बस्तर की समस्याओं का समाधान सेमिनार से नहीं, जमीन पर उतरकर काम करने से होगा: भय्याजी जोशी

  • Admin
  • Oct 26, 2026
  • 1,872 views

‘बस्तर की शोधयात्रा’ वृत्तचित्र का पुणे में अनावरण, जनजातीय समाज के बीच विश्वास और सेवा कार्यों की भूमिका पर दिया जोर

डॉ. राम गोडबोले बोले—35 वर्षों की अशांति में 12 हजार जनजातीय लोगों की मौत, 65 हजार परिवारों को करना पड़ा विस्थापन का सामना

पुणे, 25 अक्टूबर 2026। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय कार्यकारिणी के सदस्य भय्याजी जोशी ने कहा कि जनजातीय समाज की समस्याओं का समाधान केवल चिंता व्यक्त करने या परिसंवाद आयोजित करने से नहीं हो सकता। इसके लिए उनकी समस्याओं को गहराई से समझकर प्रत्यक्ष क्षेत्र में उतरना और धरातल पर काम करना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और वनवासी कल्याण आश्रम के कार्यकर्ता दशकों से इसी दृष्टिकोण के साथ काम कर रहे हैं, जिसके परिणामस्वरूप जनजातीय समाज के जीवन में सकारात्मक बदलाव दिखाई दे रहे हैं।

जोशी पुणे के एस.पी. कॉलेज स्थित लेडी रमाबाई सभागार में छत्तीसगढ़ के बारसूर की ‘बनफूल’ संस्था के तत्वावधान में आयोजित ‘बस्तर की शोधयात्रा’ वृत्तचित्र के अनावरण समारोह को संबोधित कर रहे थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता पद्मश्री दादा लाड ने की। मंच पर पद्मश्री सुनीता गोडबोले, डॉ. राम गोडबोले और पद्मश्री डॉ. बुधरी ताती उपस्थित रहे।

‘आदिवासी’ शब्द के इस्तेमाल पर जताई आपत्ति

भय्याजी जोशी ने आपातकाल के बाद जनजातीय क्षेत्रों में योजनाबद्ध तरीके से काम करने के संघ के संकल्प का उल्लेख करते हुए कहा कि समाज में कुछ ऐसी धारणाएं स्थापित की गईं, जिनसे जनजातीय समाज और देश के अन्य हिस्सों के बीच कृत्रिम दूरी पैदा हुई। उन्होंने ब्रिटिश शासनकाल में ‘आदिवासी’ शब्द के प्रयोग का उल्लेख करते हुए आरोप लगाया कि इसके जरिए जनजातीय समाज को देश की व्यापक सांस्कृतिक परंपरा से अलग दिखाने का प्रयास किया गया।

उन्होंने कहा कि महानगरों की चकाचौंध और वहां के जीवन के मानकों से वनवासी क्षेत्रों की समस्याओं का आकलन नहीं किया जा सकता। अज्ञानता और गरीबी के कारण इन क्षेत्रों में पिछड़ापन आया है। ऐसे में जनजातीय समाज की अंतर्निहित प्रतिभा और क्षमताओं को पहचानकर उन्हें आगे बढ़ने के अवसर उपलब्ध कराना जरूरी है।

सेवा कार्यों से जनजातीय समाज में बना विश्वास

जोशी ने वनवासी कल्याण आश्रम के कार्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि संगठन ने जनजातीय समाज की परिस्थितियों और समस्याओं को करीब से समझने वाले समर्पित कार्यकर्ताओं को तैयार किया है। इन कार्यकर्ताओं ने अपने सेवा कार्यों के माध्यम से समाज में विश्वास अर्जित किया है।

उन्होंने कहा कि असम से लेकर बस्तर तक संघ और विभिन्न सेवा गतिविधियों के माध्यम से राष्ट्रीय एकात्मता की भावना को मजबूती मिली है। उन्होंने यह भी कहा कि शासन के प्रयासों और सरकार की संवेदनशीलता के चलते बस्तर में नक्सलवाद और भ्रष्टाचार की चुनौतियों से निपटने की दिशा में बदलाव दिखाई दे रहे हैं। उनके अनुसार, इससे समस्याओं के स्थायी समाधान की संभावनाएं बढ़ी हैं।

साढ़े तीन दशक की अशांति से बस्तर को हुआ नुकसान

कार्यक्रम में डॉ. राम गोडबोले ने बस्तर के पिछले तीन दशकों के संघर्षपूर्ण इतिहास पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि स्वर्गीय भास्करराव कलंबी ने उन्हें बस्तर की यात्रा करने के लिए प्रेरित किया था। उन्होंने कहा कि राजशाही और अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष का इतिहास रखने वाला बस्तर और अबूझमाड़ क्षेत्र लंबे समय तक उपेक्षा का सामना करता रहा।

गोडबोले के अनुसार, पिछले 35 वर्षों में बस्तर में नक्सली हिंसा के कारण 12 हजार जनजातीय लोगों की जान गई, जबकि 65 हजार वनवासी परिवारों को घर-बार छोड़कर विस्थापन का सामना करना पड़ा।

उन्होंने कहा कि जनजातीय समाज पुरुषार्थ और धैर्य के साथ कठिन परिस्थितियों का सामना करने में सक्षम है। ‘बनफूल’ संस्था, ज्ञान प्रबोधिनी और दीनानाथ मंगेशकर अस्पताल द्वारा शुरू किए गए सेवा कार्यों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि बस्तर में बदलाव के इस दौर में देश के युवाओं को वहां के लोगों के साथ मजबूती से खड़ा होना चाहिए।

सम्बन्धित खबरें

कोई सम्बन्धित खबर नहीं मिली।