यदि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इतना कमजोर, अप्रासंगिक और समाप्तप्राय है, जैसा उसके अनेक आलोचक लगातार बताते हैं, तो फिर दिन-रात उनकी चर्चा का सबसे बड़ा विषय संघ ही क्यों बना रहता है? पाकिस्तान से लेकर चीन, कनाडा से लेकर पश्चिमी देशों के कुछ वैचारिक समूहों तक—जहाँ-जहाँ भारत की सामाजिक-सांस्कृतिक दिशा को लेकर विमर्श होता है, वहाँ किसी न किसी रूप में RSS का नाम सामने आ जाता है। भारत के भीतर भी संघ के विरोध में सक्रिय अनेक वैचारिक समूह अपनी ऊर्जा का बड़ा हिस्सा संघ की आलोचना, उसकी गतिविधियों के विश्लेषण और उसके प्रभाव को लेकर चिंता व्यक्त करने में लगाते हैं।

आश्चर्य यह नहीं कि संघ की आलोचना होती है। आश्चर्य यह है कि संघ को कमजोर बताने वाले भी संघ को लगातार इतना महत्वपूर्ण क्यों मानते हैं?आज सोशल मीडिया पर देखिए— The Caravan Hindi जैसी पत्रिकाओं की पोस्टों में भी संघ का उल्लेख बार-बार दिखाई देता है। यदि कोई संगठन वास्तव में अप्रासंगिक हो चुका है, तो उसके पीछे इतनी वैचारिक ऊर्जा खर्च करने की आवश्यकता क्यों पड़ती है?

35 वर्षों से एक ही कहानी सुन रहा हूँ :

मैं पिछले लगभग 35 वर्षों से संघ के बारे में यही सुनता आया हूँ—अब संघ समाप्त हो रहा है, अब संघ कमजोर पड़ गया है, अब संघ का प्रभाव घट रहा है, अब संघ के सामने संकट है।लेकिन इतिहास का अनुभव कुछ और ही बताता है।संघ के विरुद्ध राजनीतिक, वैचारिक और प्रशासनिक स्तर पर अनेक कठिन दौर आए। 1930 के दशक में बिट्रीस काल के प्रतिबंधात्मक प्रयासों से लेकर स्वतंत्र भारत के विभिन्न प्रतिबंधों, 1948, 1975 के आपातकाल और 1992 बाबरी ढ़ाचा के बाद के अत्यंत कठिन वातावरण तक, संघ को समाप्त या सीमित करने की अनेक परिस्थितियाँ बनीं। फिर भी संगठन आगे बढ़ता रहा। यहाँ प्रश्न किसी व्यक्ति या सरकार का नहीं है।प्रश्न संगठन की उस आंतरिक शक्ति का है, जो विपरीत परिस्थितियों में भी अपने मूल उद्देश्य से विचलित नहीं होती।

कृष्ण और कंस का रूपक :

भारतीय परंपरा में संघर्ष को समझने के लिए हमारे पास अद्भुत प्रतीक हैं।कंस के पास सत्ता थी, भय था, संसाधन थे और अपनी व्यवस्था पर नियंत्रण था। दूसरी ओर कृष्ण का प्रारंभिक जीवन संघर्षों से भरा था। लेकिन अंततः निर्णायक शक्ति केवल बाहरी सामर्थ्य से नहीं आती—वह सत्य, ध्येय, संगठन और समाज के विश्वास से आती है।इसीलिए संघ की यात्रा को केवल राजनीतिक घटनाओं के चश्मे से देखना उचित नहीं होगा। संघ स्वयं को मूलतः व्यक्ति-निर्माण और समाज-संगठन का कार्य मानता रहा है।एक शाखा में बनने वाला स्वयंसेवक किसी एक चुनाव, किसी एक सरकार या किसी एक परिस्थिति के लिए नहीं बनाया जाता। उसके सामने राष्ट्रजीवन की दीर्घकालीन दृष्टि रखी जाती है।

यही किसी संगठन की वास्तविक परीक्षा है :

