समाजवादी विचारधारा पर आधारित लोक-कल्याणकारी राज्य की अवधारणा समाज को अक्षम, अकर्मण्य और अपाहिज बनाती है। सरकार के ऊपर समाज की अत्यधिक निर्भरता समाज में एक विशिष्ट प्रकार की पराधीनता का सृजन करती है। समाज अपने स्वावलम्बन के लिए नहीं लड़ता है बल्कि राज्य से निःशुल्क क्या प्राप्त हो सके, इसके लिए लड़ता है।

यथार्थ यह है कि राज्य  समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति समाज के कर द्वारा ही करता है, लेकिन जब समाज की आवश्यकता समाज के कर से पूरी नहीं होती तब वह कुछ विशेष  करदाताओं अर्थात् पूंजीपतियों के आश्रित हो जाता है। जैसे-जैसे समाज में निःशुल्क आकांक्षाओं की वृद्धि होती है वैसे-वैसे समाजवादी अवधारणा का लोक-कल्याणकारी राज्य पूंजीपतियों की गोद में खेलने लगता है। यही समाजवाद और पूंजीवाद की अंतःक्रिया है। 

कोई समाज जो स्वतंत्रता का उपभोग करना चाहता है उसे स्वावलम्बी बनना ही पड़ेगा। राज्य के सामने कटोरा लेकर खड़ा हुआ समाज प्रलोभनों के वशीभूत अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए केवल पेण्डुलम की तरह इधर-उधर, कभी इसके प्रलोभन से तो कभी उसके प्रलोभन से दोलायमान हो सकता है। इस अवस्था में राज्य चाहे जिसका हो उसे समाज की निःशुल्क आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए पूंजीवाद की शरण में जाना ही पड़ेगा।

राज्य को प्रेरित करने वाली समाजवाद और पूंजीवाद ये दोनों ही अवधारणाएं मानव की पूर्ण स्वतंत्रता की पोषक नहीं हो सकतीं। पूर्ण स्वावलम्बी समाज ही अपनी स्वतंत्रता का उपभोग कर सकता है। इसके लिए कुछ पूंजीपतियों के उत्पादन और उपभोग पर आधारित जीडीपी का आंकड़ा नहीं विकेन्द्रित अर्थव्यवस्था, उत्पादन प्रणाली, कर्मशील समाज और भिखारीपने की प्रवृत्ति से मुक्ति आवश्यक है। सदैव मुफ्तखोरी की प्रवृत्ति समाज को अकर्मण्य, जड़ और कर्तव्यहीन ही नहीं, बल्कि व्यवस्था की दृष्टि में आत्म-सम्मानहीन खिलौना बनाती है

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