द्विजेंद्र नाथ झा, राम शरण शर्मा और अक्षय रमणलाल देसाई के बाद एक और डिस्टोरियन हुआ जिसका नाम बिशंभर नाथ पाण्डेय था। वह कांग्रेस का मेयर, कांग्रेस का सांसद, इंदिरा गांधी का बनाया हुआ उड़ीसा का राज्यपाल, और पद्मश्री पाया हुआ दरबारी इतिहासकार था।

काम क्या किया? एक किताब लिखी -इतिहास के साथ यह अन्याय, नाम ऐसा जैसे खुद न्याय का मसीहा हो। अंदर क्या है? दो गप्प।

पहली गप्प- औरंगजेब और काशी विश्वनाथ।  औरंगजेब ने काशी विश्वनाथ हिंदू-द्वेष में नहीं तोड़ा। क्यों तोड़ा? क्योंकि काशी के पंडों ने कच्छ की रानी को मंदिर में बंद करके उसकी अस्मिता लूट ली थी, तो औरंगजेब को न्याय करना पड़ा।

सोर्स क्या है? पट्टाभि सीतारमैया की किताब, फीदर ऑफ स्टोन्स। सीतारमैया का सोर्स क्या है? लखनऊ का एक मौलवी। मौलवी के पास एक पांडुलिपि थी जो किसी ने देखी नहीं। मौलवी ने कहानी सुनाई और मर गया। पांडुलिपि गायब। मतलब सोर्स - मरा हुआ मौलवी, गायब पांडुलिपि, सुनी-सुनाई कहानी। सीतारमैया ने तो सिर्फ "रानी गायब हुई" लिखा था, पाण्डेय ने उसमें "अस्मिता लूटी गई" जोड़ दिया। ताकि पंडा और बड़ा बलात्कारी लगे, औरंगजेब और बड़ा न्यायप्रिय। और असली सोर्स पर पाण्डेय चुप्पी लगा जाता है जहां  मुगलों का सरकारी दस्तावेज मासिर-ए-आलमगीरी  जिक्र होता है जिसमें साफ लिखा है 1669 में हिंदुओं के मंदिर तोड़ो का हुक्म दिया, उसे पाण्डेय ने कचरे में फेंक दिया।

दूसरी गप्प - टीपू सुल्तान महान सहिष्णु।  पाण्डेय को कोडागु में टीपू का नरसंहार याद नहीं, मेलकोट में आयंगर ब्राह्मणों का कत्ल याद नहीं, 800 मंदिर तोड़ने के फरमान याद नहीं।

बी एन पाण्डेय नाम नहीं बल्कि वह प्रवृत्ति है जिसे स्टॉक होम सिंड्रोम कहा जाता है।  औरंगजेब के लिए मरे हुए मौलवी की गवाही ले आना, टीपू के लिए महल के कोने वाले मंदिर की रसीद ले आना। ऐसे ही लोगों ने हमारे बच्चों को पढ़ाया कि हमें लूटने वाला महान था, और लूटने की वजह हम खुद थे। 

कांग्रेस ने ऐसे ही इतिहास लिखने वालों को सांसद, राज्यपाल बनाया, पद्मश्री दिया।

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