संघ का सबसे बड़ा 'पिलर' क्या है? वर्षों तक न भवन। न सर्वत्र कार्यालय और न प्रचार का सहारा लिया। दशकों तक न सत्ता के सहारे। केवल मनुष्य निर्माण ही सर्वोत्तम रचनात्मक कार्य माना। जिसके आधार पर वह स्वयंसेवक जो अपने समय, श्रम, बुद्धि और जीवन का एक अंश समाज के लिए देने को तैयार है। यही कारण है कि किसी संगठन की शक्ति को केवल उसकी तत्काल राजनीतिक उपलब्धियों या आलोचकों की टिप्पणियों से नहीं मापा जा सकता। संगठन की वास्तविक शक्ति उसके कैडर, उसकी विचार-सातत्यता, उसकी सामाजिक स्वीकार्यता और पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने वाली कार्यपद्धति में दिखाई देती है। संघ की सबसे बड़ी विशेषता यही रही है कि वह अपने कार्य को केवल घटनाओं से नहीं, पीढ़ियों के निर्माण से जोड़कर देखता है।

आज चुनौती भी बड़ी है और अवसर भी :

आज भारत एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहाँ तकनीक, वैश्वीकरण, सोशल मीडिया, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, बाजार, जनसांख्यिकीय परिवर्तन और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा समाज के चरित्र को तेजी से प्रभावित कर रहे हैं।इसलिए चुनौती केवल बाहरी विरोध की नहीं है। चुनौती अपने समाज को अधिक संगठित, समरस, आत्मविश्वासी, स्वावलंबी और राष्ट्रहित के प्रति जागरूक बनाने की भी है।  संघ को अपनी शताब्दी यात्रा में आगे बढ़ना है तो केवल अतीत की उपलब्धियों पर गर्व पर्याप्त नहीं होगा। वह क्यों बना है? उसकी पृष्ठभूमि क्या है? सम्पूर्ण समाज का संगठन, राष्ट्र की सर्वांगीण उन्नति ही उसका मूल ध्येय है।

नई पीढ़ी के प्रश्नों का उत्तर देना होगा : 

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में संघ अपने कार्यविस्तार, दृढ़ीकरण के साथ तीव्रता से समाज परिवर्तन के कार्यों में युवाओं को जोड़ रहा है। तो उसके प्रश्न भी  होंगे। समाज परिवर्तन में महिलाओं की बढ़ती भूमिका को भी समझना होगा। उनको अपने साथ कहाँ और किस कार्य में साथ लेना होगा। यह भी सुनियोजित एवं सुनिश्चित करना है। वर्तमान में तकनीकी और डिजिटल संसार में अपनी उपस्थिति प्रभावी बनानी होगी। कई बार वास्तविकता और चित्र अलग दिखाई देता है। मीडिया संस्थान और तकनीकी एजेंडा सब विकृत कर देता है।गत एक शताब्दी से चल रहे अपने अनुष्ठान में सामाजिक समरसता को जमीन पर और मजबूत करना होगा। पवित्र कर्तव्य परायण भाव भावना के अतिरिक्त प्रत्यक्ष जनजातीय, ग्रामीण और वंचित समाज के साथ आत्मीय संवाद बढ़ाना होगा। यहाँ पर चल रहे समस्त पर्यावरण, परिवार, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक उत्तरदायित्व जैसे विषयों पर कार्य करते हुये समग्र समाज को साथ लेकर कार्य करना होगा।

विरोधियों से अधिक महत्वपूर्ण है अपना ध्येय :

हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि कौन संघ की आलोचना कर रहा है। महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि— हम समाज के लिए क्या कर रहे हैं? हम व्यक्ति को कितना बेहतर बना रहे हैं? हम समाज में कितना विश्वास पैदा कर रहे हैं?हम भारत को कितना संगठित और समर्थ बना रहे हैं? व्यवस्था परिवर्तन आवश्यक है। पर उससे पहले समाज को उसके लिये तैयार होना भी आवश्यक है। पहले समाज परिवर्तन करना होगा। उसका यथायेग्य मानस निर्माण करना है।आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा है। विरोध भी रहेगा। मतभेद भी रहेंगे। संघ के विचारों की आलोचना भी होगी और उसका भी स्वागत है। लेकिन किसी भी संगठन की दीर्घकालिक शक्ति का निर्णय उसके आलोचक नहीं, समाज के साथ उसका जीवंत संबंध करता है।

