भारत के हृदय स्थल में स्थित त्रिपुरी के महान् कलचुरि वंश का 13वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में अवसान हो गया था। फलस्वरूप सीमावर्ती शक्तियाँ इस क्षेत्र को अपने अधीन करने के लिए लालायित हो रही थीं। अंततः इस संक्रमण काल में एक वीर योद्धा जादोंराय (यदुराय) ने, तिलवाराघाट निवासी एक महान् ब्राह्मण संन्यासी सुरभि पाठक के भगीरथ प्रयास से, त्रिपुरी क्षेत्रांतर्गत गढ़ा-कटंगा क्षेत्र में गोंड वंश की नींव रखी। कालांतर में यह साम्राज्य महान् गोंडवाना साम्राज्य के नाम से जाना गया। गोंडवाना साम्राज्य के चरमोत्कर्ष का प्रारंभ 48वीं पीढ़ी के महानायक राजा संग्रामशाह (अमानदास) के समय हुआ और इनकी पुत्रवधू वीरांगना रानी दुर्गावती का समय गोंडवाना साम्राज्य के स्वर्ण युग के नाम से जाना जाता है।

इतिहास में रानी दुर्गावती का स्थान

भारतीय इतिहास का दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह रहा है कि रानी दुर्गावती एवं गोंडवाना साम्राज्य के महान् इतिहास को एक छोटी-सी कहानी बना डाला और पटाक्षेप कर दिया। रानी दुर्गावती का साम्राज्य लगभग इंग्लैंड के बराबर था। 16 वर्ष का शासन काल था, पूरे भारत में एकमात्र राज्य जहाँ कर, सोने के सिक्के एवं हाथियों तक में चुकाया गया था।

जिसके चरित्र, शौर्य, पराक्रम, प्रबंधन और देशभक्ति के सामने, ऑस्ट्रिया की मारिया थेरेसा, रूस की कैथरीन द्वितीय और इंग्लैंड की एलिजाबेथ प्रथम, रजिया बेगम और नूरजहाँ, समकक्ष नहीं हैं।

रानी दुर्गावती के अदम्य साहस और वीरता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि जिस अकबर के सामने बड़े-बड़े राजाओं ने घुटने टेक दिए थे, उस अकबर की चुनौती को वीरांगना रानी दुर्गावती ने दिलेरी के साथ स्वीकार किया। इसलिए अब शोधपूर्ण वास्तविक इतिहास लिखा जाना अनिवार्य है, ताकि रानी दुर्गावती और गोंडवाना साम्राज्य के इतिहास के साथ न्याय हो और वर्तमान पीढ़ी और भावी पीढ़ी में गर्व और गौरव की अनुभूति हो तथा राष्ट्रवाद की भावना प्रबल हो।

कालिंजर से गोंडवाना तक वीरांगना रानी दुर्गावती

विश्व की श्रेष्ठ वीरांगनाओं और नारी शक्ति के आदर्श प्रतिमानों के आलोक में सोलहवीं शताब्दी के इतिहास के पन्नों को पलटने पर भारत की एक ऐसी वीरांगना का नाम उभरता है, जो तुलनात्मक दृष्टि से विश्व की श्रेष्ठतम वीरांगना होने का दर्जा प्राप्त करती हैं। उन्हें भारतीय इतिहास में राजमाता वीरांगना रानी दुर्गावती के नाम से जाना जाता है। रानी दुर्गावती का गौरवशाली इतिहास बुंदेलखंड के कालिंजर से प्रारम्भ होकर, गढ़ा-कटंगा के गोंडवाना साम्राज्य के स्वर्ण युग तक पहुँचता है। रानी दुर्गावती 16 वर्ष तक गढ़ा-कटंगा के गोंडवाना साम्राज्य की साम्राज्ञी रहीं। एतदर्थ वीरांगना रानी दुर्गावती के इतिहास के पृष्ठ गोंडवाना से खोलते हैं।

