सिमोन द बोउआर को नारीवाद की शुरुआत करने का क्रेडिट दिया भले जाय पर वह पाखंड की सबसे चालाक दुकानदार थी। उसने किताबों में लिखा, विवाह वेश्यावृत्ति है। और खुद जिंदगी भर एक आदमी की हमबिस्तरी की जिसके सौ अवैध सम्बन्ध थे। ज्याँ पॉल सार्त्र के साथ होटल में कमरा-कमरा खेलना, शाम को मिलने का टाइम टेबल बनाना, यह कौन सी स्वतंत्रता थी?  यह तो वही बीवी वाला हिसाब है, बस बिना मंगलसूत्र के। शादी का सारा सुख चाहिए, पर जिम्मेदारी का ठप्पा नहीं चाहिए।

वह चिल्लाई, परिवार औरत को मारता है। फिर मरी तो उसी आदमी की कब्र में घुस गई। क्यों? क्योंकि अकेले मरने की हिम्मत नहीं थी। जो औरत पूरी दुनिया को अकेले जीना सिखा रही थी, वह अकेले मर नहीं सकी। उसे भी वही चाहिए था जो गाँव की अनपढ़ औरत को चाहिए , मरने के बाद भी किसी मर्द का साया।और संतान पैदा करने को घटिया बताना फिर बेटी गोद लेना तो सबसे घटिया रहा।

खुद तो बच्चा पैदा करने का दर्द नहीं सहा, रात भर रोते बच्चे को नहीं संभाला, शरीर नहीं बिगाड़ा। दूसरी औरत की 24 साल तक पाली-पढ़ाई जवान बेटी देखी और झपट लिया। कानून की आड़ में गोद ले लिया। क्यों? ताकि मरने के बाद उसकी किताबों का पैसा सरकार न ले जाए। 

यह मातृत्व है? यह तो बिजनेस है। कोख का कष्ट दूसरी औरत ने उठाया, नाम सिमोन का चिपक गया। सिल्वी ले बोन की माँ ने खून-पसीने से बेटी बड़ी की, सिमोन ने एक कागज पर दस्तखत करके उसकी माँ बन गई। इससे बड़ा छीना-झपटी क्या होगी?

सिमोन ने औरतों को कहा - बच्चा मत पैदा करो, चूल्हा-चौका छोड़ो। और खुद क्या किया? एक बाप की औलाद को अपनी औलाद बना कर बैठ गई। मतलब, नेचुरल माँ का सारा काम कोई और करे, क्रेडिट मैं लूँ।

असल में सिमोन  चाहती थी परिवार का आनंद उसे मिले पर नौकरानी कोई और औरत बने। वह चाहती थी बच्चा रहे, पर पेट कोई और फाड़े। इसी को पाखंड कहते हैं। दूसरों के लिए जहर, अपने लिए अमृत।

आज जितनी भी तथाकथित नारीवादियां हैं उनके कूल्हे अपनी अपनी नौकरानियों पर टिके हैं। सारा नारीवाद कामवाली बाइयों के कंधे पर है। दिल्ली विश्वविद्यालय की एक मशहूर नारीवादी ने एक बार बताया था कि अपनी नौकरानी को छुट्टी देने से मना इसलिए कर दिया क्योंकि उसे नारीवाद पर कांफ्रेंस करना था।

नारीवाद के लिए कुछ औरतों का बलिदान जरूरी है। कौन हैं वे औरतें, गांव की सीधी और कम पढ़ी लिखी। उन्हें नारीवादियां बरगला सकती हैं, उनके ऊपर बैठ कर सुप्रीमेसी फील कर सकती हैं।यही सुप्रीमेसी फील करना सिमोन का भी उद्देश्य था। उसके पास आखिर में, नाम शोहरत एक बौद्धिक व्यक्ति की संगति, पैसा, गोद ली ही सही संतान सब प्राप्त हो गया। और उसने नारा दिया कि परिवार तोड़ो।इससे बड़ा पाखण्ड और क्या हो  सकता।सेकंड सेक्स लिखने वाली महिला को दुनिया ने नारी मुक्ति की देवी बना दिया। पर लाइसी मोलिएर की क्लासरूम में उसकी मुक्ति का मतलब कुछ और था, रेप के लिए 16-17 साल की लड़कियां तलाशना।

उसके संपर्क में एक  बच्ची आई बियांका बीनेनफेल्ड। उसकी टीचर थी सिमोन द बुआर, 30 साल की, अधिकार वाली, दर्शन पढ़ाने वाली। बियांका ने खुद लिखा है, बोउआर क्लास में आती थी, "ताज़ा मांस" तलाशती थी। पहले खुद चखती थी, फिर अपने प्रेमी जां-पॉल सार्त्र के बिस्तर में परोस देती थी। इसे वे ट्रायो कहते थे, दर्शन का नया नाम जो एक नाबालिग लड़की की देह का बलात्कार करके बनता था।यह कोई अफवाह नहीं है। 1943 में नताली सोरोकिन, 17 साल की छात्रा, की मां ने पुलिस में शिकायत की। आरोप था, नाबालिग का यौन शोषण करना। फ्रांस सरकार ने बोउआर का लाइसेंस हमेशा के लिए छीन लिया। वह फिर कभी सरकारी स्कूल में नहीं पढ़ा सकी। 

ओल्गा कोसाकेविच, बियांका, नताली - तीनों ने बाद में कहा कि इस रिश्ते ने उन्हें तोड़ दिया। मनोवैज्ञानिक रूप से बर्बाद कर दिया।और विडंबना देखो, जिस महिला ने लिखा कि महिला "दूसरा" बनाई जाती है, वही खुद अपनी छात्राओं को दूसरा, तीसरा, सिर्फ भोग की वस्तु बना रही थी। जो पुरुष सत्ता के खिलाफ लिखती थी, वही सार्त्र के लिए लड़कियां सप्लाई करने का काम कर रही थी।

1977 में इस जोड़ी ने एक याचिका पर हस्ताक्षर किए - फ्रांस में यौन संबंध की सहमति की उम्र (age of consent) निर्धारित करने का कानून ही खत्म कर दो। यानी बच्चों के साथ सेक्स को अपराध न माना जाए। ये है इनका प्रगतिशीलता का असली चेहरा।

आज जब हम मी टू पर लेक्चर सुनते हैं, यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर-छात्रा संबंध पर नैतिकता पढ़ाई जाती है, तब सिमोन द बुआर की मूर्ति पर माला क्यों चढ़ी है? अगर यही काम आज कोई 30 साल का पुरुष प्रोफेसर अपनी 16 साल की छात्राओं के साथ करे और फिर अपने दोस्त के पास भेजे, तो हम उसे क्या कहेंगे? शिकारी, ग्रूमर, दलाल, भड़..., अपराधी।

फिर बोउआर के लिए अलग शब्द क्यों? क्योंकि उसने नारीवाद पर किताब लिखी थी। इसलिए उसके शिकार माफ हैं। उसकी शिकार हुई लड़कियां इतिहास के फुटनोट बन गईं, और शिकारी आइकन बन गई। ऐसी नीच और दुश्चरिता भारत के पाठ्यक्रम में शामिल है, अफसोस है।

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