13 करोड़ वोट काट दिए ?

पहले ईवीएम, फिर अब एसआईआर। लक्ष्य एक—भारत की निर्वाचन प्रक्रिया के विरुद्ध विद्रोह खड़ा करना। इसके लपेटे में सुप्रीम कोर्ट को भी खड़ा कर देना, ताकि विद्रोह के षड्यंत्र का पूर्ण क्रियान्वयन हो सके। न तथ्य, न विधिक सच्चाई और न परंपरा—किसी भी कसौटी पर आरोपों की जांच न हो और जो झूठ हम कहें, उसी का नैरेटिव खड़ा हो। यह वातावरण देश की संसदीय राजनीति का मॉडल बनाने का प्रयास हो रहा है। लोकतंत्र जनादेश से चलता है, इसी के जरिये सत्ता स्थापित होती है, लेकिन इस देश में एक वर्ग स्वयं को स्वाभाविक शासक दल या परिवार मानकर चलता है। इसी मानसिकता ने 2014 के बाद से लगातार जनादेश की बदली इबारत को खारिज किया है। जनता की अदालत से सतत पिटता हुआ विपक्ष मतदान व्यवहार को समझने की जगह सत्ता के लिए अराजकता को ही साधन मान बैठा है। ताजा एसआईआर विवाद एक संगठित अराजक प्रलाप है। इसका उद्देश्य बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका की तरह भारत में संसदीय लोकतंत्र को उखाड़ फेंकना है। एसआईआर के विधिक, तकनीकी और प्रशासनिक पक्षों को समझने का एक प्रयास आज के विश्लेषण में......

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विशेष गहन मतदाता परीक्षण (SIR) को लेकर सोशल मीडिया और राजनीतिक चर्चा में सबसे बड़ा दावा यह है कि “13 करोड़ लोगों के वोट काट दिए गए।”

भारत निर्वाचन आयोग के बुलेटिन और राज्य स्तरीय आंकड़ों के अनुसार यह दावा गलत है। लगभग 13 करोड़ 37 लाख वोटरों को अभी ड्राफ्ट इलेक्ट्रोरल सूची के स्तर पर अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत और दोहराव (Absent, Shifted, Dead और Duplicate (ASDD) श्रेणियों में चिन्हित किया गया है। ये नाम अंतिम सूची से स्वतः नहीं हटे हैं।

ड्राफ्ट में चिन्हित होना अंतिम सूची से नाम हटने के बराबर नहीं है।

आयोग के आंकड़ों के मुताबिक इन चिन्हित नामों में लगभग 2.8 करोड़ मृत, 3 करोड़ अनुपस्थित या पता ही नहीं, 6.3 करोड़ स्थायी रूप से स्थानांतरित और करीब 1 करोड़ डुप्लीकेट एंट्रीज शामिल हैं।

ड्राफ्ट प्रकाशन के बाद क्लेम और आपत्ति, सत्यापन, सुनवाई और मतदाता पंजीकरण अधिकारी (ERO) के निर्णय की प्रक्रिया होती है। राजनीतिक दलों और उनके बूथ लेबल एजेंट को ड्राफ्ट सूची की जांच का अवसर दिया जाता है। यह ड्राफ्ट रोल सभी राजनीतिक दलों और उनके 20 लाख से अधिक बीएलए कार्यकर्ताओं के साथ साझा किया जाता है, ताकि वे इन एंट्रीज को सत्यापित कर सकें। इसके अलावा, इस दौरान हर वैध वोटर को क्लेम और आपत्ति दाखिल करने का अधिकार है।

इसलिए ड्राफ्ट रोल में किसी नाम का आ जाना और उसका अंतिम मतदाता सूची से हट जाना, दोनों अलग-अलग बातें हैं।

एसआईआर का उद्देश्य किसी वैध वोटर का नाम हटाना नहीं, बल्कि हर पात्र वोटर को अंतिम सूची में शामिल करना और त्रुटियों को दूर करना है।

राजनीतिक विमर्श में मीडिया के माध्यम से नैरेटिव यह खड़ा हो चुका है कि चुनाव आयोग ने 13.37 करोड़ वोट काट दिए हैं। यह सब मोदी सरकार के इशारों पर किया गया है।

