इक्कीसवीं सदी का सबसे महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक परिवर्तन कोई युद्ध, संधि या सरकार में बदलाव नहीं है अपितु विश्व के आर्थिक शक्ति-केंद्र का उन्नत पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं के एक छोटे समूह से धीरे-धीरे एक अधिक बड़े, विविध और तेजी से मुखर हो रहे वैश्विक दक्षिण की ओर स्थानांतरित होना है। पांच दशकों तक G7 वैश्विक अर्थव्यवस्था के शीर्ष पर रहा। लेकिन जिस दुनिया ने G7 को जन्म दिया था, वह अब बदल रही है। उभरती हुई दुनिया अधिक जनसंख्या वाली, भौगोलिक रूप से अधिक विस्तृत और तेजी से एशिया, अफ्रीका, मध्य पूर्व तथा वैश्विक दक्षिण के इर्द-गिर्द केंद्रित हो रही है। इसीलिए BRICS को केवल G7 के विकल्प के रूप में नहीं समझा जाना चाहिए। इसे नई वैश्विक आर्थिक भौगोलिक संरचना की एक प्रारंभिक संस्थागत अभिव्यक्ति के रूप में समझना अधिक उचित होगा। और इस नई संरचना के केंद्र में भारत खड़ा है।

BRICS युग का अर्थ G7 की पराजय नहीं है। यह उस विश्व का प्रतिबिंब है, जिसमें एक समूह विशेष विश्व के आर्थिक और भू-राजनीतिक संस्था पर एकाधिकार का दावा नहीं कर सकता।


G7 बनाम BRICS से आगे का वास्तविक विमर्श


उभरते हुए वैश्विक प्रतिस्पर्धी परिदृश्य को अक्सर कुछ द्वंद्वों तक सीमित कर दिया जाता है: G7 बनाम BRICS, पश्चिम बनाम पूर्व, विकसित बनाम विकासशील या डॉलर बनाम डी-डॉलराइजेशन। ऐसी व्याख्या के पीछे हो रहे गहरे परिवर्तन को नजरअंदाज करती है। वास्तविक बदलाव एक केंद्रित वैश्विक व्यवस्था से अधिक वितरित वैश्विक व्यवस्था की ओर हो रहा है।
G7 का उदय 1970 के दशक की आर्थिक और भू-राजनीतिक उथल-पुथल के बीच हुआ था, जब तेल संकट, मौद्रिक अस्थिरता और आर्थिक अनिश्चितता ने प्रमुख औद्योगिक अर्थव्यवस्थाओं के बीच समन्वय की आवश्यकता पैदा की। तब से वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में गहरा परिवर्तन आया है। OECD के अनुसार, 2026 की पहली तिमाही में G7 अर्थव्यवस्थाओं की वर्ष-दर-वर्ष वृद्धि लगभग 1.7 प्रतिशत रही। जर्मनी की वृद्धि केवल 0.3 प्रतिशत, जापान की 0.4 प्रतिशत, इटली की 0.7 प्रतिशत, फ्रांस की 1.1 प्रतिशत और कनाडा की 0.6 प्रतिशत रही, जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका अपेक्षाकृत मजबूत 2.7 प्रतिशत की दर से बढ़ा।

इसका अर्थ यह नहीं है कि G7 अप्रासंगिक हो गया है। संयुक्त राज्य अमेरिका अभी भी वैश्विक वित्तीय शक्ति का प्रमुख केंद्र है, जापान तकनीक और पूंजी बाजारों में महत्वपूर्ण क्षमता रखता है तथा जर्मनी एक प्रमुख औद्योगिक अर्थव्यवस्था बना हुआ है। G7 देश वित्त, प्रौद्योगिकी, सैन्य क्षमताओं और वैश्विक संस्थानों के माध्यम से अब भी व्यापक प्रभाव रखते हैं। अधिक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि वैश्विक प्रभाव अब आर्थिक या जनसांख्यिकीय केंद्रीयता का पर्याय नहीं रह गया है। दुनिया अनेक आर्थिक और भू-राजनीतिक शक्ति-केंद्रों की ओर बढ़ रही है और BRICS इस परिवर्तन की सबसे स्पष्ट संस्थागत अभिव्यक्तियों में से एक है।


