भगवान जगन्नाथ और जनजाति समाज

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  • Jul 17, 2026
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आर्य – अनार्य का प्रचार पूर्णतः आधारहीन है। भारत का जनजातीय समाज शेष भारतीय समाज से सदियों से, युगों-युगों से जुड़ा हुआ है। इसका एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रमाण श्री जगन्नाथ मंदिर है। चार धामों में से एक प्रमुख धाम पुरुषोत्तम धाम के आराध्य भगवान श्री जगन्नाथ, उनके स्वरूप, पूजा-पद्धति और सेवा-परंपरा में जनजातीय समाज की सहभागिता सिद्ध करती है कि भगवान श्री जगन्नाथ, श्री बलभद्र, देवी सुभद्रा और श्री सुदर्शन का जनजातीय परंपराओंअत्यंत गहरा संबंध है।

आज सम्पूर्ण हिन्दू समाज जिनकी आराधना करता है, वे देवस्वरूप अपनी संस्कृति से भी अभिन्न रूप से जुड़े हुए हैं।

स्कन्द पुराण के अनुसार, श्री जगन्नाथ जी के प्रमुख सेवक ‘दैतापति’ शबरराज विश्वावसु के वंशज माने जाते हैं। कहा जाता है कि नीलगिरि की कंदराओं में विश्वावसु भगवान विष्णु की नीलमाधव रूप में उपासना करते थे। यही विश्वावसु पूर्वजन्म में ‘जरा शबर’ थे, जिन्होंने श्रीकृष्ण को बाण मारा था। जरा शबर उससे भी पूर्व जन्म में बालि-पुत्र अंगद थे, जिन्हें श्री राम से अगले जन्म में पितृ हत्या का प्रतिशोध लेने का वर प्राप्त हुआ था। इस प्रकार जनजातीय समाज का विष्णु-उपासना से संबंध तीन युगों से जुड़ा हुआ दिखाई देता है।

जनजातीय समाज के पूजा-स्थलों पर प्रायः एक स्तंभ स्थापित होता है। भगवान श्री जगन्नाथ, श्री बलभद्र, देवी सुभद्रा और श्री सुदर्शन के स्वरूप भी स्तंभाकार हैं। विशेषतः श्री जगन्नाथ और श्री बलभद्र की आकृतियाँ हाथों सहित स्तंभ जैसी प्रतीत होती हैं। इन चारों विग्रहों का निर्माण ‘दारु’ अर्थात् लकड़ी से किया जाता है। जनजातीय समाज में भी लकड़ी के देवस्वरूपों की पूजा की परंपरा प्रचलित है। श्री जगन्नाथ आदि चारों विग्रह ‘व्यक्ताव्यक्त’ स्वरूप के प्रतीक माने जाते हैं, जिसका उल्लेख विभिन्न ऋषियों और दार्शनिकों ने ईश्वर के स्वरूप के संदर्भ में किया है।

‘नवकलेवर’ अर्थात नया शरीर – यह श्री जगन्नाथ परंपरा की एक विशिष्ट व्यवस्था है। लगभग प्रत्येक बारह वर्ष में भगवान श्री जगन्नाथ, श्री बलभद्र, देवी सुभद्रा और श्री सुदर्शन की प्रतिमाओं का परिवर्तन किया जाता है। नई दारु (लकड़ी) से नई प्रतिमाएँ बनाई जाती हैं तथा पुरानी प्रतिमाओं को विधिपूर्वक भूमिगत किया जाता है। इस सम्पूर्ण प्रक्रिया – जैसे दारु की खोज, उसे पुरी तक लाना, नई प्रतिमाओं का निर्माण, उनमें ब्रह्म-स्थापन तथा पुरानी प्रतिमाओं का विसर्जन एवं शुद्धि-संस्कार का दायित्व शबर वंशज दैतापति निभाते हैं। वे इन विग्रहों की सेवा अपने परिवार के सदस्य के समान भाव से करते हैं।

श्री मंदिर की परंपरा के अनुसार स्नान पूर्णिमा (ज्येष्ठ पूर्णिमा) से आषाढ़ पूर्णिमा तक पूजा का विशेष अधिकार दैतापति समाज को प्राप्त होता है। ज्येष्ठ पूर्णिमा से भगवान की सेवा का दायित्व संभालते हैं। भगवान को विशेष वेश में सजाकर स्नान मंडप तक लाना और पुनः मंदिर तक ले जाना उनका कार्य होता है। वर्ष में एक बार 108 कलशों के जल से भगवान का महाअभिषेक किया जाता है। स्नान हेतु जल-कलश लाने तथा स्नान कराने का कार्य भी दैतापति ही करते हैं।

स्नान-यात्रा के पश्चात भगवान लगभग पंद्रह दिनों तक ‘अनसर’ काल में रहते हैं, जिसे सामान्यतः भगवान के अस्वस्थ होने का समय माना जाता है। इस अवधि में औषधि देना, वस्त्र बदलना, सेवा-सुश्रुषा करना आदि सभी कार्य दैतापति समाज द्वारा किए जाते हैं।

भगवान श्री जगन्नाथ की रथयात्रा विश्व प्रसिद्ध उत्सव है। इस अवसर पर विग्रहों को सुसज्जित कर रथ पर स्थापित करना, उनके साथ रहना, गुंडिचा मंदिर तक ले जाना, वहाँ सेवा करना तथा पुनः वापसी पर मंदिर तक पहुँचाना – ये सभी कार्य दैतापति करते हैं। वापसी के बाद द्वादशी के दिन भगवान के ‘सुनावेश’ अर्थात स्वर्णाभूषण धारण कराने की प्रक्रिया भी उनकी देखरेख में संपन्न होती है। स्नान पूर्णिमा से आषाढ़ पूर्णिमा तक प्राप्त चढ़ावे का वितरण भी दैतापति समाज के मध्य होता है।

जनजातीय समाज में वर्ष में एक बार सामूहिक शिकार की परंपरा रही है, जिसे ‘वेंट’ कहा जाता है। भगवान श्री जगन्नाथ की परंपरा में भी ‘वेंट यात्रा’ का उल्लेख मिलता है। चैत्र मास में ‘कांडा हेंगुड़ा’ उत्सव के दौरान धनुष-बाण धारण कर यह परंपरा निभाई जाती है।

सभी तथ्यों से स्पष्ट होता है कि विशेष रूप से शबर समाज और भगवान श्री जगन्नाथ परंपरा का संबंध गहरा और प्राचीन है। जनजातीय समाज पूजा, उपासना, संस्कृति और आध्यात्मिक परंपराओं की दृष्टि से शेष हिन्दू समाज से कभी पृथक नहीं रहा, बल्कि वह भारतीय सनातन परंपरा का अभिन्न अंग ही है।

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