गोंडवाना साम्राज्य का विस्तार और समृद्धि

गोंडवाना साम्राज्य के गढ़ जबलपुर, सागर, दमोह, सिवनी, मंडला, नरसिंहपुर, छिंदवाड़ा, नागपुर, होशंगाबाद, भोपाल और बिलासपुर तक फैले हुए थे। समकालीन इतिहासकारों की मानें तो 70 हजार गाँव थे, जिनकी संख्या रानी दुर्गावती के समय 80 हजार तक हो गई थी। किलों की संख्या 57, परगनों की संख्या 57 हो गई थी। कतिपय इतिहासकारों ने 56 सूबों का उल्लेख किया है। अकबर का दरबारी लेखक अबुल फजल लिखता है कि 23 हजार गाँव में प्रत्यक्ष प्रशासन था और शेष सामंतों के अधीन करद गाँव थे।

गोंडवाना या गढ़ा-कटंगा विस्तृत और संपन्न राज्य हो गया था। इसके पूर्व में झारखंड, उत्तर में भथा या रीवा का राज्य, दक्षिण में दक्षिणी पठार और पश्चिम में रायसेन प्रदेश था। इसकी लंबाई पूर्व से पश्चिम 300 मील तथा चौड़ाई उत्तर से दक्षिण 160 मील थी। इन सीमाओं को रानी दुर्गावती ने और बढ़ा लिया था। गोंडवाना साम्राज्य का क्षेत्रफल लगभग इंग्लैंड के क्षेत्रफल जितना हो गया था। विशिष्ट भौगोलिक परिस्थितियों के कारण दिल्ली के सुल्तान या पड़ोस के कोई अन्य राजा गोंडवाना पर अपना प्रभुत्व स्थापित नहीं कर सके।

रानी दुर्गावती का जन्म और विवाह

उत्तर भारत में मुगल शासक हुमायूँ को शेरशाह ने बिलग्राम (कन्नौज) के युद्ध में परास्त कर भारत से बाहर खदेड़ दिया और साम्राज्य विस्तार के लिए उद्यत हो गया। शेरशाह की धर्म की आड़ में विस्तारवादी नीति से कालिंजर के महान् शासक कीरत सिंह चिंतित हो गए थे। इसलिए शेरशाह सहित अन्य मुस्लिम आक्रांताओं को मुँहतोड़ जवाब देने के लिए गोंडवाना साम्राज्य के महान् राजा संग्रामशाह से मित्रता का प्रस्ताव रखा, जो एक वैवाहिक संबंध के रूप में फलीभूत हुआ।

वीरांगना रानी दुर्गावती का जन्म कालिंजर के किले में राजा कीरत सिंह के यहाँ 5 अक्टूबर सन् 1524 को दुर्गाष्टमी के दिन हुआ था। उनकी माता का नाम कमलावती था। राजा संग्रामशाह और उनके सुपुत्र दलपतिशाह, राजा कीरतसिंह की सुपुत्री वीरांगना दुर्गावती के स्त्रियोचित सौंदर्य, शिष्टता, मधुरता और पराक्रम से बहुत प्रभावित थे। इसलिए संग्रामशाह ने कीरतसिंह से उनकी सुपुत्री का अपने पुत्र दलपतिशाह के साथ विवाह का प्रस्ताव रखा, जो स्वीकार्य हुआ।

दुर्भाग्य से सन् 1541 में राजा संग्रामशाह का निधन हो गया। बावजूद इसके राजा कीरतसिंह ने अपना वचन निभाया और सन् 1542 में अपनी सुपुत्री वीरांगना दुर्गावती का विवाह राजा दलपतिशाह से कर दिया। यह विवाह सामाजिक समरसता का अद्वितीय उदाहरण है।