BRICS और नई आर्थिक भौगोलिक संरचना


BRICS का महत्व केवल इसके विस्तार में नहीं, बल्कि उस आर्थिक और जनसांख्यिकीय शक्ति में है, जिसका यह समूह अब प्रतिनिधित्व करता है। BRIC की अवधारणा मूल रूप से एक आर्थिक प्रस्ताव के रूप में सामने आई थी। 2001 में Goldman Sachs के अर्थशास्त्री जिम ओ'नील ने ब्राजील, रूस, भारत और चीन के लिए BRIC शब्द का प्रयोग किया था। जो शुरुआत में एक निवेश संबंधी अवधारणा थी, वह धीरे-धीरे एक कूटनीतिक संस्था में विकसित हुई। 


2026 तक विस्तारित BRICS समूह विश्व की लगभग 49.5 प्रतिशत जनसंख्या, 40 प्रतिशत वैश्विक GDP और 26 प्रतिशत वैश्विक व्यापार का प्रतिनिधित्व करता है, भारत सरकार के अनुसार। ये आंकड़े केवल कूटनीतिक प्रभाव का संकेत नहीं देते, बल्कि उपभोक्ताओं, श्रमिकों, ऊर्जा संसाधनों, विनिर्माण क्षमता, खाद्य उत्पादन, प्रौद्योगिकी, महत्वपूर्ण खनिजों, रणनीतिक व्यापार मार्गों और वित्तीय पूंजी के विशाल संकेंद्रण को दर्शाते हैं। इससे भी व्यापक आर्थिक परिवर्तन अधिक महत्वपूर्ण है।

IMF के अनुसार, उभरती और विकासशील अर्थव्यवस्थाएं क्रय शक्ति समानता यानी Purchasing Power Parity (PPP) के आधार पर वैश्विक GDP का लगभग 61 प्रतिशत हिस्सा रखती हैं, जबकि विकसित अर्थव्यवस्थाओं की हिस्सेदारी लगभग 39 प्रतिशत है।यह वैश्वीकरण की संरचना में एक मौलिक परिवर्तन को दर्शाता है। उभरती अर्थव्यवस्थाएं अब केवल उन नियमों में शामिल नहीं हो रही हैं जिन्हें कहीं और बनाया गया है। उनका आर्थिक आकार अब इतना बड़ा है कि वे स्वयं उन बाजारों, संस्थानों और नियमों को प्रभावित करने में सक्षम हैं, जो वैश्वीकरण की दिशा निर्धारित करते हैं।


G7 के पास संपदा है, BRICS के पास बढ़ता हुआ वैश्विक प्रभाव


इस परिवर्तन को समझने के लिए संपदा और प्रभाव के बीच का अंतर महत्वपूर्ण डॉलर मूल्य के आधार पर G7 अभी भी काफी बड़ा है। Manohar Parrikar Institute for Defence Studies and Analyses के 2026 के एक विश्लेषण के अनुसार, विस्तारित BRICS का Nominal GDP 32 ट्रिलियन डॉलर से अधिक था, जबकि G7 का लगभग 54.5 ट्रिलियन डॉलर। लेकिन क्रय शक्ति समानता यानी PPP के आधार पर BRICS की अर्थव्यवस्था लगभग 78 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच जाती है, जो वैश्विक GDP का 40 प्रतिशत से अधिक है।

