किसी देश की महानता उसके तकनीकी ज्ञान में श्रेष्ठ होने या अधिक संपन्न होने मात्र से नहीं होती। अपितु, एक राष्ट्र अपनी विशिष्ट सभ्यता, ऐतिहासिक व गौरवशाली संस्कृति से महान माना जाता है। हम भारतवर्ष के कई विद्यालयों में एक पंक्ति लिखी हुई देखते हैं - ‘मेरा भारत महान’। यह कोई साधारण पंक्ति नहीं है, अपितु यह पंक्ति बोलते ही हमारे अंतःकरण या मन में अपनी संस्कृति के प्रति गौरव का बोध होता है। दशरथनंदन राम ने सोने की लंका को त्यागकर मातृभूमि (जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी) का चयन किया। वीर महाराणा प्रताप, अहिल्याबाई होलकर, रानी दुर्गावती, रानी लक्ष्मीबाई, लाचित बरफुकन, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, नेताजी सुभाषचंद्र बोस, वीर सावरकर, शचींद्र सान्याल जैसे हमारे पूर्वजों और क्रांतिकारियों ने मातृभूमि (वीरभोग्या वसुंधरा) के निमित्त अपने प्राणों को न्योछावर कर दिया। वे जानते थे कि यह हमारी मातृभूमि शस्य श्यामला भारतभूमि है और वंदे मातरम् इस मातृभूमि (माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः) का जयघोष है।
बंकिमबाबू वंदे मातरम् में लिखते हैं - ‘त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी, कमला कमलदलविहारिणी, वाणी विद्यादायिनी’ अर्थात् हे मां, तुम दश भुजाओं से युक्त हो और शत्रुओं का संहार करने में सक्षम हो, तुम कमलदल से युक्त सरोवर में विहार करने वाली देवी लक्ष्मी हो और तुम ही विद्या की देवी सरस्वती हो। यहां पर बंकिमचंद्र के दुर्गा दशप्रहरणधारिणी से आशय ब्रिटिश साम्राज्य का संहार और उनके भारत को स्वाधीन करने से है, जिसको जानकर क्रांतिकारी प्रेरित होते थे और कमलदलविहारिणी से आशय लक्ष्मी के आगमन अर्थात् भारतीय समृद्धि, धन (जो कि अंग्रेज लूट रहे थे) से था।

दूसरी ओर, वाणी विद्यादायिनी कहकर वे वाग्देवी सरस्वती को संबोधित कर स्वबोध या भारतकेंद्रित शिक्षा के लिए भारतीयों को प्रेरित करना चाह रहे थे, क्योंकि अंग्रेजों ने भारत की शिक्षा व्यवस्था को भारतीय सनातन संस्कृति का (मैकाले शिक्षानीति के कारण) प्रतिकूल बना दिया था। स्थानीय युवाओं को भारतीय देष में अंग्रेजी मानस का बनाया जा रहा था। जब अंग्रेजों को इन भावों का अनुभव हुआ, तो वे स्वयं भारतकेंद्रित इस वंदे मातरम् के विरुद्ध हो गये थे। वे भारत माता की जय और वंदे मातरम् जैसे नारों से चिढ़ते थे। इसके माहात्म्य में कुछ अन्य तथ्य भी प्रासंगिक हैं, जैसे - 1927 में महात्मा गांधी ने कहा था कि वंदे मातरम् हमारे सामने संपूर्ण भारत का एक ऐसा चित्र उपस्थित कर देता है, जो कि अखंड है। महर्षि अरविंद कहते थे कि यह एक ऐसा मंत्र है, जो आत्मबल जगाता है। वहीं भीखाजी कामा ने तो भारत के तात्कालिक राष्ट्रीय ध्वज के मध्य में ही वंदे मातरम् लिख दिया था। इसका महत्वपूर्ण कारण यह था कि यह मंत्र भारतीयों को केवल जगाता ही नहीं था, अपितु आत्मबोध भी कराता था। जिस कारण भारत की स्वाधीनता हेतु अनेक वीरों ने वंदे मातरम् कहकर स्वयं का बलिदान दे दिया। वे इस गीत को गाते-गाते फांसी पर हंसते-हंसते झूल गये, क्योंकि इस मंत्र ने उनमें आत्मबल का जागरण किया था।

