अभद्र देवदत्त पटनायक के प्रत्येक झूठ का पोल खोल चलेगा, उसी शृंखला में यह दूसरी कड़ी प्रस्तुत है।

आज अभद्र पटनायक ने केरल की पांच पुस्तकों पर चर्चा की जिनके नाम पोस्ट के अंत में दिए गए हैं। पांच पुस्तकें जिसे मिथ्या जानकार देवदत्त पटनायक वासना की किताब बता कर गाली देता है, उनका सौंदर्य अद्भुत है। अभद्र पटनायक को विष्ठा भोजन की आदत है तो छप्पन भोग बेस्वाद लगेगा ही। भोग से याद आया कहीं व्यंजन का भी पोर्नाइजेशन न कर दें।

खैर, असल में हैं क्या ये पाँच किताबें - वैशिकतंत्रम, उन्नियाची चरितम, उन्नीचिरुतेवी चरितम, उन्नुनीली संदेशम, उन्नियादी चरितम।

अभद्र पटनायक इन्हें ब्राह्मण वासना की किताब कह कर गाली देता है। सुंदर वस्तु से घृणा म्लेच्छों का प्रमुख लक्षण है, जहां वे सुंदरता देखते हैं उसे गाली देने लगते हैं, विरूपित करने लगते हैं। जिन पुस्तकों को वह गाली दे रहा वे केरल की 14वीं सदी का सबसे सुंदर दौर हाथ से निकल जाएगा। ये वास्ता नहीं, समृद्धि की पुस्तकें हैं।

इन्हें पढ़ने के बाद आप जानेंगे, 

1.इनकी पहली विशेषत भाषा का संगम है उत्तर-दक्षिण भेद खत्म कर देता है

मणिप्रवलम का मतलब है मणि और मूँगे की माला। मणि जैसा चमकता संस्कृत शब्द, मूँगे जैसा लाल केरल शब्द। लीलातिलकम इसका व्याकरण लिखता है - कहाँ संस्कृत संज्ञा आएगी, कहाँ मलयलम की क्रिया लगेगी, कहाँ विभक्ति संस्कृत की और कहाँ द्रविड़ की। ये खिचड़ी नहीं, माला है।

ये उत्तर-दक्षिण की दीवार तोड़ता है। मंदिर में जो ब्राह्मण संस्कृत पढ़ता था, वही बाहर उसी संस्कृत को केरल की लोक-भाषा में गा रहा है। जैसे तुलसी ने 200 साल बाद संस्कृत की रामकथा को अवधी में सबका बना दिया, वैसे ही इन कवियों ने संस्कृत को मलयालम में सबका बना दिया। ये समरस समाज का पहला मॉडल है जहाँ देव-भाषा और लोक-भाषा एक ही पंक्ति में बराबर बैठी हैं।

2. दूसरी विशेषता - नगर-काव्य, दरबारी काव्य नहीं

ये राजा के युद्ध की प्रशस्ति नहीं, नगर के वैभव की प्रशस्ति हैं। इसका सबसे सुंदर उदाहरण उन्नुनीली संदेशम है। कालिदास के मेघदूत की तरह संदेश-काव्य। एक प्रेमी अपनी प्रेमिका उन्नुनीली के पास दूत भेजता है। दूत आकाश में नहीं, केरल की जमीन पर पैदल चलता है, कदुत्तुरुथी से तिरुवनंतपुरम तक 132 गाँवों, नदियों, घाटों, बंदरगाहों, बाजारों, मंदिरों के नाम गिनता है। आज केरल का इतिहास इसी एक किताब से बनता है कि तब कौन सा बंदरगाह चलता था, कहाँ नमक बनता था। प्रेम के बहाने भूगोल, श्रृंगार के बहाने व्यापार।

3.तीसरी विशेषता - समृद्धि का दस्तावेज

इनकी नायिकाओं को वेश्या कह कर हम आज की नजर से देखते हैं। मूल शब्द है तालियिल नाचुन्नवल, नगर-स्त्री। शिलालेख कहते हैं इनके पास अपनी जमीन थी, अपने कर्मचारी थे, अपना खजाना था। ये पढ़ी-लिखी, अमीर, स्वतंत्र थीं।

वैशिकतंत्रम उनकी मैनेजमेंट बुक है - अर्थानां अर्जनं रक्षणं वर्धनं। पैसा कैसे कमाना, कैसे बचाना, कैसे बढ़ाना, राज्य को कर कैसे देना। यौवनं धनम् का मतलब जवानी बेचो नहीं, मतलब जवानी भी धन के समान है इसे व्यर्थ मत करो, जैसे हम कहते हैं समय धन है। कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में गणिका को राज्य की करदाता लिखा है, कोई बाजारू नहीं। 

4.चौथा लालित्य - चुनाव वाली स्त्री

उन्नियाची, उन्नीचिरुतेवी, उन्नियादी - तीनों खुद चुनती हैं किसके साथ रहना, किसे ठुकराना, किसे दान देना। जब कवि कहता है इन्हें देखने इंद्र भी स्वर्ग छोड़ कर आए, तो वो अतिशयोक्ति अलंकार है, नगर की प्रशस्ति है। जैसे आज कहते हैं इस शहर की रोशनी देखने परदेस से लोग आते हैं।

 पाँचों का अलग स्वाद 

वैशिकतंत्रम- अर्थ सिखाता है।

उन्नियाची चरितम - नर्तकी के वैभव का चित्र, केश में चंपा, आँख में मानसून।

उन्नीचिरुतेवी चरितम- प्रेम में चुनाव का शौर्य, चुंबन संस्कृत में, संवाद मलयालम में।

उन्नुनीली संदेशम - सबसे सुंदर, प्रेम में भूगोल।

उन्नियादी चरितम - सबसे नाजुक, सिर्फ प्रतीक्षा और पत्र, जहाँ संस्कृत के लंबे समास टूट कर मलयालम की छोटी मीठी ध्वनियों में बदल जाते हैं।

तो निचोड़ क्या है। एक तरफ भाषा जहाँ उत्तर और दक्षिण एक माला बन गए, दूसरी तरफ साहित्य जहाँ कविता युद्ध नहीं बाजार गिन रही है, तीसरी तरफ समृद्धि जहाँ मुगलों से डेढ़ सौ साल पहले दक्षिण का मंदिर-नगर कितना अमीर और व्यवस्थित था पता चलता है, और चौथी तरफ स्त्री जो दासी नहीं चुनाव करती है।इसको कामुक मार्केटिंग कहना भाषा का, साहित्य का, समृद्धि का और समरस समाज चारों का अपमान है।अभद्र पटनायक यही अपमान को लेखन मानता है।

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