PPP केवल एक सांख्यिकीय अवधारणा नहीं है। जहां Nominal GDP मौजूदा विनिमय दरों पर आर्थिक उत्पादन को दर्शाता है, वहीं PPP किसी अर्थव्यवस्था की वास्तविक क्रय शक्ति और घरेलू आर्थिक क्षमता को बेहतर ढंग से दर्शाता है। बुनियादी ढांचे, ऊर्जा, विनिर्माण, उपभोग और विकास के लिए यह आर्थिक भार अत्यंत महत्वपूर्ण है। BRICS इस प्रकार विश्व की सबसे बड़ी जनसंख्या, संसाधनों, उत्पादन क्षमता और भविष्य की मांग के कुछ सबसे बड़े केंद्रों को एक साथ लाता है। वैश्विक आर्थिक शक्ति का केंद्र केवल एक समूह से दूसरे समूह की ओर स्थानांतरित नहीं हो रहा, बल्कि अधिक व्यापक और वितरित हो रहा है।


राजनीतिक समूह से आर्थिक इकोसिस्टम तक


BRICS का शायद सबसे कम आंका गया आयाम समूह के भीतर बढ़ता व्यापार है। UN Trade and Development के अनुसार, 2003 से 2024 के बीच intra-BRICS merchandise trade 13 गुना से अधिक बढ़ा, और 2024 में निर्यात लगभग 1.17 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया। BRICS की संरचना महत्वपूर्ण आर्थिक पूरकता भी पैदा करती है। ब्राजील कृषि और खनिज संसाधन उपलब्ध कराता है; रूस ऊर्जा और रणनीतिक वस्तुओं का प्रमुख स्रोत है; खाड़ी की अर्थव्यवस्थाएं पूंजी और ऊर्जा प्रदान करती हैं; चीन विशाल विनिर्माण क्षमता और औद्योगिक इकोसिस्टम उपलब्ध कराता है; जबकि भारत सेवाओं, फार्मास्यूटिकल्स, इंजीनियरिंग, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और विशाल उपभोक्ता बाजार की ताकत लेकर आता है।


इंडोनेशिया वस्तुओं, विनिर्माण और समुद्री रणनीतिक महत्व को जोड़ता है। स्वेज नहर पर मिस्र का नियंत्रण उसे वैश्विक व्यापार के लिए असाधारण महत्व देता है। ईरान फारस की खाड़ी को मध्य और दक्षिण एशिया से जोड़ता है। इथियोपिया एक उभरते अफ्रीकी बाजार का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि दक्षिण अफ्रीका पूरे महाद्वीप में औद्योगिक, वित्तीय और लॉजिस्टिक क्षमता प्रदान करता है।साथ मिलकर ये अर्थव्यवस्थाएं केवल उभरते बाजारों का समूह नहीं हैं। इनके पास एक संभावित शक्तिशाली आर्थिक इकोसिस्टम विकसित करने के लिए आवश्यक संसाधन, बाजार, पूंजी, उत्पादन क्षमता और रणनीतिक भौगोलिक स्थिति मौजूद है।
केंद्र में भारत
यदि BRICS उभरती बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का एक प्रमुख स्तंभ है, तो भारत इसके भीतर संतुलन स्थापित करने और विभिन्न शक्ति-केंद्रों को जोड़ने में विशिष्ट भूमिका निभाने की स्थिति में है। भारत BRICS की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था नहीं है, चीन है। न ही भारत के पास सबसे बड़े ऊर्जा भंडार या सबसे बड़ी विनिर्माण क्षमता है। भारत का रणनीतिक लाभ कहीं और है: कनेक्टिविटी और रणनीतिक स्वायत्तता।


भारत BRICS और G20 का संस्थापक सदस्य है, Quad में भागीदार है, संयुक्त राज्य अमेरिका का रणनीतिक साझेदार है, रूस के साथ महत्वपूर्ण संबंध रखता है तथा यूरोप और खाड़ी देशों के लिए लगातार महत्वपूर्ण आर्थिक साझेदार बन रहा है। भारत हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सक्रिय रूप से जुड़ा है और वैश्विक दक्षिण की एक महत्वपूर्ण आवाज के रूप में अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है।