क्रांतिकारियों के लिए अग्निपथ का राही
आज की बात करें, तो हम युवाओं के उद्बोधनों में अक्सर उत्साह और साहस से ओत-प्रोत कुछ पंक्तियां सुनते हैं - ‘संघर्षों के साये में इतिहास हमारा चलता है, जिस ओर जवानी चलती है, उस ओर जमाना चलता है।’ निःसंदेह, ये पंक्तियां युवाओं में उत्साह भर देती हैं, उनके गर्म लहू को साहस की कड़ाही में तलकर उबाल देती हैं। इसी प्रकार, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भी युवाओं की सक्रिय सहभागिता थी और उनके लहू को उबालने का कार्य वंदे मातरम्, भारत माता की जय जैसे नारों ने किया। वैश्विक स्वतंत्रता संग्रामों में भी हमें यह रोचक तरीका दिखाई देता है। उदाहरणस्वरूप - फ्रांसीसी क्रांति में ला मार्सेलाइज, इटली में फासीवाद के विरोध में बेल्ला सिआओ, बांग्लादेशी स्वतंत्रता के समय आमार सोनार बांग्ला, आयरलैंड के स्वतंत्रता संग्राम में द फोली ड़ेव, पोलैंड के स्वतंत्रता संग्राम में माजुरेक डाब्रोवसिगो आदि गीत क्रांति के वाचक या मुख्य थीम बन गये थे, ऐसे हमारे पास अनेक उदाहरण हैं। भारतीय संदर्भ में, यही स्थिति वंदेमातरम् की थी, भारत में यह गीत क्रांतिकारियों के लिए अग्निपथ का राही बन गया था।


 वंदे मातरम्  यह गीत रामायण, महाभारत या गीता की भांति आज भी हमारे मन में एक विशेष स्थान रखता है। भारत में ब्रिटिश शासन के प्रति आक्रोश और अपने देशवासियों, युवाओं व क्रांतिकारियों में उत्साह उत्पन्न करने के लिए यह गीत अत्यधिक लोकप्रिय हुआ। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान बच्चे, युवा, वृद्ध और प्रत्येक भारतीय अपनी जुबान पर यह गीत गुनगुनाता था। एक ओर, प्रभात फेरियों में बच्चे वंदे मातरम् के नारे लगाते थे, तो दूसरी ओर युवा तरुणाई वंदे मातरम् बोलते हुए अंग्रेजों पर प्रतिघात करते थे या वंदे मातरम् कहते हुए अंग्रेजों सरकार का कुठाराघात सहन करते थे, जिसे बंकिमचंद्र चटर्जी के द्वारा 1875 में लिखा गया था।

जब वर्ष 1885 में अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का गठन हुआ, तो उसके द्वितीय अधिवेशन (1886) में इस गीत का सस्वर गायन हुआ। गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने इस गीत को स्वर व संगीत दिया था। किंतु, यह लोकप्रिय रूप से सामान्य जनता के मुख पर 1905 में हुए बंग भंग आंदोलन के दौरान आया। 7 अगस्त, 1905 को कलकत्ता के टाउन हॉल में बंग भंग के विरोध में एक विशाल जनसैलाब उमड़ा था, जिसमें वंदे मातरम् को लोक-स्वीकृति मिली। बिपिनचंद्र पाल ने इसे दक्षिण भारत पहुंचाया, तो लाला लाजपत राय ने एक पत्रिका का उर्दू में संपादन कर उसका नाम ही वंदे मातरम् रख दिया। इसी समय 1907 में वीर सावरकर ने लंदन में स्वर्ण जयंती के आयोजन पर वंदे मातरम् का बैज लगाकर इसे अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया।


