आज़ादी के बाद से भारत सबसे कठिन दौर से गुज़र रहा है। कारण, उसकी लड़ाई दुनिया के सबसे ताक़तवर और सबसे  निरंकुश सत्ता से है।

अमेरिकी डीप स्टेट। मुख्य कारण, ट्रेड  डील  में अमेरिका के दुग्ध और कृषि उत्पादों को विस्तीर्ण भारतीय बाज़ार में प्रवेश न देने पर भारत का अडिग रुख। प्रधान मंत्री ने कहा था, मैं जानता हूँ, इससे मेरा व्यक्तिगत नुक़सान हो सकता है किन्तु सरकार इस मुद्दे पर किसी भी सूरत में नहीं  झुकेगी। 

पूरे देश में  विपक्ष द्वारा अशांति, हिंसा,असंतोष और अविश्वास का माहौल। युवाओं द्वारा असंयत भाषा का व्यवहार तथा अराजकता व अनिश्चितता का माहौल उत्पन्न करने का लगातार प्रयास। याद होगा, सेना में अस्थाई भरती का मुद्दा उठाकर बिहार में कितना फ़साद और कितनी आगजनी को प्रेरित किया गया था। व्यर्थ।

फिर डोनाल्ड ट्रंप के शब्द दोहराते हुए  'अर्थव्यवस्था मृत' है। आगे 'अर्थव्यवस्था कोलैप्स होनेवाली है' का धुआंधार प्रचार। 

हर बिन्दु पर षड्यन्त्र और सरकार की अपराधवृत्ति की गंध सूँघना। सभी संस्थाओं में अपूर्व कदाचार दिखाई पड़ना। विपक्ष इसके लिये जायज-नाजायज कुछ भी करने की मुद्रा में। और महीनों से इसी में मुब्तला है। 

बहुत मासूमियत से वह हिमाचल, कर्नाटक, केरलम्  और तमिलनाडु को अपने साधारणीकरण में भुला देता है। 

एस आई आर में त्रुटियाँ हो सकती हैं। हमेशा होती रही हैं। किंतु बहुत सोचने पर भी मुझे समझ में नहीं आया कि स्थानीय स्तर पर स्थानीय निर्वाचन अधिकारियों के मातहत कार्य करनेवाले सारे कर्मचारियों को जानबूझकर ऐसी त्रुटि करने के लिये कैसे अनकूलित किया जा सकता है जिससे किसी दल विशेष का लाभ सुनिश्चित हो। फिर, क्या सभी दलों के भावी  मतदाता इतने स्पष्ट रूप से गोचर होते हैं कि जिलाधिकारी (जो पदेन मुख्य निर्वाचन अधिकारी भी होता है) से लेकर आधारभूत कार्य करनेवाले सभी स्थानीय कर्मचारियों को एक खास दिशा में त्रुटि करने के लिये अनुकूलित किया जा सके? अनुकूलन करनेवाले व्यक्ति को भी कैसे निश्चित होगा कि अमुक मतदाता किस दल को मत देनेवाला है? 

जेन जी तो इसी मक़सद से सीधे अमेरिका से लैंड कराया गया है। 

देश में कदाचार के तमाम मुद्दे हो सकते हैं किन्तु सारा ध्यान उनके निराकरण के बजाय, स्वेच्छाचारी  ढंग से उसकी सीधी ज़िम्मेदारी अन्तिम रूप से तयकर इस्तीफ़े की माँग के लिये इतना ज़ोर डालना, भांति भांति के हथकंडों से अशांति फैलाना, युवाओं को, लड़के-लड़कियों को निरंकुश, प्रगल्भ और बेशर्म भाषा और बेशर्म व्यवहार के लिये उकसाना कहाँ तक उचित है? असली मक़सद सरकार को झुकाने, उसे कमज़ोर और बदनीयत साबित करने का नज़र आता है।

लगता है  नेपाल और बाँगला देश में सफलता प्राप्त करने से आश्वस्त अमेरिकी डीप स्टेट अब भारत के पीछे पड़ गया है। देखना यह है कि भारत जैसा प्राचीन, विशाल और वैश्विक राजनीति में अपना विशिष्ट स्थान रखनेवाला शांतिप्रय देश अमेरिका के इस छद्म युद्ध का सामना करने में सफल रहता है या नेपाल और बाँगला देश की गति को प्राप्त  होता है! 

क्या पता, इस छद्म युद्ध का विस्तार कहां तक है। मुझे याद है, एक बार पहलगाम आतंकी घटना के बाद पाकिस्तान के विदेश मंत्री के मुँह से (शायद असावधानी में) निकल गया था-- हमें पश्चिमी देशों के लिये 'ये डर्टी काम' करने पड़ते हैं। क्या निहितार्थ था इसका? 
 

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