संबंधों का यह व्यापक नेटवर्क भारत को असाधारण रणनीतिक लचीलापन प्रदान करता है। एक तेजी से विभाजित होती अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में विभिन्न भू-राजनीतिक शक्ति-केंद्रों के साथ संवाद करने की क्षमता स्वयं एक प्रकार की शक्ति है।
इसलिए भारत की BRICS नीति को पश्चिम की जगह किसी दूसरे गुट को स्थापित करने के प्रयास के रूप में देखने की आवश्यकता नहीं है। यह बहुध्रुवीय व्यवस्था के भीतर रणनीतिक स्वायत्तता का विस्तार है। भारत BRICS में रहते हुए वॉशिंगटन के साथ सहयोग बढ़ा सकता है, रूस के साथ संबंध बनाए रखते हुए यूरोप के साथ साझेदारी मजबूत कर सकता है और खाड़ी देशों के साथ संबंधों को आगे बढ़ाते हुए हिंद-प्रशांत में अपने हितों को सुदृढ़ कर सकता है ।

भारत का उद्देश्य किसी एक भू-राजनीतिक खेमे को चुनना नहीं, बल्कि भारत के रणनीतिक विकल्पों और कार्यक्षेत्र का विस्तार करना है।उभरती वैश्विक व्यवस्था के लिए स्थापित और उभरती शक्तियों के बीच टकराव अनिवार्य नहीं है। आवश्यकता अनेक शक्ति-केंद्रों और निर्णयकारी क्षमताओं की है। इस व्यवस्था में भारत की तुलनात्मक शक्ति केवल उसका आकार नहीं है। उसकी वास्तविक क्षमता विभिन्न शक्ति-केंद्रों को जोड़ने में है। BRICS का वर्तमान दौर इसलिए किसी एक प्रभावशाली गुट को दूसरे से प्रतिस्थापित करने की कहानी नहीं है। यह इस वास्तविकता की स्वीकार्यता है कि दुनिया इतनी बड़ी, विविध और आर्थिक रूप से वितरित हो चुकी है कि कोई एक समूह उसके भविष्य को अकेले निर्धारित नहीं कर सकता।और वैश्विक दक्षिण, पश्चिम, हिंद-प्रशांत, यूरेशिया तथा खाड़ी क्षेत्र के संगम पर स्थित भारत के पास इस उभरती व्यवस्था को आकार देने का एक ऐतिहासिक अवसर है। भारत का आर्थिक भार उसकी रणनीतिक भूमिका को मजबूत करता है

भारत की केंद्रीयता उसकी आर्थिक विकास यात्रा से और मजबूत होती है। विश्व बैंक के अनुसार, भारत की अर्थव्यवस्था FY2025–26 में 7.6 प्रतिशत की दर से बढ़ी और FY2026–27 के लिए 6.6 प्रतिशत की वृद्धि का अनुमान है। IMF के जुलाई 2026 के अपडेट में भी 2026 के लिए भारत की कैलेंडर-वर्ष वृद्धि 6.4 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया है। लेकिन भारत का महत्व केवल आर्थिक विकास दर तक सीमित नहीं है। इसकी शक्ति 1.4 अरब से अधिक की आबादी, विशाल उपभोक्ता बाजार, युवा कार्यबल, प्रतिस्पर्धी IT और बिजनेस सेवाओं, फार्मास्यूटिकल्स, तेजी से बढ़ते इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र, उद्यमिता और विस्तारित भौतिक एवं डिजिटल बुनियादी ढांचे के संयोजन में निहित है।आधार ने डिजिटल पहचान की आधारशिला तैयार की, UPI ने भुगतान व्यवस्था को बदल दिया और India Stack ने डिजिटल पहचान, भुगतान तथा डेटा-आधारित सेवाओं के इर्द-गिर्द एक व्यापक इकोसिस्टम विकसित किया। भारत धीरे-धीरे ऐसा मंच बन रहा है, जिसके माध्यम से वैश्विक दक्षिण जुड़ सकता है, लेन-देन कर सकता है, नवाचार कर सकता है और विकास कर सकता है।