वंदे मातरम् पर मतभेद - कांग्रेस के वर्ष 1901 में आयोजित वार्षिक अधिवेशन में यह सुनिश्चित किया गया था कि भविष्य के वार्षिक अधिवेशनों का प्रारंभ और अंत वंदे मातरम् से किया जाएगा और यह परंपरा 1922 तक बनी रही। किंतु, भारतीय स्वाधीनता संग्राम के समय अंग्रेजों की फूट डालो, राज करो की नीति, मुस्लिम लीग का उभार और उस लीग पर मुस्लिम कट्टरपंथियों का अत्यधिक प्रभाव के कारण कांग्रेस अधिवेशनों में हमारे राष्ट्रीय गीत के गायन के विरोध में स्वर सुनाई देने लगे। कांग्रेस के वर्ष 1923 के राष्ट्रीय अधिवेशन (काकीनाडा) के अध्यक्ष मौलाना मोहम्मद अली जौहर ने वंदे मातरम् गायन के खिलाफ अपनी आपत्ति प्रकट की। किंतु पूर्वनिर्धारित कार्यक्रमानुसार पं. विष्णु दिगंबर पलुस्कर के द्वारा इस अधिवेशन में वंदे मातरम् गाया गया। एक ओर बात, वंदे मातरम् के जिन कुछ अंशों को लेकर यह असहजता व्यक्त की गयी थी, वे थे - 'रिपुदल वारिणीं, तोमारई प्रतिमा गड़ि मंदिरे मंदिरे।' यद्यपि बिपिनचंद्र पाल, रामानंद चट्टोपाध्याय (तत्कालिक अंग्रेजी अखबार मोडर्न व्यू के संस्थापक) और मौलाना रजा उल करीम जैसे प्रबुद्धजनों ने मुसलमानों और मुस्लिम लीग को बहुत समझाने का प्रयत्न किया, तथापि वह पर्याप्त नहीं था। मौलाना रजा उल करीम तो लिखते हैं - 'वंदे मातरम् शब्द को यदि हम उर्दू में अनुवाद करें, तो वह होगा - ऐ मादरे वतन, मैं तुझे सलाम करता हूं। इसमें आपत्तिकनक क्या है?' किंतु, कट्टरपंथी मुसलमानों ने उनकी एक बात नहीं सुनी। अंततः, वर्ष 1937 में आयोजित कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन में जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता वाली समिति ने वंदे मातरम् के मात्र प्रारंभिक दो छंद गाने की उद्घोषणा की अर्थात् मुस्लिम लीग के प्रस्ताव को मंजूर कर लिया।


इस अधिवेशन में महात्मा गांधी और नेताजी सुभाषचंद्र बोस अनुपस्थित थे। नेताजी को उक्त प्रस्ताव के विषय में सूचना थी, तो उन्होंने गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के माध्यम से इस प्रस्ताव के विरुद्ध एक पत्र लिखकर अपनी प्रतिक्रिया दी और उनसे आग्रह किया कि वे एक पत्र लिखकर महात्मा गांधी से कहेंगे कि वे नेहरू को समझाएं, जिससे वे वंदे मातरम् में काट-छांट करने से बचें, क्योंकि यह देश के भविष्य के लिए उचित नहीं है। उस समय इस संदर्भ में, महात्मा गांधी ने जवाहरलाल नेहरू को एक पत्र लिखकर भेजा और अधिवेशन में उसके वाचन करने का निर्देश भी दिया, किंतु बाद में पता चला कि गांधी जी का वह पत्र उस फैजपुर अधिवेशन में पढ़ा ही नहीं गया। इस प्रकार संपूर्ण राष्ट्रगीत वंदे मातरम् 1937 से लेकर पिछले दिनों तक मात्र दो छंदों में ही गाया जाता रहा है। जवाहरलाल नेहरू ने इस अधिवेशन में जो उद्घोषणा की थी, उसके शब्द कुछ इस प्रकार हैं... ‘विगत 32 वर्षों से वंदे मातरम् देशभक्तों को स्वतंत्रता संग्राम में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध सर्वस्व समर्पण करने को प्रेरित करता रहा है ... हमारे मुस्लिम भाइयों द्वारा इस गान के अंशों पर आपत्ति जताये जाने के कारण समिति द्वारा यह निर्णय लिया जा रहा है कि अब से कांग्रेस के सम्मेलनों में वंदे मातरम् के पहले दो पद गाये जाएंगे, क्योंकि इसमें ऐसा कुछ नहीं है, जो आपत्तिजनक हो।’