सच्चाई को शोर में दबाने की कोशिशें हो रही हैं। एक व्यवस्थित तंत्र भारत में संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता को सुपारी लेकर खत्म करना चाहता है। मीडिया रिपोर्ट्स, आंदोलन और फिर कोर्ट के युग्म को खड़ा कर टूलकिट पर संसदीय राजनीति को नियंत्रित करने की कोशिशें हो रही हैं। यह काम बहुत ही चालाकी के साथ हो रहा है, इसलिए एसआईआर के विषय को तकनीकी और विधिक दृष्टि से समझने की आवश्यकता है।

विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर फैलाए जा रहे दावे, मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर दबाव और अब सर्वोच्च न्यायालय को भी विवाद में घसीटने की कोशिश। ये अलग-अलग घटनाएं नहीं हैं। ये एक बड़े संस्थागत दबाव का हिस्सा लगते हैं। चुनाव आयोग ने इन आरोपों के जवाब दिए हैं। लेकिन अगर ये दबाव और भ्रम फैलाने वाले दावे कामयाब हो गए, तो असर सिर्फ मतदाता सूची तक नहीं रुकेगा। न्यायपालिका, चुनावों की वैधता और कानून-व्यवस्था तक पहुंच सकता है।

० बिहार-बंगाल पर हमला, केरल-तमिलनाडु पर चुप्पी ०

सबसे साफ विरोधाभास यहीं दिखता है। विपक्ष लगातार बिहार और पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणामों पर एसआईआर का हवाला देकर सवाल उठा रहा है। चुनाव रद्द करने या उनकी वैधता पर शक जताने की बात भी हो रही है। लेकिन केरल और तमिलनाडु में भी एसआईआर की प्रक्रिया चली थी। वहां भी मतदाता सूची का पुनरीक्षण हुआ था। फिर वहां के चुनाव परिणामों पर विपक्ष क्यों चुप है? अगर एसआईआर बिहार और बंगाल में गलत था, तो केरल और तमिलनाडु में सही कैसे हो गया? अगर बिहार और बंगाल के चुनाव रद्द होने चाहिए, तो क्या विपक्ष केरल और तमिलनाडु के चुनाव भी रद्द करने की मांग करेगा? यह सवाल अपने आप में बहुत कुछ बताता है। एक ही प्रक्रिया पर जहां नुकसान दिखे, वहां हमला; जहां फायदा हो, वहां मौन। यह प्रक्रिया की शुद्धता की लड़ाई कम, राजनीतिक सुविधा की लड़ाई ज्यादा लगती है।

मीडिया में फैलाया जा रहा प्रचार और आयोग के जवाब

मीडिया और राजनीतिक चर्चा में लगातार यह बात कही जा रही है कि एसआईआर बड़े पैमाने पर मतदाताओं का नाम काट रहा है, तकनीकी सिस्टम वैधानिक सुरक्षा को दरकिनार कर रहा है और आयोग की प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं है। चुनाव आयोग ने इन बातों पर अपनी स्थिति साफ की है। प्रक्रिया कई चरणों में चलती है। नाम हटाने से पहले नोटिस और सुनवाई होती है। फैसला वैधानिक अधिकारियों के हाथ में है। सुविधा बढ़ाने वाले कदमों को असफलता बताना तथ्यों को उल्टा पेश करना है। लेकिन असल मुद्दा सिर्फ इन जवाबों का नहीं है। मुद्दा यह है कि ये दावे आयोग की विश्वसनीयता को लगातार निशाना बना रहे हैं और संस्था पर दबाव बना रहे हैं।

०सुप्रीम कोर्ट को विवाद के केंद्र में लाने की कोशिश०

अब यह दबाव सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंच गया है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति से जुड़े कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अदालत की टिप्पणियां, मुख्य चुनाव आयुक्त की भूमिका और एसआईआर से जुड़ी अलग-अलग याचिकाएं—इन सबको जोड़कर एक बड़ा प्रचार अभियान खड़ा किया जा रहा है। कुछ संगठनों ने न्यायाधीशों की निष्पक्षता और संभावित हित-संघर्ष पर भी सवाल उठाए हैं। सबसे बड़ा खतरा यह है कि आरोप, याचिका, मीडिया रिपोर्ट और सुनवाई के दौरान की गई टिप्पणियों को अंतिम फैसले की तरह पेश किया जाने लगे। कानूनी रूप से ये सब अलग-अलग चीजें हैं। कोई याचिका या संगठन का सवाल अदालत का फैसला नहीं होता। जब तक अदालत खुद कोई आदेश नहीं देती, इन्हें आरोप ही माना जाना चाहिए।