UPI, NDB और भारत का BRICS क्षण


BRICS मुद्रा की बहस एक अधिक महत्वपूर्ण संभावना को नजरअंदाज करती है: मौद्रिक प्रभाव शायद डॉलर को हटाने से नहीं, बल्कि सीमा-पार लेन-देन की बाधाओं को कम करने से शुरू होगा।2026 BRICS शिखर सम्मेलन के दौरान Financial Times ने रिपोर्ट किया कि भारत के UPI और ब्राजील के Pix ने पिछले 18 महीनों में संयुक्त रूप से 10 ट्रिलियन डॉलर से अधिक के लेन-देन संसाधित किए, जबकि दोनों प्रणालियां अधिक सीमा-पार इंटरऑपरेबिलिटी की संभावनाएं तलाश रही थीं। यदि ऐसी डिजिटल प्रणालियां वैश्विक दक्षिण के सीमा-पार आर्थिक ढांचे का हिस्सा बनती हैं, तो भारत का प्रभाव उसके GDP हिस्से से कहीं आगे बढ़ सकता है। BRICS का सबसे महत्वपूर्ण नवाचार इसलिए साझा मुद्रा नहीं, बल्कि ऐसा वित्तीय बुनियादी ढांचा हो सकता है जो सीमा-पार व्यापार को तेज, सस्ता और अधिक सुलभ बनाए। 2015 में संस्थापक BRICS सदस्यों द्वारा स्थापित New Development Bank (NDB) यह दिखाता है कि समूह अब केवल राजनीतिक विमर्श तक सीमित नहीं है। जून 2026 तक NDB ने 44 अरब डॉलर के 141 परियोजनाओं को मंजूरी दी थी और लगभग 25 अरब डॉलर वितरित किए थे। इसके परिचालन में स्थानीय मुद्राओं की हिस्सेदारी लगभग 30 प्रतिशत थी। भारत NDB वित्तपोषण का दूसरा सबसे बड़ा प्राप्तकर्ता बन चुका है। भारत के लिए 35 परियोजनाओं को लगभग 10.5 अरब डॉलर की मंजूरी मिली है, जो बैंक के ऋण पोर्टफोलियो का लगभग 24 प्रतिशत है। ये परियोजनाएं परिवहन, स्वच्छ ऊर्जा, जल और शहरी बुनियादी ढांचे से जुड़ी हैं। इस प्रकार BRICS भू-राजनीतिक विचारों को आर्थिक संस्थागत आधार प्रदान कर रहा है।


भारत की BRICS अध्यक्षता: राजनीति से समस्या-समाधान तक


भारत की 2026 BRICS अध्यक्षता, जिसके अंतर्गत 12–13 सितंबर को नई दिल्ली में 18वां BRICS शिखर सम्मेलन आयोजित हुआ, “Building for Resilience, Innovation, Cooperation and Sustainability” की थीम के साथ BRICS को केवल भू-राजनीतिक प्रतिरोध के मंच के बजाय एक विकासात्मक मंच के रूप में स्थापित करने का प्रयास है।
इसके एजेंडे में डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, AI गवर्नेंस, औद्योगिक सहयोग, स्थानीय मुद्रा वित्तपोषण, व्यापार सुगमता, बुनियादी ढांचा, मानक, आपूर्ति-श्रृंखला लचीलापन, MSME वित्त, सतत विकास और स्वास्थ्य सहयोग शामिल हैं। भारत ने GIFT City में BRICS Risk Lab की स्थापना का प्रस्ताव भी रखा है। उद्देश्य स्पष्ट है: BRICS को एक प्रभावी समस्या-समाधान मंच में बदलना।


