भारत की विकास यात्रा केवल आर्थिक विकास की यात्रा नहीं है। भारत की मूल चेतना में व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र—इन सभी को साथ लेकर आगे बढ़ने की परंपरा रही है। इसी भारतीय चिंतन की एक सशक्त अभिव्यक्ति है—सहकारिता।सहकारिता को केवल कोई कानूनी ढांचा, संस्था अथवा आर्थिक व्यवस्था मान लेना उसके मूल भाव को सीमित कर देना है। सहकारिता वास्तव में परस्पर सहयोग, विश्वास, संवेदना और सहभागिता की जीवन-पद्धति है। इसी गहरे सत्य को लक्ष्मण माधव राव इनामदार, जिन्हें स्नेहपूर्वक ‘वकील साहब’ कहा जाता था, ने अपने जीवन और कार्य के माध्यम से समाज के सामने रखा।

विज्ञान भवन की वह अविस्मरणीय स्मृति

लक्ष्मणराव इनामदार जी के जन्म शताब्दी समारोह के अवसर पर वर्ष 2017 में नई दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित कार्यक्रम में प्रत्यक्ष उपस्थित रहने का अवसर मुझे भी मिला। मैं उस समय एक सहकारी समिति की निदेशक के रूप में इस कार्यक्रम में सहभागी थी।

सहकारिता क्षेत्र से जुड़े देशभर के प्रतिनिधियों के बीच उस दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी का संबोधन सुनना मेरे लिए केवल एक कार्यक्रम में उपस्थित होना नहीं था, बल्कि सहकारिता के भारतीय दर्शन को समझने का एक महत्वपूर्ण अवसर था।प्रधानमंत्री जी ने अपने संबोधन में वकील साहब के जीवन को स्मरण करते हुए जिस एक सूत्र को विशेष रूप से रेखांकित किया—“बिना संस्कार नहीं सहकार”—वह वाक्य मेरे मन में आज भी उसी तरह अंकित है।वर्षों बाद उस कार्यक्रम को स्मरण करती हूं तो लगता है कि उस दिन कही गई बात केवल सहकारी समितियों के संचालन के लिए मार्गदर्शन नहीं थी। उसमें भारत के सामाजिक और आर्थिक पुनर्निर्माण की एक व्यापक दृष्टि छिपी थी।वकील साहब का जीवन बताता है कि सहकारिता की वास्तविक शक्ति संस्था की संरचना में नहीं, बल्कि उस संस्था से जुड़े लोगों के संस्कार में होती है। जब व्यक्ति अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर सामूहिक हित को महत्व देता है, तभी सहकार का जन्म होता है।

व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण

लक्ष्मणराव इनामदार का जीवन इस बात का उदाहरण है कि राष्ट्र निर्माण केवल बड़े पदों पर बैठकर नहीं होता। समाज में ऐसे असंख्य मूक साधक रहे हैं, जिन्होंने स्वयं को पीछे रखते हुए समाज और राष्ट्र को आगे बढ़ाने का काम किया।वकील साहब भी ऐसे ही साधक थे। उन्होंने अपने जीवन को व्यक्ति निर्माण के लिए समर्पित किया। उनका विश्वास था कि मजबूत राष्ट्र का निर्माण मजबूत व्यक्तित्वों से होता है। व्यक्ति में संस्कार होंगे तो परिवार मजबूत होगा, परिवार मजबूत होगा तो समाज सशक्त होगा और सशक्त समाज ही राष्ट्र को समर्थ बनाएगा।प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में वकील साहब के साथ बिताए अपने वर्षों को स्मरण करते हुए उनके सादगीपूर्ण जीवन और स्वयं को प्रचार से दूर रखते हुए साथियों को आगे बढ़ाने की भावना का उल्लेख किया था।यही तो सहकारिता का मूल है—स्वयं आगे बढ़ने के बजाय सबको साथ लेकर आगे बढ़ना।

सहकारिता व्यवस्था नहीं, एक भावना है

सहकारिता को केवल कानून, नियम और संस्थागत ढांचे तक सीमित नहीं किया जा सकता। संस्थाएं आवश्यक हैं, नियम आवश्यक हैं, लेकिन उनके भीतर सहकार की भावना जीवित रहना उससे भी अधिक आवश्यक है।सहकारिता का आधार है—विश्वास, परस्पर सहयोग, संवेदना, जिम्मेदारी और सामूहिक हित।भारत के सामाजिक जीवन में यह भावना कोई नई या बाहर से आई हुई अवधारणा नहीं है। परिवार से लेकर ग्राम जीवन तक मिल-जुलकर काम करने की परंपरा हमारी संस्कृति में रही है। ‘मैं’ से ‘हम’ की ओर बढ़ना भारतीय जीवन-दृष्टि का स्वाभाविक हिस्सा है।इसीलिए सहकारिता भारत के लिए केवल आर्थिक संगठन की पद्धति नहीं, बल्कि हमारे सामाजिक संस्कारों की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है।

