प्रल्हाद जोशी बोले- कृषि-वोल्टेइक तकनीक से किसान एक ही जमीन पर उगा सकेगा अन्न और पैदा कर सकेगा स्वच्छ ऊर्जा

अन्नदाता से ऊर्जादाता बन रहा किसान, एक ही खेत से फसल और बिजली की दोहरी कमाई

 

नई दिल्ली, 9 सितंबर 2026। देश का किसान अब केवल अन्नदाता नहीं, बल्कि ऊर्जादाता की भूमिका भी निभा रहा है। कृषि-वोल्टेइक तकनीक के जरिए किसान एक ही भूमि से खाद्यान्न उत्पादन के साथ-साथ सौर ऊर्जा पैदा कर अतिरिक्त और नियमित आय हासिल कर सकता है। केंद्रीय नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री प्रल्हाद जोशी ने बुधवार को नई दिल्ली में 7वें एग्रीवोल्टिक्स विश्व सम्मेलन-2026 के पूर्व समारोह को संबोधित करते हुए यह बात कही।

श्री जोशी ने कहा कि कृषि-वोल्टेइक तकनीक किसानों को खेती और ऊर्जा उत्पादन के बीच चुनाव करने की मजबूरी से मुक्त कर सकती है। खेत के नीचे फसल और उसके ऊपर सौर पैनल लगाकर एक ही भूमि से दोहरा लाभ हासिल किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि यह मॉडल विशेष रूप से छोटे और सीमांत किसानों के लिए आय की स्थिरता का नया आधार बन सकता है।

फसल, बिजली और डीजल बचत से तीन गुना लाभ

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि एक किसान एक एकड़ भूमि से तीन स्रोतों से आय अर्जित कर सकता है। पहली आय फसल की बिक्री से, दूसरी डिस्कॉम को सौर बिजली बेचकर और तीसरी डीजल की बचत से होगी। उनके मुताबिक छोटे किसानों के लिए सौर ऊर्जा से मिलने वाली आय केवल अतिरिक्त कमाई नहीं, बल्कि आर्थिक सुरक्षा का माध्यम है।

उन्होंने कहा कि किसानों की आय अक्सर मानसून और बाजार भाव पर निर्भर रहती है। ऐसे में सौर ऊर्जा से होने वाली नियमित आय अच्छे और चुनौतीपूर्ण दोनों समय में आर्थिक सहारा दे सकती है।

पीएम-कुसुम के अगले चरण में कृषि-वोल्टेइक को मिलेगा विशेष स्थान

श्री जोशी ने बताया कि पीएम-कुसुम योजना के अगले चरण में कृषि-वोल्टेइक ऊर्जा के लिए एक समर्पित घटक शामिल किया जाएगा। इसके तहत छोटे और सीमांत किसानों के साथ किसान उत्पादक संगठनों, सहकारी समितियों और पंचायतों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस व्यवस्था में भूमि का स्वामित्व किसान के पास ही रहेगा।

उन्होंने कहा कि भारत जैसे देश में कृषि-वोल्टेइक का महत्व और बढ़ जाता है, क्योंकि देश में दुनिया की करीब 18 प्रतिशत आबादी रहती है, जबकि भूमि का हिस्सा केवल 2.4 प्रतिशत है। भारत के 85 प्रतिशत से अधिक किसान लघु एवं सीमांत श्रेणी में आते हैं और दो हेक्टेयर से कम भूमि पर खेती करते हैं।

एक खेत, दो उत्पादन—खाद्यान्न भी और स्वच्छ ऊर्जा भी

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि कृषि-वोल्टेइक तकनीक का सबसे बड़ा लाभ यही है कि किसान को फसल और सौर ऊर्जा संयंत्र में से किसी एक को चुनने की आवश्यकता नहीं होगी। खेत में फसल उत्पादन जारी रखते हुए उसी भूमि के ऊपर सौर ऊर्जा का उत्पादन किया जा सकता है।

यह मॉडल खेती की उत्पादकता, किसानों की आय और स्वच्छ ऊर्जा—तीनों लक्ष्यों को एक साथ आगे बढ़ाने की क्षमता रखता है।

