जोसेफ गोबेल्स 1933 से 1945 तक, एडोल्फ हिटलर के नाजी जर्मनी का कुख्यात प्रचार मंत्री था। ‘हिटलर का सबसे विश्वासपात्र और निष्ठावान मंत्री’, यह उसकी पहचान थी। द्वितीय विश्व युद्ध में जर्मनी की हार होते ही हिटलर ने आत्महत्या की थी। हिटलर की मृत्यु के पश्चात मात्र एक दिन वह जर्मनी का चांसलर रहा, और 1 मई 1945 को अपनी पत्नी और 6 बच्चों को विष पिलाने के पश्चात उसने भी आत्महत्या कर ली।

‘एक गलत या झूठी बात को बारंबार बोलने से वह सच लगने लगती है, और सत्य बन जाती है’। यही उसका प्रचार तंत्र था। इसे ही “गोबेल्स नीति’ या ‘बिग लाई’ (Big Lie) कहा जाता है।

अपने देश के विपक्ष के नेता (LoP) इस समय इसी ‘गोबेल्स तंत्र’ का उपयोग करते दिख रहे हैं। वह कुछ दिनों से चुनाव में धांधली और वोट चोरी के आरोप लगा रहे हैं। पिछले एक महीने से उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के विरोध में मोर्चा खोल रखा है।

वे जो आंकड़े दे रहे हैं, उन्हें देखकर कोई भी सामान्य नागरिक यही कहेगा कि दाल में कुछ काला लग रहा है। कारण मतदाता सूचियों का जो गहन पुनरीक्षण (SIR – Special Intensive Revision) हुआ है, उसके कारण ड्राफ्ट मतदाता सूची (यह अंतिम सूची नहीं है) से 13.3 करोड़ मतदाताओं के नाम काटे (delete किए) गए हैं।

अब देखने में आंकड़ा बड़ा भारी लगता है, किंतु क्या कारण है कि इतने ज्यादा नाम निकाले गए हैं?

इनमें मृत व्यक्तियों के नाम 2.7 करोड़ (20%) हैं। यह सत्यापित नाम हैं, जो निकाले ही जाने हैं। इनमें विवाद नहीं है। इसके सिवाय, जिनका नाम एक से ज्यादा स्थानों की मतदाता सूची में है, ऐसे डुप्लीकेट नामों की संख्या है 1.01 करोड़ (7.6%)। यह भी सत्यापित हैं, और इनमें विवाद नहीं है।

अब विवाद कहां है? तो वह है 9.5 करोड़ (71.5%) नामों पर, जिन्हें स्थानांतरित या गैरहाजिर बताया गया है। यह संख्या बड़ी है, किंतु इसे ठीक से समझना चाहिए। यदि व्यक्ति नहीं मिलता है या नहीं दिखता है, तो उस अनुपस्थित व्यक्ति को मतदाता कैसे मान लें? भारत में पिछले दशकों में जो इतनी बड़ी घुसपैठ हुई, वह इसी प्रकार से। इनमें से अधिकतम लोगों के पास वोटर आईडी हैं। यह कैसे हो गया? तो, उस समय वहां के बीएलओ ने, बिना प्रत्यक्ष देखे, मतदाता की अनुपस्थिति में उसे सत्यापित कर दिया था।

किंतु अब यह नहीं चलने वाला। वोटर की अनुपस्थिति में उसे सत्यापित नहीं किया जा सकता। सही (अधिकृत) मतदाता ढूंढने की यही योग्य पद्धति है।

पिछले सप्ताह, 1 अक्तूबर 2026 से, इन 9.5 करोड़ मतदाताओं को सत्यापित करने का एक अभियान चलाया जा रहा है। अर्थात, 9.5 करोड़ में से अधिकतम मतदाता, यदि वह वास्तविक (genuine) हैं, तो सत्यापित हो जाएंगे।

अब इस प्रक्रिया में गलत क्या है..?

क्या यह पहली बार हो रहा है..?

अपने देश में मतदाता सूची का ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (SIR) इसके पहले, वर्ष 1952 से लेकर 2004 के बीच आठ बार हुआ है।1952 में देश में सबसे पहला ऐसा SIR हुआ, जब स्वतंत्र भारत की पहली निर्वाचक नामावली (वोटर लिस्ट) सत्यापित करके तैयार की गई।1957 – 1961 और 1965 – 66 में जनसंख्या बदलावों के साथ, नए प्रदेशों के निर्मिति के कारण, SIR किया गया।1983 – 84 और 1987 -1989 में मतदाता सूचियों की त्रुटियों को दूर करने के लिए, सत्यापन पर बल देने के लिए, SIR किया गया।1992 – 1993 और 1995 यह दौर था, जब देश में पहली बार वोट देने के लिए ‘मतदाता फोटो पहचान पत्र’ (EPIC) की अवधारणा लागू हुई। सूचियों का व्यापक स्तर पर पुनरीक्षण किया गया।

2002 – 2004 यह इसके पहले का अंतिम बड़ा पुनरीक्षण था। उसके बाद, अभी तक विस्तृत SIR नहीं किया गया।

इस बार के SIR की विशेषता है कि भारत के मतदाताओं का डिजिटल डेटाबेस (ECI – Net) बनाया जा रहा है। इसके कारण अब भविष्य में, एक ही व्यक्ति का, देश के दो विभिन्न सूचियों में नाम रहने जैसी समस्याएं नहीं रहेंगी।अर्थात, अभी हो रहा ऐसा SIR पहली बार नहीं है। इस SIR में डिजिटाइजेशन पर जोर दिया जा रहा है। ताकि मतदाता सूचियों में धांधली को रोका जा सके।

तो फिर इस SIR का विरोध क्यों?

जिनको हटाने की मांग राहुल गांधी कर रहे हैं, वह ज्ञानेश कुमार 14 मार्च 2024 को चुनाव आयुक्त बने। उसके बाद हुए चुनाव में भाजपा बहुमत का आंकड़ा भी छू न सकी। 240 पर सिमट गई। 19 फरवरी 2025 को मुख्य चुनाव आयुक्त बनाए गए। किंतु उसके पहले, भाजपा ने 2014 में और 2019 में शानदार जीत हासिल की थी। वह किसके कारण? तब तो ज्ञानेश कुमार चित्र में ही नहीं थे..!

आपका और हमारा दुर्भाग्य है कि इस देश का विपक्ष, विकास की संभावनाओं पर नहीं बोलता, देश के नीति निर्धारण की बहस में हिस्सा नहीं लेता, सामान्य व्यक्ति की सही समस्याओं को नहीं उठाता। वह तो केवल, जितनी भी संवैधानिक संस्थाएं हैं, उन पर आक्रमण कर रहा है।यह ठीक नहीं है।

जब पूरे विश्व में भारत के जांबाज कैप्टन स्मिथ मच्छार के शौर्य की वीरगाथा गायी जा रही है, तब हमारा विपक्ष इस वीर कैप्टन के बारे में एक शब्द भी नहीं बोल रहा। भारत एशियाई खेलों में अच्छा प्रदर्शन कर रहा है, उस पर भी यह सब खामोश है। देश में इस समय हनुमान भक्ति की बयार बह रही है। उस पर भी नि:शब्द है।उनका एक सूत्रीय कार्यक्रम संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करने का है।ऐसा विपक्ष हमारे देश में है, यह हम सब का दुर्भाग्य है..!

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