किसान के स्वावलंबन का माध्यम

ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सहकारिता की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। किसान जब सामूहिक शक्ति के साथ बाजार से जुड़ता है तो उसकी सौदेबाजी की क्षमता बढ़ती है।डेयरी सहकारिता इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है। छोटे-छोटे दुग्ध उत्पादकों ने जब संग्रहण, प्रसंस्करण और विपणन की सामूहिक व्यवस्था बनाई तो वे बड़े बाजार से जुड़ सके और उनकी आय के नए अवसर बने।यही मॉडल कृषि के दूसरे क्षेत्रों में भी अपनाया जा सकता है। किसान अपनी जरूरत की वस्तुएं सामूहिक रूप से थोक में खरीदें, अपनी उपज को संगठित होकर बाजार तक पहुंचाएं और प्रसंस्करण तथा विपणन में अपनी भागीदारी बढ़ाएं—तो सहकारिता ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई शक्ति दे सकती है।

नए क्षेत्रों में सहकारिता की संभावनाएं

सहकारिता का भविष्य केवल पारंपरिक क्षेत्रों में नहीं है। ग्रामीण भारत में ऐसे अनेक क्षेत्र हैं, जहां सामूहिक प्रयास से नए आर्थिक अवसर निर्मित किए जा सकते हैं।नीम की फलियों का संग्रह और प्रसंस्करण, मधुमक्खी पालन, खाद्य प्रसंस्करण, कृषि आधारित छोटे उद्योग तथा तटीय क्षेत्रों में वैकल्पिक आजीविका—इन सभी क्षेत्रों में सहकारिता नई संभावनाओं के द्वार खोल सकती है।विशेष रूप से महिलाओं को इन गतिविधियों से जोड़कर आर्थिक स्वावलंबन की दिशा में बड़ा परिवर्तन लाया जा सकता है।

महिलाओं की भागीदारी से स्वावलंबन

गांव की महिलाओं के पास कौशल है, श्रम है और अनुभव है। आवश्यकता है इन क्षमताओं को संगठित आर्थिक शक्ति में बदलने की।महिला सहकारी समितियां नीम संग्रह, मधुमक्खी पालन, खाद्य प्रसंस्करण, हस्तशिल्प, स्थानीय उत्पादों के विपणन जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।इससे केवल आय के साधन नहीं बढ़ेंगे, बल्कि महिलाओं की निर्णय क्षमता, आत्मविश्वास और सामाजिक सहभागिता भी मजबूत होगी।

नई पीढ़ी और सहकारिता

आज सहकारिता आंदोलन को नई पीढ़ी से जोड़ना भी आवश्यक है। डिजिटल तकनीक, ई-कॉमर्स, कृषि प्रसंस्करण, भंडारण, आपूर्ति श्रृंखला और ग्रामीण उद्यमिता जैसे नए क्षेत्रों में युवा सहकारिता को नई दिशा दे सकते हैं।वकील साहब ने व्यक्ति निर्माण को राष्ट्र निर्माण से जोड़ा था। आज उसी दृष्टि को आगे बढ़ाते हुए सहकारिता को संस्कार, कौशल, तकनीक और उद्यमिता से जोड़ने की आवश्यकता है।

‘मैं’ से ‘हम’ की यात्रा

2017 में विज्ञान भवन में बैठे हुए प्रधानमंत्री जी को यह कहते सुनना कि “बिना संस्कार नहीं सहकार”, मेरे लिए एक व्यक्तिगत अनुभव भी था और सहकारिता के व्यापक दर्शन को समझने का अवसर भी।आज जब उस दिन को स्मरण करती हूं तो यह और स्पष्ट होता है कि सहकारिता केवल आर्थिक गतिविधि नहीं है। यह व्यक्ति को व्यक्ति से, परिवार को समाज से और समाज को राष्ट्र से जोड़ने वाली भावना है।

लक्ष्मणराव इनामदार जी की दृष्टि में व्यक्ति निर्माण और राष्ट्र निर्माण एक-दूसरे से अलग नहीं थे। उसी प्रकार सहकारिता और स्वावलंबन भी एक-दूसरे के पूरक हैं।जब संस्कार से सहकार जुड़ता है, तब सहकार से स्वावलंबन जन्म लेता है और स्वावलंबन से सशक्त राष्ट्र का निर्माण होता है।यही लक्ष्मणराव इनामदार जी की प्रेरणा को आज के भारत में आगे ले जाने का सार्थक मार्ग है।

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