पणिक्कर की फैक्ट्री से तमाम टॉक्सिक प्रोडक्ट निकले, मोटा मोटी कुछ उत्पादों पर चर्चा करते हैं। मुख्य रूप से तीन बातों के लिए पणिक्कर जाने जाते हैं। मोपला को किसान जमींदार का मामला बताकर उसे इतिहास में वर्ग संघर्ष का भारतीय उदाहरण बनाना, भारतीय ज्ञान परम्परा को शोषण का टूल बताना और इस्लामिक शासन की महानता का प्रोपेगंडा चलाना।

एक एक कर इन तीनों बातों समझते हैं।

मोपला नरसंहार  का झूठ

1921 मालाबार की घटना पर एनी बेसेंट ने लिखती हैं, मोपला जिहादियों ने हिंदुओं को जिंदा जलाया, कुओं में लाशें भरीं, 20 हजार हिंदुओं का जबरन धर्मांतरण करवाया। डॉ. अम्बेडकर ने भी पाकिस्तान पर अपनी किताब में इसे जिहाद कहा पर पणिक्कर ने अपनी किताब अगेंस्ट लॉर्ड एंड स्टेट में इसे बताया कि गरीब किसान जमींदारों से लड़ रहे थे। मजहब की वजह से हुई हिंसा को एकदम साफ कर दिया। यही इनका पैटर्न था जिसमें हर इस्लामिक आक्रमण को आर्थिक संघर्ष बता दो ताकि हिंदू कभी पीड़ित ही न लगे।

भारत के हर गौरव को गाली देना

पणिक्कर का मानना था कि वेद, उपनिषद, गीता  सिर्फ ब्राह्मणों द्वारा शोषण करने का औजार है। भक्ति आंदोलन  इन मिथ्यासकार के लिए नाटक था। शिवाजी, महाराणा प्रताप, रानी लक्ष्मीबाई इनके लिए सामंती लुटेरे जैसे थे।

प्रोपेगेंडा की फैक्ट्री

इरफान हबीब, रोमिला थापर, पणिक्कर ये तिकड़ी तय करती थी कि इतिहास  की किताब में अकबर महान रहेगा और महाराणा प्रताप हिंदू पराजित सामंत। बाबर को सहिष्णु दिखाओ, औरंगजेब को ज़िंदापीर  बताओ। केरल में जब इन्हें टेक्स्टबुक कमेटी का चेयरमैन बनाया गया तो  सातवीं की किताब से स्वतंत्रता संग्राम के पाठ हटा दिए, कृष्ण की जगह मार्क्स को घुसेड़ दिया।

भारत के इतिहास की नींव खोखली करने वाले ये लोग जिनका इतिहास केवल मार्क्स की दृष्टि, मार्क्स के साहित्य से शुरू होकर वहीं खत्म होता था, ये भारत बोध के बारे में क्या जानते थे। कुछ नहीं।

हमें यह जानना चाहिए कि इतिहास समय के मोड़ पर अंकित घटनाओं का संग्रह है न कि गिरोह बनाकर भारत को पद दलित करने का तरीका।वामपंथी डिस्टोरियंस ने इतिहास के बहाने भारत के छात्रों के गिल्ट भरा और उन्हें भारत से दूर ले गए।

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