सत्ता संभालना और साम्राज्ञी के रूप में उदय

सन् 1545 में शेरशाह ने कालिंजर पर आक्रमण किया और मारा गया, जिसमें रानी दुर्गावती की महत्वपूर्ण भूमिका थी। इस युद्ध में राजा कीरतसिंह का भी बलिदान हुआ, जिससे वीरांगना दुर्गावती को धक्का लगा। परंतु सन् 1548 में पति दलपतिशाह की आकस्मिक मृत्यु ने वीरांगना पर वज्रपात कर दिया। इस वज्रपात से वीरांगना दुर्गावती विचलित हुईं, पर शीघ्र ही उन्होंने साहस के साथ अपने 5 वर्षीय अल्पवयस्क सुपुत्र वीर नारायण की ओर से गोंडवाना साम्राज्य की सत्ता संभाल ली। इस तरह गोंडवाना साम्राज्य की वीरांगना रानी दुर्गावती का महान् साम्राज्ञी के रूप में उदय हुआ। वीरांगना रानी दुर्गावती का जल प्रबंधन और अर्थनीति आज भी विश्व के लिए मार्गदर्शी है, परंतु युद्ध नीति विलक्षण थी।

अदम्य युद्ध कौशल और विजयगाथा

वीरांगना रानी दुर्गावती ने 16 बड़े युद्ध लड़े। 16 युद्धों में से 15 युद्धों में विजयी रहीं, जिसमें 12 युद्ध मुस्लिम आक्रांताओं से लड़े गए, उसमें से भी 6 मुगलों के विरुद्ध लड़े गए। वैसे गोंडवाना में प्रचलित है कि छोटे-बड़े सभी युद्धों की बात की जाए तो वीरांगना रानी दुर्गावती ने अपने जीवनकाल में 52 युद्ध लड़े थे, जिसमें 51 युद्धों में उन्होंने विजय प्राप्त की थी।

गोंडवाना की साम्राज्ञी के रूप में सत्ता संभालते ही मांडू के अय्याश शासक बाजबहादुर ने विधवा महिला जानकर गोंडवाना साम्राज्य पर दो बार आक्रमण किए, परंतु रानी दुर्गावती ने दोनों बार जमकर दुर्गति कर डाली। प्रथम आक्रमण में वीरांगना रानी दुर्गावती ने बाजबहादुर के चाचा फतेह खाँ को द्वंद्व युद्ध में मार डाला और द्वितीय आक्रमण में बाजबहादुर को मांडू राजधानी घर तक खदेड़ा। बाजबहादुर जीवन भर शरणागत रहा। आगे मालवा के सूबेदार शुजात खाँ की कभी हिम्मत नहीं हुई।

रानी दुर्गावती की युद्ध नीति से ही, शेरखाँ (शेरशाह) कालिंजर अभियान में मारा गया। कुछ दिनों बाद मुगलों ने पानीपत के द्वितीय युद्ध के उपरांत पुनः सत्ता हथिया ली और अकबर शासक बना। शीघ्र ही उसने येन-केन-प्रकारेण साम्राज्य विस्तार करना आरंभ कर दिया।

अकबर की धमकी और रानी दुर्गावती का स्वाभिमानी उत्तर

रानी दुर्गावती के गोंडवाना साम्राज्य की संपन्नता और समृद्धि की चर्चा कड़ा और मानिकपुर के सूबेदार आसफ खान द्वारा मुगल दरबार में की गई। धूर्त, लंपट और चालाक अकबर लूट और विधवा रानी को कमजोर समझते हुए बदनीयती से बलात् गोंडवाना साम्राज्य हथियाने के उद्देश्य से रानी को आत्मसमर्पण के लिए धमकाया और अपने दूत से यह परवाना लिखकर भेजा कि—

"अपनी सीमा राज की,
अमल करो परमान।
भेजो नाग सुपेत सोई,
अरु आधार दीवान।।

परंतु गोंडवाना की निर्भीक, स्वाभिमानी, स्वतंत्रप्रिय और स्व की प्रतिमूर्ति वीरांगना रानी दुर्गावती नहीं मानीं। तब अकबर का एक और संदेश आया कि स्त्रियों का काम रहँटा कातने का है, तो रानी ने जवाब में अपने संदेश के साथ एक सोने का पींजन भेजा और कहा कि आपका भी काम रुई धुनकने का है। अकबर बौखला गया और उसने आसफ खान को गोंडवाना साम्राज्य की लूट और उसके विनाश के लिए रवाना किया। आसिफ खान के साथ पाँच अन्य मुगल सेनानायक भी सेना में आकर मिल गए थे।