०न्यायिक प्रक्रिया को दबाव का खतरा०

अगर न्यायिक प्रक्रिया का इस्तेमाल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर राजनीतिक या संस्थागत दबाव बनाने के लिए किया जाता है, तो अदालत की किसी टिप्पणी को उनके खिलाफ चल रहे अभियान के समर्थन के रूप में पेश किया जा सकता है। मीडिया ट्रायल, सोशल मीडिया अभियान और लगातार याचिकाएं इसी दिशा में काम करती दिखती हैं। मीडिया को अपनी भूमिका निभाने का हक है, लेकिन न्यायिक फैसला कानून, तथ्य और संविधान पर आधारित होना चाहिए, न कि किसी मुद्दे के इर्द-गिर्द बने सार्वजनिक दबाव पर।

०दबाव सफल तो क्या हो सकता है०

अगर दबाव कामयाब हो जाता है तो राजनीतिक दल मुख्य निर्वाचन आयुक्त के कार्यकाल के फैसलों, खासकर एसआईआर और मतदाता सूची से जुड़े निर्णयों की दोबारा समीक्षा की मांग कर सकते हैं। लेकिन किसी सीईसी का इस्तीफा अपने आप उनके सारे फैसलों को रद्द नहीं कर देता। न ही किसी चुनाव को सिर्फ राजनीतिक मांग पर रद्द किया जा सकता है। इसके लिए कानून में तय प्रक्रिया, ठोस आधार और अदालत का रास्ता जरूरी है। फिर भी बिहार और बंगाल के चुनावों को सवालों में घेरने की कोशिशें पहले से दिख रही हैं। अगर ये आगे बढ़ीं, तो सिर्फ चुनाव ही नहीं, कानून-व्यवस्था भी प्रभावित हो सकती है। कुछ दावों में इसे बांग्लादेश जैसे मॉडल से जोड़ने की कोशिश भी नजर आती है। संस्थाओं पर लगातार हमला लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमजोर कर सकता है।

०असली सवालों के जवाब जो समझने चाहिए०

-क्या एसआईआर संवैधानिक और कानूनी ढांचे के अंदर हुआ?

-क्या किसी मतदाता का नाम गलत तरीके से हटाया गया और क्या यह साबित हुआ?

-क्या किसी चुनाव को रद्द करने के कानूनी आधार मौजूद हैं?

-क्या अदालत की टिप्पणी को उसके असली मतलब से आगे बढ़ाकर राजनीतिक दबाव का औजार बनाया जा रहा है?

और सबसे जरूरी—

-क्या एक ही प्रक्रिया पर अलग-अलग राज्यों में अलग रवैया अपनाकर दोहरा मापदंड अपनाया जा रहा है?

०मतदाताओं को सतर्क रहने की जरूरत०

अगर ये भ्रम फैलाने वाले दावे सफल हो गए, तो नुकसान सिर्फ एक संस्था का नहीं होगा। चुनाव आयोग की साख घटेगी, न्यायपालिका पर अनावश्यक दबाव बढ़ेगा, चुनावी प्रक्रिया पर सवाल खड़े होंगे और कानून-व्यवस्था भी प्रभावित हो सकती है। लोकतंत्र में आलोचना जरूरी है, लेकिन संस्थाओं को राजनीतिक अभियान का अखाड़ा बनाना और चयनात्मक हमले लोकतंत्र को कमजोर करते हैं।

यह बहस सिर्फ एसआईआर या सीईसी तक सीमित नहीं है। यह इस बात की परीक्षा है कि हम संस्थाओं को उनके काम करने देंगे या उन्हें लगातार दबाव, प्रचार और दोहरे मापदंड के चक्र में धकेलते रहेंगे।

नागरिकों को तथ्यों और प्रक्रिया का फर्क समझना होगा। वरना संस्थागत कमजोरी का खामियाजा पूरे लोकतांत्रिक ढांचे को भुगतना पड़ेगा।

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०क्या नाम हटाने की प्रक्रिया दिल्ली से संचालित होती है? ०

-जवाब: बिल्कुल नहीं

भारत में 4,000 से अधिक इलेक्ट्रोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (EROs) हैं, जो अलग-अलग प्रशासनिक पृष्ठभूमि से आते हैं और देश के विभिन्न हिस्सों में इलेक्ट्रोरल रॉल प्रक्रिया को संभालते हैं। यदि यह आरोप है कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार या दिल्ली में बैठी कोई टीम सीधे तौर पर पात्र वोटरों के नाम काट रही थी, तो इस दावे के समर्थन में दस्तावेजी साक्ष्य क्या है?