डी-डॉलराइजेशन से डी-कंसंट्रेशन तक


BRICS को मुख्य रूप से डॉलर के प्रभुत्व को समाप्त करने के प्रयास के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इससे अधिक महत्वपूर्ण परिवर्तन वैश्विक मौद्रिक व्यवस्था का डी-कंसंट्रेशन, यानी अधिक विविध और वितरित होना है।
डॉलर अभी भी वैश्विक वित्त, व्यापारिक भुगतान, विदेशी मुद्रा भंडार और पूंजी बाजारों में गहराई से स्थापित है। इसलिए अधिक व्यावहारिक दिशा यह है कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वित्त में निपटान प्रणालियों तथा मुद्राओं के अधिक विकल्प उपलब्ध हों। NDB का स्थानीय मुद्रा वित्तपोषण, जिसमें भारतीय रुपया और ब्राजीलियाई रियल जैसी मुद्राएं शामिल हैं, स्थानीय पूंजी बाजारों को समर्थन देता है और मौद्रिक बहुलवाद की दिशा दिखाता है। भविष्य का प्रभाव किसी मौजूदा व्यवस्था को समाप्त करने से नहीं, बल्कि विश्वसनीय विकल्पों के निर्माण से आएगा।


G7 के पास संचित संपदा है, BRICS के पास बढ़ती मांग


मूलभूत अंतर जनसांख्यिकीय और विकासात्मक दिशा में है। G7 में ऐसी परिपक्व अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं, जिनके पास लंबे समय से संचित संपदा, विकसित पूंजी बाजार और उन्नत प्रौद्योगिकियां हैं। इसके विपरीत, BRICS तेजी से हो रहे संरचनात्मक परिवर्तन, विशाल आबादी, विस्तारित उपभोक्ता बाजार, बुनियादी ढांचे की बढ़ती जरूरतों और भविष्य की मांग का प्रतिनिधित्व करता है। जहां G7 की अर्थव्यवस्थाओं को वृद्ध होती आबादी की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है, वहीं BRICS के कई सदस्य देशों के पास अभी भी बड़ी कार्यशील आयु वाली आबादी और विनिर्माण, ऊर्जा, खनिज एवं अन्य कमोडिटीज, प्रौद्योगिकी तथा नवाचार के महत्वपूर्ण केंद्र मौजूद हैं। G7 संचित शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि BRICS भविष्य की मांग का। अगले 25 वर्षों में यही अंतर रणनीतिक रूप से निर्णायक साबित हो सकता है।


G7 समाप्त नहीं हुआ है, लेकिन अब अधूरा है
G7 को समाप्त घोषित करना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा। अमेरिका वैश्विक वित्त, प्रौद्योगिकी और सैन्य शक्ति के केंद्र में बना हुआ है। वहीं G7 की अर्थव्यवस्थाओं के पास गहरे पूंजी बाजार, अग्रणी विश्वविद्यालय, मजबूत अनुसंधान क्षमताएं, वैश्विक कंपनियां और व्यापक संस्थागत क्षमता मौजूद है। अधिक महत्वपूर्ण तर्क यह है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के प्रतिनिधित्व के संदर्भ में G7 अब अधूरा हो गया है। 2026 में Reuters द्वारा उद्धृत Center for Strategic and International Studies के एक विश्लेषण के अनुसार, वैश्विक GDP में G7 की हिस्सेदारी घटकर 44.1 प्रतिशत रह गई है, जबकि इस समूह के गठन के समय यह लगभग 60.5 प्रतिशत थी। G7 अभी भी शक्तिशाली है, लेकिन उसका सापेक्ष आर्थिक भार और प्रतिनिधित्व का दायरा बदल चुका है। अब प्रश्न यह है कि क्या उभरती शक्तियों को अधिक स्थान दिए बिना G7 वैश्विक व्यवस्था को उसी तरह परिभाषित करता रह सकता है।
अगली प्रतिस्पर्धा मानकों को लेकर होगी