मुगलों के विरुद्ध युद्ध की तैयारी

वीरांगना रानी दुर्गावती को हर बात का पूर्वानुमान था, इसलिए उन्होंने अकबर द्वारा भेजे गए दो गुप्तचरों, क्रमशः गोप महापात्र और नरहरि महापात्र, को अपनी ओर मिला लिया था। दोनों गुप्तचरों ने अकबर की योजना और आसफ खाँ के आक्रमण के बारे में रानी दुर्गावती को सब कुछ बता दिया।

वीरांगना रानी दुर्गावती सतर्क हो गईं और सिंगौरगढ़ में मोर्चाबंदी कर ली। आसफ खान 6 हजार घुड़सवार सेना, 12 हजार पैदल सेना एवं तोपखाने तथा स्थानीय मुगल सरदारों के साथ सिंगोरगढ़ आ धमका।

इधर रानी दुर्गावती के साथ उनके पुत्र वीर नारायण सिंह, आधार सिंह, हाथी सेना के सेनापति अर्जुन सिंह बैस, कुंवर कल्याण सिंह बघेला, चक्रमाण कलचुरि, महारुख ब्राह्मण, वीर शम्स मियानी, मुबारक बिलूच, खान जहान डकीत, महिला दस्ता की कमान रानी दुर्गावती की बहन कमलावती और पुरा गढ़ की राजकुमारी (वीर नारायण सिंह की होने वाली पत्नी) संभाली। अविलंब युद्ध आरंभ हो गया।

सिंगोरगढ़ का प्रथम युद्ध

आसफ खान ने आत्मसमर्पण के लिए कहा। वीरांगना दुर्गावती ने कहा कि किसी शासक के नौकर से इस संदर्भ में बात नहीं की जा सकती है। वीरांगना रानी दुर्गावती ने भयंकर आक्रमण किया। मुगलों के पैर उखड़ गए। आसफ खान भाग निकला।

सिंगौरगढ़ का द्वितीय युद्ध

प्रथम युद्ध की तरह पुनः मुगलों के वही हाल हुए, लेकिन मुगलों का तोपखाना पहुँच गया और रानी को जानकारी लग गई। उन्होंने गढ़ा में मोर्चा जमाया और सिंगोरगढ़ छोड़ दिया।

सिंगौरगढ़ का तृतीय युद्ध

सेनानायक अर्जुन सिंह बैस ने मुगलों के पैर उखाड़ दिए, परंतु मुगलों का तोपखाना भारी पड़ गया। इसलिए सिंगोरगढ़ का किला एक रणनीति के अंतर्गत छोड़ दिया गया।

चंडाल भाटा (अघोरी बब्बा) का युद्ध

यह चौथा युद्ध था, जिसका उद्देश्य मुगल सेना को पीछे हटाना था, ताकि वीरांगना रानी दुर्गावती गढ़ा से बरेला के जंगलों की ओर निकल जाए। चंडाल भाटा के मैदान में घमासान युद्ध हुआ और सेनानायक अर्जुन सिंह बैस ने आसफ खाँ को बहुत पीछे तक खदेड़ दिया।

वीरांगना ने तोपखाने से निपटने के लिए एक शानदार रणनीति बनाई, जिसके अनुसार बरेला (नर्रई) के सकरे और घने जंगलों के मध्य मोर्चा जमाया, ताकि तोपों की सीधी मार से बचा जा सके।

गौर नदी का युद्ध

गौर नदी पर आसफ खान ने तोपखाना ले जाने के लिए पुल का निर्माण करवाया, जिसे ध्वस्त करने के लिए गए महारथी अर्जुन सिंह बैस लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।

