यह किसी गुरमेहर कौर का स्टेटमेंट था। इस स्टेटमेंट ने पूरे देश में शोर कर दिया। प्रायः आतंकवादी और अपराधी सिस्टम को उनके पाप और अपराध के लिय जिम्मेदार बता कर शील्ड ले लेते हैं।

यह शील्ड कहां से आई, भारत में अपराध के स्वीकार के बाद उसका कर्मभोग अनिवार्य है। वामपंथ पाप और अपराध समाज के माथे मढ़कर पुनः अपराध के लिए व्यक्ति को तैयार कर देता है। यह जस्टिफिकेशन लुई अलथूजर देता है। लुई अलथूजर  क्रांति का मुखौटा पहने एक पाखंडी था जिसे मैं पिछले बीस साल से पढ़ा रहा हूँ।

मेरी विवशता है कि मै पागलों को महाविद्वान जैसे बताकर सिविल सेवा के लिए या विश्वविद्यालय में भारत का भविष्य तैयार करूं।लुई अलथूजर को वामपंथी दुनिया में बड़ा दार्शनिक कहा जाता है, पर अगर उसके जीवन को ध्यान से देखो तो वो दर्शन नहीं, दोगलापन है।

एक तरफ वो लिखता था - "परिवार, स्कूल, धर्म ये सब पूंजीवाद के औजार हैं, ये लोगों को गुलाम बनाते हैं।" और दूसरी तरफ खुद उसी फ्रांस के सबसे संभ्रांत स्कूल ENS में प्रोफेसर बनकर बैठा था। उसी सिस्टम की मलाई खा रहा था, जिसे वो गाली देता था। सरकारी वेतन, सरकारी घर, सरकारी इज्जत - सब ले रहा था और कह रहा था मैं सिस्टम के खिलाफ हूँ। इससे बड़ा पाखंड क्या होगा?

उसने कहा - व्यक्ति की कोई जिम्मेदारी नहीं होती, सब समाज करवाता है। इंसान कठपुतली है। ये सिद्धांत उसने क्यों दिया? ताकि अपनी हर कमजोरी को छिपा सके। वो खुद डिप्रेशन का मरीज था, सालों तक इलाज कराता था, पढ़ाता कम था, गायब ज्यादा रहता था। काम न करने का बहाना चाहिए था, तो थ्योरी बना दी - "मैं नहीं, सिस्टम काम नहीं करने दे रहा।"

और समाज में वितृष्णा फैलाने का उसका सबसे बड़ा हथियार था, हर रिश्ते में जहर घोलना। उसने सिखाया - तुम्हारे माँ-बाप तुम्हें प्यार नहीं करते, वो तुम्हें विचारधारा सिखा रहे हैं। तुम्हारा स्कूल तुम्हें पढ़ा नहीं रहा, तुम्हें गुलाम बना रहा है। तुम्हारा धर्म तुम्हें शांति नहीं दे रहा, तुम्हें दबा रहा है।

नेहा बोरा इसका सटीक उदाहरण है।

सोचो, अगर एक नौजवान ये मान ले कि उसके माँ-बाप, उसका स्कूल, उसका धर्म सब उसके दुश्मन हैं, तो उसके मन में समाज के लिए क्या बचेगा? सिर्फ नफरत, सिर्फ वितृष्णा। अलथूजर ने पूरी एक पीढ़ी को यही सिखाया , हर चीज पर शक करो, हर रिश्ते से नफरत करो।

और आखिर में क्या किया? जिस पत्नी हेलेन ने उसकी पागलपन की हालत में 30 साल तक सेवा की, उसे ही मार दिया। और वामपंथी बुद्धिजीवियों ने उसे बचा लिया। कहा - "कॉमरेड बीमार है।" अगर यही काम किसी आम मजदूर ने किया होता, तो उसे फांसी हो जाती। पर दार्शनिक था, इसलिए पागलखाना। यही इनका न्याय है।अलथूजर क्रांतिकारी नहीं था। वो एक सुविधाभोगी पाखंडी था जो एसी कमरे में बैठकर गरीबों के नाम पर किताबें लिखता था और समाज में सिर्फ घृणा फैलाता था।

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