भविष्य का प्रभाव केवल GDP से निर्धारित नहीं होगा। यह इस बात से भी तय होगा कि AI, डिजिटल भुगतान, सेमीकंडक्टर, महत्वपूर्ण खनिजों, ऊर्जा, डेटा, जलवायु वित्त, व्यापार और विकास वित्त के मानक कौन निर्धारित करता है। भारत की 2026 BRICS अध्यक्षता के दौरान AI सहयोग और मानकीकरण को एजेंडे में प्रमुखता मिली है। इसमें AI मानकों के लिए साझा दृष्टिकोण विकसित करने की दिशा में Bureau of Indian Standards की भागीदारी भी शामिल है। मानक यह निर्धारित करते हैं कि बाजार कैसे संचालित होंगे, कौन-सी प्रौद्योगिकियां स्वीकार्यता प्राप्त करेंगी, डेटा किस प्रकार सीमाओं के पार प्रवाहित होगा और उभरते डिजिटल एवं औद्योगिक इकोसिस्टम में किन कंपनियों को भागीदारी का अवसर मिलेगा।इसलिए अगली भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा केवल भूभाग के नियंत्रण को लेकर नहीं, बल्कि प्रौद्योगिकी, व्यापार और पूंजी को संचालित करने वाले नियमों को निर्धारित करने को लेकर भी हो सकती है। जो देश इन मानकों के निर्माण में योगदान देगा, वह कल के बाजारों पर अधिक प्रभाव डाल सकेगा।


भारत के लिए अवसर केवल एक और महान शक्ति बनने का नहीं है, बल्कि वैश्विक दक्षिण के लिए एक सिस्टम-एनेबलिंग शक्ति, अर्थात वैश्विक व्यवस्था को सक्षम बनाने वाली शक्ति, बनने का है। डिजिटल पहचान, त्वरित भुगतान, वित्तीय समावेशन, फार्मास्यूटिकल्स, वैक्सीन, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, डिजिटल गवर्नेंस, नवीकरणीय ऊर्जा, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचा विकास में भारत का अनुभव उसे एक विशिष्ट आधार प्रदान करता है। रणनीतिक अवसर इन क्षमताओं को विश्व स्तर पर उपयोग किए जा सकने वाले समाधानों में बदलने में है: सस्ती डिजिटल अवसंरचना, वित्तीय कनेक्टिविटी, प्रौद्योगिकी, फार्मास्यूटिकल्स, कुशल मानव संसाधन और विकास संबंधी विशेषज्ञता। वैश्विक दक्षिण के बड़े हिस्से के लिए सबसे मूल्यवान प्रस्ताव शायद एक और वर्चस्ववादी शक्ति नहीं, बल्कि ऐसे समाधान होंगे जो व्यापक स्तर पर लागू किए जा सकें, किफायती हों और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप ढाले जा सकें। इसलिए भारत की वास्तविक बढ़त उभरती वैश्विक व्यवस्था पर प्रभुत्व स्थापित करने में नहीं, बल्कि उसके निर्माण में योगदान देने में हो सकती है।


भारत-चीन समीकरण
चीन BRICS की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति बना हुआ है। UNCTAD के अनुसार, वह intra-BRICS trade में सबसे बड़ा निर्यातक और आयातक है, जिससे वह समूह के आंतरिक वाणिज्यिक प्रवाह का प्रमुख संचालक बन जाता है। चीन की औद्योगिक क्षमता उसे अत्यधिक प्रभाव प्रदान करती है, लेकिन यही स्थिति एक संरचनात्मक चुनौती भी पैदा करती है। यदि BRICS को चीनी भू-राजनीतिक प्राथमिकताओं के विस्तार के रूप में देखा जाने लगे, तो उसकी व्यापक वैश्विक वैधता सीमित हो सकती है। यही कारण है कि भारत की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। भारत ब्लॉक आधारित राजनीति के स्थान पर संस्थागत बहुलवाद की वकालत कर सकता है और यह सुनिश्चित कर सकता है कि BRICS विविध शक्तियों के लिए एक साझा मंच बना रहे। एक टिकाऊ BRICS को चीन के आर्थिक भार को स्वीकार करते हुए भारत, ब्राजील, रूस, खाड़ी देशों, अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया के लिए सार्थक रणनीतिक स्थान भी बनाए रखना होगा। BRICS की विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह अपनी विविधता को कमजोरी और गतिरोध का कारण बनने देने के बजाय अपनी शक्ति में बदल पाता है या नहीं।