वीरांगना रानी दुर्गावती के जीवन के 15वें बड़े और मुगलों से 5वें युद्ध में 22 जून 1564 को स्वतंत्रता, स्वाभिमान और शौर्य की देवी—विश्व की श्रेष्ठतम वीरांगना रानी दुर्गावती ने प्रातः सेनानायक अर्जुन सिंह बैस के बलिदान होने का समाचार मिलते ही "अर्द्धचंद्र व्यूह" बनाते हुए "गौर नदी के युद्ध" में आसफ खाँ सहित मुगलों की सेना पर भयंकर आक्रमण किया और पुल तोड़ दिया, ताकि तोपखाना नर्रई (बरेला) न पहुँच सके।

मुगल सेना तितर-बितर हो गई, जिसको जहाँ रास्ता मिला, भाग निकला। वीरांगना रानी दुर्गावती ने पुनः रात्रि में आक्रमण की योजना बनाई, परंतु सरदारों की असहमति के कारण निर्णय बदलना पड़ा। यहीं भारी चूक हो गई। यदि रात्रि में आक्रमण होता तो इतिहास कुछ और ही होना था।

नर्रई का घमासान युद्ध और स्व के लिए वीरांगना का प्राणोत्सर्ग

अंततः वीरांगना ने नर्रई की ओर कूच किया। 23 जून 1564 को नर्रई में प्रथम मुठभेड़ हुई। रानी और उनके सहयोगियों ने मुगलों की दुर्गति कर डाली। आसफ खान सहित मुगल सेना भाग निकली और डरकर बरेला तक निकल गई। 23 जून की रात तक तोपखाना गौर नदी पार कर बरेला पहुँच गया।

23 जून की रात को घातक षड्यंत्र हुआ। आसफ खान ने रानी के एक छोटे सामंत बदन सिंह को घूस देकर मिला लिया। उसने रानी की रणनीति का खुलासा कर दिया कि कल युद्ध में रानी मुगलों को घने जंगलों की ओर खींचेगी, जहाँ तोपखाना कारगर नहीं होगा और सब मारे जाएंगे।

आसफ खान डर गया। उसने उपाय पूछा। तब बदन सिंह ने बताया कि नर्रई नाला सूखा पड़ा है और उसके पास पहाड़ी सरोवर है, जिसे यदि तोड़ दिया जाए तो पानी भर जाएगा और रानी नाला पार नहीं कर पाएगी तथा तोपों की मार सीधी पड़ेगी।

उधर रात में रानी को अनहोनी का अंदेशा हुआ। उन्होंने सरदारों से रात में ही हमले का प्रस्ताव रखा, पर सरदार नहीं माने! यदि मान जाते तो इतिहास कुछ और ही होता। अंततोगत्वा युद्ध की अंतिम घड़ी समीप आ ही गई।

24 जून 1564 को प्रातः लगभग 10 बजे भयंकर मोर्चा खुल गया और घमासान युद्ध प्रारंभ हुआ। पहले हल्ले में मुगलों के पाँव उखड़ गए। मुगलों ने 3 बार आक्रमण किए और तीनों बार गोंडों ने जमकर खदेड़ा, इसलिए मुगलों ने तोपखाने से मोर्चा खोल दिया।

रानी दुर्गावती ने योजना अनुसार घने जंगलों की ओर बढ़ना प्रारंभ किया, परंतु बदन सिंह की योजना अनुसार पहाड़ी सरोवर तोड़ दिया गया। नर्रई में बाढ़ जैसी स्थिति बन गई। अब वीरांगना घिर गईं।

इसी बीच अपराह्न लगभग 3 बजे वीरनारायण के घायल होने की खबर आई, परंतु वीरांगना रानी दुर्गावती तनिक भी विचलित नहीं हुईं। आँख में तीर लगने के बाद भी युद्ध जारी रखा। मुगल सेना के बुरे हाल थे, परंतु अचानक रानी को एक तीर गर्दन पर लगा। रानी ने तीर तोड़ दिया।

