कट्टरपन और हिंसा के दौर की भयावहता

9 जुलाई 2026|

डीआईजी ए.एस. अटवाल की हत्या पंजाब में उग्रवाद के दौर की एक दर्दनाक घटना थी, जिसे इतिहास में याद किया जाना चाहिए। वह स्वर्ण मंदिर में अरदास करने के बाद बाहर निकल रहे थे, तभी उन्हें गोली मार दी गई। वे निहत्थे थे। उसी घटना में एक 11 वर्षीय बच्चे की भी मौत हुई थी। दोनों के शव काफी समय तक मंदिर परिसर की सीढ़ियों पर पड़े रहे, क्योंकि भय के माहौल में कोई उन्हें हटाने का साहस नहीं कर पा रहा था।

जब पंजाब के उस दौर की चर्चा होती है तो अक्सर कुछ पीड़ितों के लिए संवेदना व्यक्त की जाती है, लेकिन एक तरफा जो कुछ लोगों के एजेंडे को सूट करती है।

पर, प्रश्न यह कि क्या डीआईजी अटवाल को याद किया जाना उचित नहीं है? क्या उस 11 वर्षीय बच्चे की जिंदगी की कोई कीमत नहीं थी? क्या उस बच्चे की पीड़ा को याद नहीं किया जाना चाहिए जो अपने घर वापस नहीं लौट सका?

यदि उस दौर के हर पुलिस अधिकारी को केवल अत्याचारी या हिंसक व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तो फिर डीआईजी अटवाल जैसे लोगों को उस कहानी में कहां रखा जाएगा?

एक निहत्थे पुलिस अधिकारी, जो धार्मिक स्थल से माथा टेककर बाहर निकल रहा था, और उसके साथ मारे गए एक मासूम बच्चे के प्रति भी वही मानवीय संवेदना होनी चाहिए जो किसी भी निर्दोष पीड़ित के लिए होती है।

यह भी उस घटना का हिस्सा है कि हत्यारों ने केवल हत्या तक ही बात सीमित नहीं रखी, बल्कि उनके समर्थक शव के पास जश्न मनाने और नारे लगाने लगे थे, यह उस समय के कट्टरपंथी माहौल और हिंसा की भयावहता को दिखाता है।

उस समय स्वर्ण मंदिर परिसर के अंदर का माहौल इतना तनावपूर्ण था कि पुलिस अधिकारी भी बिना अनुमति के शवों को हटाने से डर रहे थे। पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री दरबारा सिंह चाहते थे कि हत्यारे को पकड़ने के लिए पुलिस कार्रवाई करे, लेकिन केंद्र सरकार धार्मिक भावनाओं को ध्यान में रखते हुए मंदिर परिसर में हथियारों के साथ प्रवेश करने को लेकर सावधान थी।

इसके अलावा तमाम ऐसी घटनाएं, जो उस दौर के समाचार पत्रों और इतिहास में दर्ज हैं, उनसे समझ सकते हैं…..

इन घटनाओं में मारे गए लोगों की संख्या सिर्फ समाचार पत्रों पर आधारित है, वास्तविकता इससे कहीं अधिक भयानक थी…..

– 09 सितम्बर – 05 अक्तूबर 1983, धिलवां (कपूरथला) – बस का अपहरण कर हिन्दू यात्रियों को अलग करके 6 लोगों की हत्या की गई। घटना के बाद पंजाब में राष्ट्रपति शासन लागू किया गया।

– 18 नवम्बर 1983, कपूरथला – बस रोककर 4 हिन्दू यात्रियों की हत्या।

– 23 फरवरी 1984 – बसों और ट्रेनों से हिन्दू यात्रियों को उतारकर 11 लोगों की हत्या की गई तथा कई अन्य घायल हुए।

– 21 मई 1984, मोगा के निकट – बस रोककर हिन्दू यात्रियों पर गोलीबारी की गई, जिसमें 4 लोगों की मृत्यु हुई और कई घायल हुए।

– 31 अगस्त 1981, लाला जगत नारायण की हत्या – आतंकवाद के विरुद्ध लिखने वाले पंजाब केसरी समूह के संस्थापक की हत्या कर दी गई। इसे उग्रवाद के शुरुआती बड़े लक्षित हत्याकांडों में माना जाता है।

– 25 अप्रैल 1983, डीआईजी ए. एस. अटवाल की हत्या – अमृतसर में स्वर्ण मंदिर में माथा टेकने के बाद उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई।

– 28 मार्च 1986, देसरी ग्राउंड, लुधियाना – हमला कर 13 हिन्दुओं की हत्या।

– 29 मार्च 1986, मल्लियां (जालंधर) – 20 हिन्दू मजदूरों की हत्या।

– 25 जुलाई 1986, मुक्तसर बस हत्याकांड – बस रोककर 15 यात्रियों (14 हिन्दू और 1 सिक्ख) की हत्या।

– 30 नवम्बर 1986, होशियारपुर/खुड्डा बस हत्याकांड – 24 हिन्दू यात्रियों की हत्या।

– 6, 7 जुलाई 1987, लालड़ू (लालरू) और फतेहाबाद बस हत्याकांड – हरियाणा रोडवेज की बसों को रोककर हिन्दू यात्रियों को अलग किया गया और लगभग 70 से अधिक लोगों की हत्या कर दी गई।

– 1989, मोगा शाखा हमला – राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा पर हमला हुआ, जिसमें स्वयंसेवकों की मृत्यु हुई।

– 10, 11 नवम्बर 1989, थापर इंजीनियरिंग कॉलेज, पटियाला – छात्रावास में घुसकर छात्रों पर अंधाधुंध गोलीबारी की गई, जिसमें कई छात्रों की मृत्यु हुई और अनेक घायल हुए।

– 15 जून 1991, लुधियाना के पास रेल हत्याकांड – दो ट्रेनों को रोककर यात्रियों की हत्या की गई; लगभग 80–110 लोगों के मारे जाने के अलग-अलग आँकड़े विभिन्न स्रोतों में मिलते हैं।

– 17 अक्तूबर 1991, रुद्रपुर बम विस्फोट – रामलीला देखने आए लोगों के बीच बम विस्फोट किया गया, जिसमें लगभग 40 लोगों की मृत्यु हुई और लगभग 200 घायल हुए। पीड़ित मुख्यतः हिन्दू थे।

 

ये उस दौर की वास्तविकता है जो इतिहास में दर्ज है और ऐसे ही लाखों लोग जो निहत्थे और बिना किसी रिकॉर्ड और पहचान के मारे गए, उनकी तो गिनती ही नहीं है। उस दौर की वास्तविकता यह है कि केवल एक पक्ष ने नहीं खोया, ऐसे में केवल एक पक्ष को पीड़ित के रूप में दिखाकर ऐजेंडा चलाना ठीक नहीं है।

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