जन प्रतिनिधित्व कानून (RPA) के तहत इलेक्ट्रोरल रोल में नाम जोड़ने और हटाने की वैधानिक प्रक्रिया ईआरओ के स्तर पर होती है और निर्धारित कानूनी एवं प्रक्रियात्मक सेफगार्ड के तहत निर्णय लिया जाता है। ईआरओ इस प्रक्रिया में एक सक्षम वैधानिक अथॉरिटी है।

ऐसे में केवल मुख्य निर्वाचन आयुक्त का नाम लेकर पूरे इलेक्ट्रोरल रॉल रिवीजन को एक व्यक्ति की व्यक्तिगत कार्रवाई के रूप में प्रस्तुत करना उस व्यापक संस्थागत निर्णय प्रक्रिया श्रृंखला और ईआरओ की वैधानिक भूमिका को नजरअंदाज करता है। यदि केंद्रीयकृत भूमिका का आरोप है, तो उसे स्थापित करने के लिए केवल आरोप नहीं, बल्कि दस्तावेजी या प्रक्रियात्मक साक्ष्य भी सामने रखना होगा, जो अभी तक विपक्ष या मीडिया द्वारा नहीं रखे गए हैं।

० ERONET की भूमिका ०

इलेक्ट्रोरल रॉल डेटाबेस पहले भी विकेंद्रीकृत था और आज भी वैसा ही डिसेंट्रलाइज्ड ही है।

सरल कारण यह है कि इलेक्ट्रोरल रोल हर राज्य के इलेक्ट्रोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (ERO) द्वारा, मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) की देखरेख में, तैयार और संधारित किया जाता है। इसलिए इसकी व्यवस्था शुरू से ही डिसेंट्रलाइज्ड रही है और आज भी वैसी ही है।

सच्चाई यह है कि ECINET के ERONET मॉड्यूल के तहत इलेक्ट्रोरल रोल डेटाबेस को कभी भी सेंट्रलाइज्ड नहीं किया गया है। हर राज्य का डेटाबेस पहले की तरह डिसेंट्रलाइज्ड ही है और ईआरओ के सभी वैधानिक तथा प्रक्रियात्मक अधिकार पहले की तरह बरकरार हैं।

तथ्य यह कि सिस्टम डिजिटल हुआ है, लेकिन इलेक्ट्रोरल रोल की वैधानिक अधिकारिता और डिसेंट्रलाइज्ड स्ट्रक्चर में कोई बदलाव नहीं हुआ है। डिजिटल व्यवस्था इसलिए बनाई गई ताकि काम आसान और पेपरलेस हो सके।

पहले कागज का फार्म भरना पड़ता था, जिसकी वजह से समस्या यह होती थी कि लोग स्थानांतरण पर पुरानी जगह से नाम नहीं कटवाते थे। नई जगह नाम जुड़वा लेते थे, लेकिन पुरानी जगह से हटवाने के लिए अलग से फिजिकल आवेदन देना पड़ता था—जो लंबी और कठिन प्रक्रिया थी।

अब डिजिटल सिस्टम ने इसे सरल बना दिया है। जैसे ही कोई मतदाता नई विधानसभा में खुद को पंजीकृत करता है और वह पहले कहीं और पंजीकृत था, तो पुरानी विधानसभा में उसका फॉर्म 7 स्वतः जारी हो जाता है। पुरानी जगह का ईआरओ संबंधित व्यक्ति को नोटिस भेजता है कि आप यहाँ से जा चुके हैं, क्या आपका नाम हटा दिया जाए? फिर विधिवत सत्यापन और सुनवाई के बाद अंतिम निराकरण करता है। यानी डिजिटल होने से काम आसान हुआ, पारदर्शिता बढ़ी, लेकिन अधिकार और जिम्मेदारी पूरी तरह ईआरओ के पास ही रही।

यह भी एक भ्रामक नैरेटिव के रूप में देखा जा सकता है, जिसमें इलेक्ट्रोरल रोल की विकेंद्रीकृत और वैधानिक प्रक्रिया को एक व्यक्ति या केंद्रीय टीम की प्रत्यक्ष कार्रवाई के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। इस तरह की प्रस्तुति से जनता में भारत के निर्वाचन आयोग के प्रति अविश्वास और आक्रोश पैदा होने की संभावना रहती है।