वंदे मातरम् का सार्धशताब्दी (150 वर्ष) महोत्सव - भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारियों के मन में जलती आग को सतत् प्रज्वलित करने हेतु ईंधन का कार्य वंदे मातरम् ने किया। आज भी राष्ट्रगीत या राष्ट्रगान के बाद अनायास ही हमारे मुख पर वंदे मातरम् और भारत माता की जय का नारा आ ही जाता है। फिर भी, आज लोकतंत्र है और हम स्वेच्छा से कोई भी कार्य करने के लिए स्वतंत्र हैं। एक नयी युवा पीढ़ी आ चुकी है और किशोर युवा बनने को तैयार हैं, जिनका योगदान विकसित भारत के स्वप्न को साकार करने में अपेक्षित है, क्योंकि भारत विश्व का सर्वाधिक युवा जनसंख्या वाला देश है। ऐसे परिदृश्य में, अखिल भारतीय स्तर पर वंदे मातरम् के संपूर्ण गान कराने का निर्णय प्रशंसनीय और दूरगामी सोच प्रदर्शित करता है, क्योंकि आज जिस स्वाधीनता (फ्रीडम) का हम उपभोग कर रहे हैं, उसके पीछे सर्वस्व समर्पण करने वाले हुतात्माओं की एक सुदीर्घ सूची है।

देशभक्ति भाव जागरण का एक मंत्र
वंदे मातरम् आम जनमानस में देशभक्ति भाव जागरण का एक मंत्र है। इस मंत्र में न केवल राष्ट्रभाव है, अपितु मातृभाव भी है। जिसके पीछे एक विस्तृत इतिहास, परंपरा, संघर्ष और बलिदानों की गाथा है। राष्ट्रभाव के परिप्रेक्ष्य में यह एक मृत्युंजय मंत्र है, जो नित्य नूतन चिर पुरातन स्वरूप में भारत के भाव को समेटे हुए है। आज की नयी पीढ़ी जब वंदे मातरम् गायेगी, तो उसके मन में इन्हीं भावों का जागरण होगा। वे अपने पूर्वजों के शौर्य और शस्य श्यामला भारतभूमि के वैशिष्ट्य को जानने हेतु जिज्ञासा प्रकट करेंगे। क्योंकि, वंदे मातरम् भारतभूमि का जयगान, भारतीय समृद्धि का उद्घोष और वीरता का प्रमाण है। इसे हमें सामाजिक समरसता, राष्ट्रीय समृद्धि, गौरवशाली इतिहास और प्रेरक सांस्कृतिक अंध्याय के रूप में ग्रहण करना चाहिए और इसे सांप्रदायिक मानने या कहने वाले दुर्भावनापूर्ण विचारों के जाल में फंसने से बचना भी होगा। इसी उद्देश्य को केंद्र में रखकर विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान ‘नमामि भारतम्’ नामक एक भव्य कार्यक्रम आयोजित कर रहा है, जिसमें भारत के लाखों छात्र-शिक्षक और समाज के लोग सामूहिक रूप से भारत के इस उत्कर्षधायी राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् का सहर्ष गायन करते हुए इसके 150 वर्ष पूर्ण होने का उत्सव मना रहे हैं।

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