BRICS वैश्विक व्यवस्था को व्यापक बनाएगा


BRICS के G7 का स्थान सीधे लेने की संभावना कम है। डॉलर, पश्चिमी संस्थाएं, NATO, अमेरिकी प्रौद्योगिकी और G7 की अर्थव्यवस्थाएं प्रभावशाली बनी रहेंगी। लेकिन इनके साथ BRICS, G20, ASEAN, अफ्रीकी संस्थाएं, खाड़ी देशों की पूंजी, भारतीय डिजिटल अवसंरचना, चीनी विनिर्माण, विकास बैंक, वैकल्पिक भुगतान प्रणालियां और क्षेत्रीय आपूर्ति शृंखलाएं भी अधिक प्रभावशाली होती जाएंगी। इसलिए उभरती वैश्विक व्यवस्था किसी एक नए वर्चस्ववादी तंत्र के बजाय एक-दूसरे से जुड़े और परस्पर ओवरलैप करते अनेक शक्ति-केंद्रों का नेटवर्क बन सकती है।भारत आर्थिक आकार, रणनीतिक स्वायत्तता, तकनीकी क्षमता और विभिन्न प्रतिस्पर्धी भू-राजनीतिक केंद्रों के साथ संबंधों का अनूठा संयोजन रखता है। उसकी 2026 BRICS अध्यक्षता इंटरऑपरेबल भुगतान प्रणालियों, intra-BRICS व्यापार, स्थानीय मुद्रा वित्तपोषण, AI गवर्नेंस, विकास वित्त और लचीली आपूर्ति शृंखलाओं को आगे बढ़ाने का अवसर प्रदान करती है।


भारत BRICS सहयोग को गहरा करते हुए अमेरिका, यूरोप, जापान, रूस, खाड़ी देशों और हिंद-प्रशांत क्षेत्र के साथ अपने रचनात्मक संबंधों को भी बनाए रख सकता है। उसे किसी एक खेमे का नेतृत्व करना आवश्यक नहीं है। उसका बड़ा अवसर कई शक्ति-केंद्रों को आपस में जोड़ने में है।बीसवीं सदी का वैश्विक विमर्श काफी हद तक अटलांटिक केंद्रित था। इक्कीसवीं सदी तेजी से हिंद-प्रशांत, यूरेशिया, अफ्रीका और वैश्विक दक्षिण से आकार ले रही है। लगभग आधी मानवता, वैश्विक GDP के करीब 40 प्रतिशत और वैश्विक व्यापार के लगभग एक-चौथाई हिस्से का प्रतिनिधित्व करने वाला BRICS इस परिवर्तन का प्रतिबिंब है। 2003 के बाद से intra-BRICS निर्यात में तेरह गुना से अधिक वृद्धि हुई है, जबकि New Development Bank बुनियादी ढांचे के वित्तपोषण का एक महत्वपूर्ण स्रोत बनकर उभरा है। BRICS युग का अर्थ G7 की पराजय नहीं है। यह उस विश्व का प्रतिबिंब है, जिसमें एक समूह विशेष विश्व के आर्थिक और भू-राजनीतिक संस्था पर एकाधिकार का दावा नहीं कर सकता। भारत इस परिवर्तन के केंद्र में खड़ा है। वह क्षेत्रों, बाजारों और भू-राजनीतिक विभाजनों को जोड़ने की क्षमता रखता है। उभरती वैश्विक व्यवस्था का केवल एक केंद्र नहीं होगा। उसके अनेक केंद्र होंगे। भारत के लिए अवसर इन सभी केंद्रों को जोड़ने वाला सेतु बनने में है।

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