाऊ परियोजना पर बनी सहमति, छह राज्यों ने मिलकर खोला विकास का रास्ता

 

अमित शाह की मौजूदगी में छह राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने समझौते पर किए हस्ताक्षर, परियोजना का 90% खर्च उठाएगी केंद्र सरकार

नई दिल्ली, 15 सितंबर। करीब चार दशक से लंबित किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना पर आखिरकार छह राज्यों के बीच सहमति बन गई। केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह और केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी. आर. पाटिल की मौजूदगी में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली और हरियाणा के मुख्यमंत्रियों ने परियोजना समझौते पर हस्ताक्षर किए। समझौते को अंतरराज्यीय जल सहयोग और सहमति से समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

समझौते के बाद अमित शाह ने इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास’ तथा ‘टीम भारत’ की भावना का उदाहरण बताया। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार के कार्यकाल में यह दसवां जल विवाद है, जिसका समाधान होने जा रहा है। उनके अनुसार 2018 से 2026 तक का दौर उत्तर भारत में आपसी सहमति से लंबे समय से लंबित जल विवादों को सुलझाने के कालखंड के रूप में जाना जाएगा।

छह राज्यों को मिलेगा परियोजना का लाभ

किशाऊ परियोजना से हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली को अलग-अलग रूप में लाभ मिलेगा। इसे राष्ट्रीय परियोजना घोषित किया गया है। परियोजना की लगभग 90 प्रतिशत वित्तीय जिम्मेदारी केंद्र सरकार उठाएगी, जबकि शेष 10 प्रतिशत राशि 1994 के समझौते के अनुसार भागीदार राज्यों द्वारा वहन की जाएगी।

परियोजना के तहत उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की सीमा पर बहने वाली टोंस नदी पर 232.6 मीटर ऊंचा कंक्रीट ग्रेविटी डैम बनाया जाएगा। इसमें 1,562 मिलियन क्यूबिक मीटर जल संग्रहण की क्षमता होगी। इससे करीब 97 हजार हेक्टेयर भूमि की सिंचाई और 1,476 मिलियन यूनिट स्वच्छ जलविद्युत उत्पादन का लक्ष्य है।

दिल्ली और यमुना को मिलेगा बड़ा फायदा

परियोजना से दिल्ली और यमुना को विशेष लाभ मिलने की उम्मीद है। अमित शाह ने कहा कि यमुना के जल बंटवारे के समय पर्यावरणीय प्रवाह का पर्याप्त ध्यान नहीं रखा गया और उपलब्ध जल राज्यों के बीच बांट दिया गया। नदी के लिए आवश्यक जल छोड़े जाने की व्यवस्था नहीं हो सकी।

उन्होंने कहा कि किशाऊ परियोजना से 25 प्रतिशत जल उपलब्ध होगा, जो दिल्ली और यमुना दोनों के लिए महत्वपूर्ण होगा। इससे यमुना के पर्यावरणीय प्रवाह को बनाए रखने और उसके संरक्षण में मदद मिलेगी।

‘संवाद से समाधान’ से आगे बढ़ी परियोजना

अमित शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी के ‘संवाद से समाधान’ के मंत्र के तहत लंबे समय से लंबित परियोजना को आगे बढ़ाया गया। उन्होंने बताया कि 12 मई 1994 को बेसिन में आने वाली प्रत्येक भंडारण परियोजना के लिए अलग-अलग समझौते करने की व्यवस्था तय हुई थी। इसके बाद लखवार और रेणुकाजी परियोजनाओं से जुड़े विवादों के समाधान के बाद किशाऊ परियोजना का रास्ता भी साफ हुआ।बीते 16 जून को परियोजना पर औपचारिक सहमति बनी थी। इसके बाद जल शक्ति मंत्रालय ने तकनीकी और आर्थिक पहलुओं पर विचार करते हुए सभी राज्यों के हितों को ध्यान में रखकर समझौते को अंतिम रूप दिया।

2018 से जल विवादों के समाधान की लंबी कड़ी

गृह मंत्री ने कहा कि अगस्त 2018 में लखवार बहुउद्देशीय परियोजना और शाहपुर कंडी बांध परियोजना से जुड़े विवादों का समाधान हुआ। 2019 में ऊपरी यमुना बेसिन की रेणुकाजी बहुउद्देशीय बांध परियोजना पर सहमति बनी। 2021 में केन-बेतवा लिंक परियोजना पर मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बीच समझौता हुआ।

इसके बाद 2024 में संशोधित पार्वती-कालीसिंध-चंबल रिवर लिंक योजना आगे बढ़ी और फरवरी 2024 में हथिनीकुंड से भूमिगत पाइपलाइन के जरिए यमुना तक जल अंतरण की योजना को मंजूरी मिली। जुलाई 2026 में नर्मदा परियोजना से विस्थापित परिवारों के पुनर्वास का विवाद और अगस्त 2026 में सोन बेसिन में बिहार-झारखंड के बीच जल बंटवारे का विवाद सुलझा। अब किशाऊ परियोजना पर सहमति इस कड़ी में एक और महत्वपूर्ण पड़ाव है।

यमुना की सफाई से गंगा की स्वच्छता भी जुड़ी

अमित शाह ने यमुना की स्वच्छता को गंगा की स्वच्छता से सीधे जुड़ा विषय बताया। उन्होंने कहा कि यमुना अंततः प्रयागराज में गंगा में मिलती है, इसलिए यमुना की स्वच्छता के बिना गंगा की स्वच्छता का लक्ष्य भी पूरा नहीं हो सकता।

उन्होंने कहा कि सभी संबंधित राज्य और केंद्र सरकार यमुना को स्वच्छ बनाने की दिशा में मिलकर काम कर रहे हैं। किशाऊ परियोजना से पेयजल, कृषि, विकास और औद्योगिक उपयोग के लिए जल उपलब्ध कराने के साथ यमुना के पर्यावरणीय प्रवाह को बनाए रखने में भी मदद मिलेगी।

किशाऊ समझौता इस मायने में महत्वपूर्ण है कि वर्षों से लंबित जल परियोजना अब छह राज्यों की सहमति, केंद्र के बड़े वित्तीय सहयोग और साझा हितों के आधार पर आगे बढ़ेगी।

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