बस्तर की शोभा ने रेशों से बुन रहीं आत्मनिर्भरता की नई इबारत

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  • Nov 05, 2026
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परचनपाल की शिल्पकार ने प्राकृतिक रेशों को बनाया आजीविका का आधार

40 से 50 तरह के हस्तशिल्प उत्पादों की बढ़ी मांग

 एक हजार से अधिक ग्रामीण महिलाओं को सिखाया हुनर

बस्तर | 5 नवंबर 2026

दीपावली का उजाला केवल दीपों से नहीं, बल्कि उन हाथों की मेहनत से भी फैलता है, जो साधारण चीजों को असाधारण कलाकृतियों में बदल देते हैं। बस्तर के परचनपाल गांव की शोभा बघेल ऐसी ही एक शिल्पकार हैं, जिन्होंने प्रकृति से मिले सीसल के रेशों को अपनी कला, आजीविका और महिला आत्मनिर्भरता का आधार बना लिया है। उनके हाथों से तैयार आकर्षक बैग, सजावटी वस्तुएं, दीवार सज्जा और टेबल मैट अब त्योहारों में घरों की शोभा बढ़ा रहे हैं। पर्यावरण के अनुकूल इन हस्तनिर्मित उत्पादों की बढ़ती मांग ने न केवल उनकी कला को नई पहचान दी है, बल्कि बस्तर की स्थानीय हस्तकला को भी बाजार में मजबूत जगह दिलाई है।

सीसल के रेशों में बसी है बस्तर की कला और प्रकृति की सुंदरता

सीसल एक प्राकृतिक और मजबूत रेशा है। इसकी खासियत है कि इससे टिकाऊ और उपयोगी वस्तुएं तैयार की जा सकती हैं। शोभा बघेल ने इसी रेशे को अपनी रचनात्मकता का माध्यम बनाया। बारीकी से रेशों को गूंथकर वे ऐसी कलाकृतियां तैयार करती हैं, जिनमें उपयोगिता के साथ सौंदर्य भी झलकता है। उनके बनाए बैग, दीवार सज्जा, टेबल मैट और उपहार सामग्री आज लोगों की पसंद बन रहे हैं। करीब 40 से 50 प्रकार के उत्पाद तैयार करने वाली शोभा की कला पारंपरिक शिल्प और आधुनिक जरूरतों का सुंदर मेल है।

2004 में सीखा हुनर, मेहनत से बनाई अलग पहचान

शोभा बघेल की सफलता की कहानी वर्ष 2004 से शुरू होती है। इसी वर्ष उन्होंने हस्तशिल्प विकास बोर्ड से सीसल के रेशों से उत्पाद बनाने का विशेष प्रशिक्षण प्राप्त किया। प्रशिक्षण के बाद उन्होंने इस हुनर को केवल सीखने तक सीमित नहीं रखा, बल्कि लगातार अभ्यास और मेहनत से इसे आजीविका का साधन बना लिया। धीरे-धीरे उनके उत्पादों की गुणवत्ता और कलात्मकता को पहचान मिलने लगी। आज चित्रकोट, शबरी एम्पोरियम, राज्योत्सव और सरस मेलों जैसे प्रमुख मंचों पर उनके उत्पादों की मांग है। स्थानीय लोग भी उनके घर पहुंचकर सीधे खरीदारी करते हैं। इस काम से उन्हें प्रतिमाह 15 हजार से 20 हजार रुपये तक की आय हो रही है।

एक हजार से अधिक महिलाओं के हाथों को दिया रोजगार का हुनर

शोभा बघेल की उपलब्धि केवल अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत करने तक सीमित नहीं है। उन्होंने अपने हुनर को ग्रामीण महिलाओं के साथ साझा कर आत्मनिर्भरता की नई राह खोली है। अब तक एक हजार से अधिक महिलाओं को सीसल शिल्प का प्रशिक्षण देकर उन्हें स्वरोजगार से जोड़ने में योगदान दिया है। उनका प्रयास है कि गांव की महिलाएं अपने कौशल के दम पर आर्थिक रूप से मजबूत बनें और परिवार की खुशहाली में अपनी भागीदारी बढ़ाएं। इस तरह एक महिला का सीखा हुआ हुनर अनेक परिवारों की आजीविका का आधार बन रहा है।

स्थानीय शिल्प अपनाएं, कारीगरों के घर भी पहुंचे खुशहाली का उजाला

त्योहारी मौसम में अपने उत्पादों की बढ़ती मांग से उत्साहित शोभा बघेल लोगों से स्थानीय हस्तशिल्प को प्राथमिकता देने की अपील करती हैं। उनका मानना है कि पर्व-त्योहारों पर स्थानीय कारीगरों के हाथों से बने उत्पाद खरीदना केवल एक वस्तु खरीदना नहीं, बल्कि उनकी मेहनत, कला और परिवार की आजीविका को सम्मान देना है। इससे पारंपरिक शिल्प को संरक्षण मिलता है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलती है।

वोकल फॉर लोकल को जमीन पर साकार करती बस्तर की शिल्पकार

शोभा बघेल का सीसल शिल्प प्रधानमंत्री के वोकल फॉर लोकल के आह्वान को धरातल पर साकार करने वाली प्रेरक मिसाल है। प्राकृतिक संसाधनों से उपयोगी और आकर्षक उत्पाद तैयार करना, स्थानीय कला को बाजार तक पहुंचाना और ग्रामीण महिलाओं को हुनरमंद बनाकर स्वरोजगार से जोड़ना उनके प्रयासों की विशेषता है। इस दीपावली उनके बनाए उत्पादों से घरों में सजावट का उजाला तो फैलेगा ही, उन मेहनतकश हाथों तक भी खुशहाली पहुंचेगी, जिनकी कला से ये उत्पाद आकार लेते हैं। परचनपाल की शोभा बघेल ने साबित किया है कि स्थानीय संसाधन, पारंपरिक हुनर और दृढ़ संकल्प मिल जाएं तो आत्मनिर्भरता की रोशनी पूरे समाज तक पहुंच सकती है।

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