‘मदरसों में वंदे मातरम् गाने से आसमान नहीं टूट पड़ेगा’ – कलकत्ता उच्च न्यायालय

कलकत्ता। 6 अगस्त 2026|

कलकत्ता उच्च न्यायालय ने मदरसों में वंदे मातरम् के छह छंद गाने को अनिवार्य किए जाने के सरकारी आदेश के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान कहा, “मदरसों में वंदे मातरम् के छह छंद गाने से आसमान नहीं टूट पड़ेगा।”

उच्च न्यायालय के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश तपब्रत चक्रवर्ती और न्यायमूर्ति पार्थ सारथी सेन की पीठ ने याचिका पर सुनवाई के दौरान टिप्पणी की। मुख्य न्यायाधीश ने दूसरे धार्मिक समुदायों द्वारा चलाए जा रहे शिक्षण संस्थानों की प्रार्थना का उदाहरण देते हुए कहा, “देश के हजारों ईसाई स्कूलों में पढ़ने वाले सभी छात्रों से गॉड की प्रार्थना करने को कहा जाता है। तो क्या किसी खास धर्म से जुड़े छात्र यह सवाल उठाते हैं कि आप मुझसे ईसाई मत से जुड़ी प्रार्थना क्यों करा रहे हैं? ऐसे में अगर मदरसों में वंदे मातरम् गीत गया तो आसमान नहीं टूट पड़ेगा। आज अगर मुझसे कोई ऐसी बात दोहराने को कहे जो मेरे धर्म में नहीं है तो क्या होगा? क्या मैं अपने धर्म से बाहर हो जाऊंगा?”

याचिकाकर्ता की ओर से उपस्थित वकील विकास रंजन भट्टाचार्य ने तर्क दिया कि वंदे मातरम् राष्ट्र गीत जरूर है, लेकिन इसे मदरसों में पढ़ने वाले बच्चों पर जबरन लागू नहीं किया जा सकता। जब संविधान अपनाया गया था तो बहुत विचार-विमर्श के बाद यह तय किया गया था कि केवल दो छंद ही गाए जाएंगे। अगर कोई इसे अपनी मर्जी से गाता है तो कोई दिक्कत नहीं है, परन्तु इसे अनिवार्य कर नहीं किया जा सकता। इससे सांप्रादिक सौहार्द बिगड़ सकता है।

राज्य की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल धीरज कुमार त्रिवेदी ने भट्टाचार्य से सवाल किया कि क्या उन लोगों के खिलाफ कोई कार्रवाई की गई है, जिन्होंने मदरसों में वंदे मातरम् गाने के आदेश वाले सर्कुलर का उल्लंघन किया है? एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि अभी तक ऐसा कोई कदम नहीं उठाया है कि अगर कोई वंदे मातरम् नहीं गाता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

एडिशनल सॉलिसिटर जनरल धीरज कुमार त्रिवेदी ने कहा, “दुर्भाग्य से ऐसी जनहित याचिकाएं आ रही हैं, जो असल में पब्लिसिटी इंटरेस्ट लिटिगेशन (प्रचार पाने के मकसद से दायर याचिका) को बढ़ावा दे रही हैं।”

उन्होंने अपना पक्ष और रिपोर्ट दाखिल करने के लिए अतिरिक्त समय मांगा। उच्च न्यायालय ने याचिका पर तुरंत अंतरिम रोक लगाने से इनकार करते हुए राज्य सरकार को रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया और मामले की सुनवाई स्थगित कर दी।

 

 

 


 

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