केशव के संगठन-दुर्ग की शक्ति :

डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने जब संघ की स्थापना की थी, तब न कोई विशाल संसाधन था, न सत्ता का संरक्षण और न व्यापक प्रचार-तंत्र। था तो केवल एक विचार, एक ध्येय और समाज के पुनर्गठन का संकल्प।आज शताब्दी वर्ष में पीछे मुड़कर देखें तो यात्रा का विस्तार स्वयं बहुत कुछ कहता है।इसलिए मेरा विश्वास किसी व्यक्ति-पूजा पर नहीं, बल्कि उस संगठनात्मक पद्धति पर है जिसने हजारों-लाखों कार्यकर्ताओं को समाज के विभिन्न क्षेत्रों में काम करने की प्रेरणा दी। जब अकेले थे तब भी यात्रा रुकी नहीं; जब विरोध बढ़ा तब भी यात्रा रुकी नहीं; जब प्रतिबंध आए तब भी यात्रा रुकी नहीं; जब आलोचनाएँ बढ़ीं तब भी यात्रा रुकी नहीं। तो आज चुनौतियाँ अधिक दिखाई देने लगीं तो रुकने का प्रश्न ही कहाँ है?

अब आगे की राह :

अब समय केवल यह कहने का नहीं कि “हम मजबूत हैं।” समय यह सिद्ध करने का है कि— हम समाज को और मजबूत बनाएँगे। हम प्रत्येक स्थान पर समाज में समरसता लाएँगे। हम निराशा के स्थान पर आत्मविश्वास जगाएँगे। हम संघर्ष के स्थान पर संवाद को प्राथमिकता देंगे। हम भारत की सनातन सांस्कृतिक चेतना को आधुनिक युग की आवश्यकताओं से जोड़ेंगे।संघ की शताब्दी का वास्तविक अर्थ तभी होगा जब उसका प्रभाव समाज के जीवन में दिखाई दे—व्यक्ति में संस्कार, परिवार में आत्मीयता, समाज में समरसता और राष्ट्र में आत्मविश्वास के रूप में।वैश्विक परिस्थितियाँ चाहे जितनी बदलें, वैचारिक संघर्ष चाहे जितना तीखा हो, चुनौतियाँ चाहे जितनी बड़ी हों—हमारा उत्तर घबराहट नहीं, संगठन होगा। हमारा उत्तर प्रतिशोध नहीं, राष्ट्रकार्य होगा। हमारा उत्तर प्रचार नहीं, आचरण होगा। हमारा उत्तर विभाजन नहीं, समाज-संगठन होगा।

हमने परिस्थितियों से लड़कर नहीं, परिस्थितियों को बदलने के लिए स्वयं को तैयार करके आगे बढ़ना सीखा है।और इसलिए— काल बनकर नहीं, कालजयी संकल्प बनकर आगे बढ़ना है। घनघोर घटाओं से डरना नहीं, उनमें भी अपना मार्ग बनाना है।अगस्त्य की तरह ही आसुरी शक्तियों को निगलना है, शिव की भाति ही विषाक्तता को समाज से दूर, स्वयं तक सीमित करने का सामर्थ्य अर्जित करना है।ध्येय स्पष्ट है। दिशा स्पष्ट है। संगठन सजग है।
समाज हमारा अपना है। और भारत हमारा परम वैभव का संकल्प है। जलने वाले जलते रहेंगे। रोने वाले रोते रहेंगे। चलो, फिर एक बार— व्यक्ति निर्माण से समाज निर्माण, समाज निर्माण से राष्ट्र निर्माण, और राष्ट्र निर्माण से परम वैभवशाली भारत की ओर! 

Disclaimer : इस लेख/रचना में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। हर तरह के वाद, विवाद के लिए लेखक व्यक्तिगत तौर पर जिम्मेदार हैं।
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