हिन्दू धर्म का आधार वेदों को माना जाता है। वेद ऋषियों के अनुभव, अनुसंधान और दर्शन कृत मंत्रों के संकलन हैं। 
ऋक्, यजु, साम और अथर्व इन चार वेदों में तीन ऋक्, यजु और साम को त्रयी के रूप में प्रधानता प्राप्त है। इन वेदों में अपार ज्ञान राशि समाहित है, लेकिन इनका निचोड़ क्या है?

ऋषियों ने कहा तीनों वेदों का निचोड़ गायत्री मंत्र में है अर्थात् सम्पूर्ण वेद का मूल हेतु गायत्री में समाहित है। प्रश्न उठता है कि गायत्री का क्या संदेश है?

ॐ भूर्भुवः स्वः।
तत्सवितुर्वरेण्यं।
भर्गो देवस्य धीमहि।
धियो यो नः प्रचोदयात्॥

गायत्री की तीन व्याहृतियाँ हैं और तीन चरण (पद) हैं। भूः, भूवः और स्वः व्याहृतियों के माध्यम से पृथ्वी, द्यु और अंतरिक्ष तीन लोकों, शरीर, प्राण और चेतना तथा जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति तीन अवस्थाओं की बात की गयी है। 

अब इन तीन अवस्थाओं में मनुष्य रूपी जीव को क्या चाहिए, इसका वर्णन आगे के तीन पदों में किया गया है।

पहले पद में कहा गया है उस वरणीय सविता देवा। सविता अर्थात् सूर्योदय कालीन लालीमा की आभा से युक्त सूर्य। अब प्रश्न उठता है कि उन श्रेष्ठ सूर्य देव का हम क्या करें?

अगले पद में कहा गया है, उस देवता के किरणों का हम ध्यान करें। अब प्रश्न उठता है कि उस दिव्य प्रकाश का ध्यान हम किस लिए करें? 

तब उत्तर देते हैं, जो हमारी बुद्धि को प्रेरित करे अर्थात् बुद्धि की सद् प्रेरणा के लिए हम उसका ध्यान करें।

यहाँ ध्यान देने की बात है कि एक वचन की बात नहीं है, बहु वचन की बात है। सबकी बुद्धि सद्प्रेरणा युक्त हो यही वेदों का मूल ध्येय है अर्थात् चिन्तन सामर्थ्य को जाग्रत करना, व्यक्ति को सद्विचारवान् बनाना यही वेदों का निचोड़ है और यही हिन्दू संस्कृति का मूल ध्येय है, इसलिए गायत्री मंत्र को सबसे प्रधान मंत्र माना जाता है।

भारतीय संस्कृति यह कभी नहीं प्रेरणा देती है कि बिना विचार किए हुए किसी एक के पीछे केवल शारीरिक रूप से संगठित होकर जगत में आतंक मचाओ, बल्कि यह प्रेरणा देती है कि सभी लोग सद्विचार युक्त हों। सद्विचारों से युक्त समाज स्वतः जगत कल्याण के लिए एक समान दिशा में आगे बढ़ता है। सद्विचार की क्षमता से रहित केवल शरीर के धरातल पर संगठित समूह केवल स्वार्थों की लड़ाई का अखाड़ा बनकर समाज को नष्ट-भ्रष्ट करता है।

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