आलोचकों के अनुसार, ऐसे दावे निर्वाचन आयोग की संवैधानिक और संस्थागत भूमिका को कमजोर करने की धारणा को बढ़ावा दे सकते हैं। हालांकि, किसी भी दावे के पीछे मंशा या उद्देश्य निर्धारित करने के लिए केवल नैरेटिव के आधार पर निष्कर्ष निकालने के बजाय उसके स्रोत, दस्तावेजी साक्ष्य और प्रक्रियात्मक तथ्यों की जांच आवश्यक है।

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०पूर्व आयुक्तों के साथ खड़े सवाल…०

विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के विरोध के बीच विपक्ष की ओर से पूर्व चुनाव आयुक्तों के बयानों को प्रमुखता से सामने लाया जा रहा है। इसके पीछे यह संदेश देने की कोशिश दिखाई देती है कि यदि चुनाव आयोग के पूर्व शीर्ष अधिकारी भी आयोग की वर्तमान कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहे हैं, तो इससे जनता के बीच आयोग को लेकर अविश्वास पैदा किया जा सकता है। सवाल यह है कि क्या किसी संवैधानिक संस्था में काम कर चुके व्यक्तियों द्वारा की जा रही आलोचना को केवल उनके पूर्व पद के आधार पर स्वतः निष्पक्ष और अंतिम सत्य मान लिया जाना चाहिए?

किसी भी सिस्टम की विश्वसनीयता को चुनौती देने के लिए उसी सिस्टम के पूर्व अधिकारियों की आवाज को सामने लाना एक प्रभावी नैरेटिव बिल्डिंग रणनीति हो सकती है। लेकिन केवल पूर्व पदाधिकारी होने से किसी व्यक्ति का वर्तमान आकलन स्वतः अंतिम या निर्विवाद नहीं हो जाता। उनके तर्कों, उनके कार्यकाल के रिकॉर्ड और वर्तमान परिस्थितियों के बीच भी समान रूप से तुलना होनी चाहिए।

यदि मतदाता सूची में इतनी गंभीर विसंगतियां वर्षों से मौजूद थीं, तो विशेष गहन पुनरीक्षण जैसी व्यापक प्रक्रिया पहले क्यों शुरू नहीं की गई? 2002 के बाद सीधे 2025 में ही इतने बड़े स्तर पर यह अभियान क्यों शुरू हुआ? चुनाव सुधार और मतदाता सूची के व्यापक शुद्धिकरण की वह इच्छाशक्ति पहले क्यों नहीं दिखाई गई?

यदि उस समय विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण जैसी नियमित प्रक्रियाओं के बावजूद मतदाता सूची में गंभीर विसंगतियां बनी रहीं, तो आज जब बड़े पैमाने पर मतदाता सूची की शुद्धि का प्रयास किया जा रहा है, तब इस प्रक्रिया पर सवाल उठाने के साथ-साथ पुराने रिकॉर्ड और उस समय की कार्यप्रणाली की समीक्षा भी क्यों न हो?

यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि आखिर यह कैसे स्थापित किया जा सकता है कि अतीत में मतदाता सूची के शुद्धिकरण की सीमित गति या कथित कमियों के पीछे कोई राजनीतिक या प्रशासनिक दबाव नहीं था? यदि आज वर्तमान निर्वाचन आयोग के निर्णयों के पीछे राजनीतिक प्रभाव की आशंका व्यक्त की जा रही है, तो क्या अतीत की कार्यप्रणाली पर भी इसी कसौटी से सवाल नहीं होना चाहिए? केवल वर्तमान प्रक्रिया पर संदेह करना और अतीत की कमियों पर समान प्रश्न न उठाना अपने आप में एक अधूरा विश्लेषण हो सकता है।

यदि पूर्व चुनाव आयुक्त किसी प्रक्रिया पर सवाल उठाते हैं, तो उनके तर्कों का परीक्षण उनके कार्यकाल के रिकॉर्ड, उपलब्ध आंकड़ों और वर्तमान परिस्थितियों के संदर्भ में होना चाहिए। किसी पूर्व पदाधिकारी की बात को केवल उनके पूर्व पद के कारण अंतिम सत्य मानना उतना ही अनुचित होगा, जितना किसी वर्तमान पदाधिकारी के हर निर्णय को केवल उसके पद के कारण सही मान लेना।

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