ए.आर. देसाई की किताब 'सोशल बैकग्राउंड ऑफ इंडियन नेशनलिज्म' पढ़िए तो एक अजीब बदबू आती है। ऊपर-ऊपर मार्क्सवाद का इत्र छिड़का है, अंदर वही पुरानी गुलामी की सड़ांध है।

थीसिस क्या है देसाई की? अंग्रेजों ने हमें इंसान बनाया। हम जड़ थे, बर्बर थे, आत्मनिर्भर गांव के नाम पर गोबर में लोट रहे थे, अंग्रेज आए तो उन्होंने हमें रेल दी, डाक दी, कानून दिया, प्रेस दी। मतलब कोड़े मारने वाले ने ही स्कूल भी खोला, इसलिए कोड़े मारने वाले का धन्यवाद करो।

यही है स्टॉकहोम सिंड्रोम और इस सिंड्रोम को चलाने के लिए दूसरा काम करना पड़ता है - अपने ही समाज को गाली देना। देसाई वही करता है।

उसके लिए भारत में कोई सभ्यता थी ही नहीं। न नालंदा था, न चोल का समुद्री बेड़ा था, न विजयनगर का सोना था, न शून्य का आविष्कार था। था क्या? सिर्फ ब्राह्मणों का शोषण। पूरा हिंदू समाज उसके लिए सिर्फ एक लूट की कहानी है - ब्राह्मण लुटेरा, बाकी सब लुटे हुए। जाति धर्म नहीं, जमीन हड़पने का धंधा है। शास्त्र इसलिए लिखे गए ताकि लूट को भगवान का आदेश बताया जा सके। गांव रामराज्य नहीं, उत्पीड़न के अड्डे थे।

जिस सभ्यता ने दुनिया को दर्शन दिया, वो देसाई की नजर में सिर्फ शोषण की मशीन है।

उपनिवेश की सबसे बड़ी जीत बंदूक नहीं होती। सबसे बड़ी जीत तब होती है जब गुलाम का पढ़ा-लिखा बेटा अपने बाप को गाली देकर मालिक की बोली बोलने लगे। मालिक जैसा कोट पहने, मालिक जैसा क्रिकेट खेले, मालिक की अंग्रेजी में मालिक की दया पर किताब लिखे।

भारत में वही हुआ।

अंग्रेजों ने एक पूरी जमात पैदा की - क्लर्क, वकील, प्रोफेसर। इस जमात को लगा कि अंग्रेजों से पहले भारत में इतिहास ही नहीं था। सब अंधेरा था, और फिर 1757 में रोशनी आई।देसाई इसी जमात का प्रवक्ता है।

उसके लिए राष्ट्रवाद का मतलब भगत सिंह की फांसी नहीं, तिलक का मंडले जेल नहीं, खुदीराम का हंसते हुए फंदा चूमना नहीं। उसके लिए राष्ट्रवाद का मतलब है - नए-नए स्वार्थी वर्ग। व्यापारी को लाइसेंस चाहिए, वकील को जज की कुर्सी चाहिए, इसलिए वे अंग्रेजों से लड़ रहे हैं।

मतलब जिसने देश के लिए जान दी, उसके मुंह पर देसाई जैसा इतिहासकार कहता है - तुम तो अपने फायदे के लिए लड़ रहे थे।

और अंग्रेज? वो तो महान हो गया। उसने तुम्हें स्वार्थी से राष्ट्रवादी बना दिया।

ये इतिहास नहीं, जहर की पोटली है। ऊपर से मीठी लगती है - प्रगतिशील, वैज्ञानिक, वस्तुनिष्ठ। अंदर खोलो तो एक तरफ मैकाले की आत्मा बैठी है जो कहती है - तुम असभ्य थे, हमने तुम्हें सभ्य बनाया, और दूसरी तरफ अपने ही समाज से नफरत का जहर है जो कहती है - तुम्हारे पूर्वज शोषक थे, तुम्हारे ग्रंथ पाखंड थे।

एक तीर से दो शिकार - अंग्रेज भगवान, और अपना समाज अपराधी।

इसलिए आज भी जब कोई बच्चा देसाई पढ़कर निकलता है, तो उसे लगता है 1857 लुटेरों का विद्रोह था, अंग्रेजी राज वरदान था, और आजादी अंग्रेजों की दी हुई ट्रेन में बैठकर आई।

उपनिवेश चला गया, पर उसके दलालों ने इतिहास की कुर्सी नहीं छोड़ी। अफसोस यह है कि आज भी यूपीएससी के पाठ्यक्रम में देसाई पढ़ाया जाता है।

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