भारत में एक ऐसा गिरोह सक्रिय है जो खुद को स्कॉलर कहता है, पर काम मिशनरी का करता है। गैल ओमवेट उसी गिरोह की सबसे सफल एजेंट थी जिसे अमेरिका से भारत में योजनाबद्ध तरीके से प्लांट किया गया था।

एक अमेरिकी गोरी महिला 1970 में भारत आती है। कहती है मुझे फुले पर रिसर्च करना है। 1976 में वह यही के एक अनाम व्यक्ति से शादी करती है जो श्रमिक नेता कहता था स्वयं को।

भारत दरवाजा खोल देता है। वो यहीं बस जाती है। 1983 में अमेरिकी नागरिकता छोड़कर भारतीय बन जाती है। ताकि उस पर कोई उंगली न उठा सके। फिर भारत के सबसे बड़े संस्थानों में घुस जाती है। पुणे यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर, इग्नू में अंबेडकर चेयर, नेहरू मेमोरियल म्यूजियम में सीनियर फेलो, यूएनडीपी और ऑक्सफैम की कंसल्टेंट। भारत सरकार उसे पैसा देती है, इज्जत देती है, कुर्सी देती है। वो उस कुर्सी पर बैठकर भारत को ही गाली देती है। 

उसकी थ्योरी एक लाइन की थी, ब्राह्मण विदेशी आर्य हैं, दलित भारत के मूलनिवासी हैं, हिंदू धर्म ब्राह्मणों का बनाया हुआ नस्लवाद है।

अमेरिका में गोरा बनाम काला, भारत में ब्राह्मण बनाम दलित। उसने जाति को नस्ल बना दिया। यही थ्योरी उसने किताबों में लिखी, क्लास में पढ़ाई, और विदेशी एजेंसियों को रिपोर्ट बनाकर बेची। आज अमेरिका के चर्च फंडेड यूनिवर्सिटी में जो कोर्स चलता है हिंदुइज्म इज रेसिज्म, उसकी लेखक यही है।

उसकी बेटी अब न्यूयॉर्क में सेटल है, वही काम करती है, फाउंडेशन फंडिंग लेकर हिंदुत्व को फासीवाद बताती है। मतलब माँ भारत में फंडिंग लेकर भारत को तोड़ती रही, बेटी अमेरिका में फंडिंग लेकर वही करती है। परिवार का बिजनेस ही नफरत है।

ओमवेट का सबसे गंदा हमला हमारी आस्था पर था। उसने लिखा महिषासुर कोई राक्षस नहीं था, वो दलित राजा था, बहुजन नायक था। दुर्गा कोई देवी नहीं थी, वो ब्राह्मणों ने बनाई थी महिषासुर को मारने के लिए। देवताओं ने उसे हथियार दिए क्योंकि अकेला कोई ब्राह्मण देवता उस काले राजा को हरा नहीं सकता था।

यही जहर जेएनयू पहुंचा। वहां दुर्गा को सेक्स वर्कर कहा गया, महिषासुर का शहादत दिवस मनाया गया। बीज ओमवेट का था।

चालाकी समझिए। अगर आप दलित को ये समझा दो कि तुम्हारी देवी ही तुम्हारी हत्यारिन है, तो वो मंदिर क्यों जाएगा? वो धर्म छोड़ देगा। फिर वो कहाँ जाएगा? या तो चर्च में, या जंगल में बंदूक लेकर। पंजाब में धर्मांतरण और बस्तर में नक्सलवाद दोनों इसी थ्योरी पर टिके हैं।

गैल ओमवेट विद्वान नहीं थी। वो एक घुसपैठ थी। उसने जानबूझकर अमेरिकी पासपोर्ट छोड़ा, ताकि  एजेंडा चलाने में आसानी हो। भारत में रहकर, भारत के पैसे से, भारत को नस्लवादी साबित करने का एजेंडा।और भारत के मूर्ख अकादमिक लोग  उसे दलित चिंतक कहते रहे।

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