हाथी सरमन के महावत को अधार सिंह ने पीछे हटने का आदेश दिया, परंतु रानी समझ गई थीं कि अब वह नहीं बचेंगी! अतः आधार सिंह को उन्होंने स्वयं को मार देने का आदेश दिया, परंतु आधार सिंह ने वीरांगना को मारने से मना कर दिया।

वीरांगना रानी दुर्गावती, आधार सिंह से यह कहते हुए—

मृत्यु तो सभी को आती है आधार सिंह,
परंतु इतिहास उन्हें ही याद रखता है जो स्वाभिमान के साथ जिए और मरेp>

युद्ध के गोल में समा गईं और लगभग 150 मुगल सैनिकों का वध करते हुए भीषण युद्ध किया। जब उनको मूर्छा आने लगी तो उन्होंने अपनी कटार से प्राणोत्सर्ग किया।

वहीं सेनापति आधार सिंह के नेतृत्व में कल्याण सिंह बघेला, चक्रमाण कलचुरि और महारुख ब्राह्मण ने युद्ध जारी रखा और वीरांगना के पवित्र शरीर को सुरक्षित किया तथा युवराज वीर नारायण सिंह को रणभूमि से सुरक्षित भेजकर अपनी पूर्णाहुति दी।

युवराज वीरनारायण सिंह ने वीरांगना रानी दुर्गावती का अंतिम संस्कार कर चौरागढ़ में सेनापति आधार सिंह के साथ मुगलों के विरुद्ध मोर्चा जमाया, जहाँ मुगलों के विरुद्ध चौरागढ़ ऐतिहासिक युद्ध लड़ा गया।

जबलपुर के समीप बरेला, ग्राम पंचायत-पिपरिया खुर्द, बारहाग्राम में स्थित नर्रई की युद्ध भूमि में वीरांगना रानी दुर्गावती का समाधि स्थल है।

नारी शक्ति और सनातन परंपरा की प्रतीक

विश्व की श्रेष्ठतम वीरांगना रानी दुर्गावती का व्यक्तित्व और कृतित्व सनातन धर्म में नारी शक्ति की मीमांसा का पर्याय है। यह शोध आलेख उन हिंदू वीरांगनाओं और समग्र नारियों को सादर समर्पित है, जो जीवन के संग्राम में स्व के लिए माँ, बेटी, बहन, पत्नी के रूप में देश की रक्षा के लिए अनादि काल से पूर्णाहुति देती आ रही हैं और दे रही हैं, जिनकी आस्था और समर्पण अटल है और उन्हें विपरीत परिस्थितियाँ भी हरा नहीं सकीं।

हिन्दुओं में बेटी का जन्म एक परिवार, एक कुटुम्ब का जन्म है, इसलिए मातृशक्ति हिंदुत्व का मूलाधार है। एतदर्थ हिन्दू धर्म में एक बेटी का जन्म शक्ति के अवतार के रूप में शिरोधार्य किया जाता है, जिसे विश्व की श्रेष्ठतम वीरांगना रानी दुर्गावती ने चरितार्थ किया है। कालजयी वीरांगना रानी दुर्गावती चिरकाल तक स्व के लिए आन-बान-शान और बलिदान की पराकाष्ठा का प्रतीक रहेंगी।

अकबर के दक्षिण भारत अभियान पर प्रभाव

सामरिक दृष्टि से देखें तो वीरांगना रानी दुर्गावती ने न केवल अकबर की धमकियों और घमंड को चूर-चूर किया, वरन् अकबर के दक्षिण भारत के अभियान को छिन्न-भिन्न करके रख दिया। यदि रानी दुर्गावती ने अकबर को कड़ी चुनौती नहीं दी होती तो अकबर शीघ्र ही दक्षिण भारत में प्रवेश कर जाता और दक्षिण भारत भी मुगल साम्राज्य का हिस्सा बन गया होता, परंतु रानी दुर्गावती के पराक्रम, शौर्य और सबल प्रतिरोध के कारण यह संभव नहीं हो सका।

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