फ्रैंकफर्ट स्कूल का संस्थापक खासकर क्रिटिकल थ्योरी को जिसने ऊँचाइयाँ दी वह मैक्स होर्खाइमर अपनी जवानी में सबसे बड़ा क्रांतिकारी था और बुढ़ापे में सबसे बड़ा पछताने वाला भी वही था। वह पागलों की तरह रोता था कि क्या विचार उसने सभ्यता को दे दिए। जिस नंगेपन को आजादी मानता था वह जहर थी।

इसे बिंदुवार समझते हैं।

1. जवानी के पाप:

1930-50 में होर्खाइमर ने लिखा - परिवार, पिता, शादी, धर्म ,  ये सब पूँजीवाद के हथियार हैं। इन्हें तोड़ो। उसने कहा , बुर्जुआ नैतिकता आदमी को गुलाम बनाती है। उस समय उसे लगा था कि वह इंसान को आजाद कर रहा है।

2. 1968 में आँख खुली:

जब उसके ही शिष्यों, मार्क्यूज़ के चेले  ने सड़कों पर फ्री सेक्स और मेक लव नॉट वार के नारे लगाए, कपड़े फेंके, नंगे सड़कों पर सेक्स किए, वहीं पर खाना खाया मल विसर्जित किया, पेशाब को जूतों में भर कर एक दूसरे के ऊपर डाला, आजादी की घोषणा की, परिवार को गाली दी, तो होर्खाइमर डर गया।

उसने जर्मन अखबारों में इंटरव्यू दिया और साफ कहा:

 "मैंने जिसे मुक्ति समझा था, वह मुक्ति नहीं थी। हमने पिंजरा तोड़ा, पर बाहर शेर खड़ा था।"

3. पश्चाताप के तीन बिंदु:

पहला पछतावा - हमने प्यार को मार दिया: उसने माना, हमने सोचा था शर्म हटेगी तो प्यार बचेगा। हुआ उल्टा। शर्म हटी तो प्यार ही खत्म हो गया। अब लड़की प्रेमिका नहीं, शरीर बन गई। आज शर्ट हट गई तो पोर्न इंडस्ट्री बन गई जहां हर लड़की का शरीर बिक रहा है, उसके शरीर को पुरुष, कई पुरुष, जानवर, कीड़े भोग रहे हैं। 

दूसरा पछतावा- हमने बाजार को भगवान बना दिया:
उसने लिखा - पहले चर्च भगवान था, फिर हमने चर्च हटाया। सोचा इंसान भगवान बनेगा। पर इंसान भगवान नहीं बना, बाजार भगवान बन गया। अब बाजार तय करता है कि कौन सुंदर है, कौन बिकेगा।

तीसरा पछतावा - हमने पिता को मार कर बच्चों को अनाथ कर दिया: होर्खाइमर ने अपने आखिरी लेख ऑथोरिटी एंड फैमिली के नोट्स में लिखा - हमने पिता की सत्ता को बुरा कहा। पर पिता की सत्ता हटी तो सुरक्षा भी हट गई। अब बच्चा आजाद तो है, पर अकेला है, डरा हुआ है।

4. अंतिम स्वीकारोक्ति:

1973 में अपनी मृत्यु से कुछ महीने पहले होर्खाइमर ने कहा था, "मार्क्यूज़ अभी भी क्रांति की बात करता है। मैं अब क्रांति से डरता हूँ। क्योंकि मैंने देख लिया है कि हर क्रांति के बाद इंसान और अकेला हो जाता है।"

यही होर्खाइमर का घोर पश्चाताप था। उसने जिस मर्यादा पर्दे को जहर कहा था, अंत में उसी पर्दे को इंसान की आखिरी चादर मान लिया।भारत में होर्खाइमर के पूर्व विचारों को समाजशास्त्र में पी पी कर पढ़ाया जाता है। 1968 के बाद के होर्खाइमर का कोई नामलेवा नहीं है। सोचिए उसे पढ़कर छात्र क्या सोचने  को प्रेरित होंगे।खैर पश्चात के होर्खाइमर से लेकर ए आई के संस्थापकों तक एक ही आवाज सुनाई देती है। मर्यादा मत तोड़ो, परिवार विवाह और समाज मत तोड़ो। यह पिछले दस हजार के ह्यूमन इवोल्यूशन की कमाई है, पुण्य प्राप्ति है।

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