भारत ने जोड़ी 55.29 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता

श्री जोशी ने भारत की नवीकरणीय ऊर्जा उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए कहा कि देश ने पिछले वर्ष 55.29 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता जोड़ी। उन्होंने कहा कि यह क्षमता नॉर्वे, स्विट्जरलैंड, ऑस्ट्रिया और बेल्जियम जैसे कई विकसित देशों की कुल स्थापित बिजली क्षमता से भी अधिक है।

पीएम-कुसुम योजना की प्रगति बताते हुए उन्होंने कहा कि करीब 29 लाख सौर पंप संचालित किए जा चुके हैं। पिछले वर्ष विकेंद्रीकृत सौर ऊर्जा में 16.3 गीगावाट का योगदान रहा, जिसमें पीएम-कुसुम से 7.6 गीगावाट और मुख्य रूप से पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना के तहत रूफटॉप सौर ऊर्जा से 8.7 गीगावाट शामिल है। इससे करीब 56 लाख लाभार्थियों को फायदा मिल रहा है।

30 फसलों पर 17 सौर प्रणालियों का परीक्षण

कृषि-वोल्टेइक तकनीक को व्यापक स्तर पर लागू करने के लिए शोध और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप समाधान विकसित करने पर भी केंद्रीय मंत्री ने जोर दिया। उन्होंने पुणे स्थित बीएआईएफ के ग्रामीण नवाचार केंद्र का उदाहरण देते हुए बताया कि वहां शोधकर्ता 30 फसलों पर 17 अलग-अलग सौर प्रणालियों का परीक्षण कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि अलग-अलग फसलों, जलवायु और क्षेत्रों के लिए पैनल की ऊंचाई, उनके बीच की दूरी, ट्रैकिंग प्रणाली और व्यावसायिक मॉडल का सही संयोजन तलाशना जरूरी है।

ट्रैक्टर और हार्वेस्टर के अनुकूल हों सौर ढांचे

श्री जोशी ने उद्योग, शोध संस्थानों और नवप्रवर्तकों से ऐसी कृषि-वोल्टेइक संरचनाएं विकसित करने का आह्वान किया, जिनके बीच से ट्रैक्टर और हार्वेस्टर आसानी से गुजर सकें और जो स्थानीय मौसम की परिस्थितियों का सामना कर सकें।

उन्होंने आईसीएआर, कृषि विश्वविद्यालयों और कृषि विज्ञान केंद्रों से फसल एवं क्षेत्रवार डेटा तैयार करने पर जोर दिया। साथ ही पारंपरिक सौर परियोजनाओं की तुलना में लागत के अंतर को कम करने के लिए संरचना, सामग्री और माउंटिंग सिस्टम में नवाचार की आवश्यकता बताई।

उन्होंने कहा कि भारत ग्राम स्तर पर कौशल विकास की दिशा में भी आगे बढ़ रहा है और अब तक करीब 70 हजार सूर्य मित्रों को प्रशिक्षित किया जा चुका है।

वैश्विक दक्षिण के लिए भारत का मॉडल बन सकता है मिसाल

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि कृषि-वोल्टेइक क्षेत्र में भारत का अनुभव वैश्विक दक्षिण के देशों के लिए विशेष रूप से उपयोगी हो सकता है। इन देशों में छोटे खेत, पर्याप्त धूप और विकासशील बिजली ग्रिड जैसी परिस्थितियां मौजूद हैं।

उन्होंने कहा कि भारत का विशाल कृषि और सौर ऊर्जा क्षेत्र किफायती एवं व्यावहारिक समाधान विकसित करने का अवसर देता है, जिन्हें वैश्विक दक्षिण के अन्य देशों में भी अपनाया जा सकता है।

21 से 23 अक्टूबर तक भारत मंडपम में जुटेगा विश्व

नई दिल्ली में 21 से 23 अक्टूबर 2026 तक भारत मंडपम में 7वें एग्रीवोल्टिक्स विश्व सम्मेलन का आयोजन होगा। तीन दिवसीय इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में दुनिया भर के किसान, नीति निर्माता, शोधकर्ता, उद्योगपति और अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधि कृषि एवं सौर ऊर्जा के एकीकरण पर विचार-विमर्श करेंगे।

समारोह के दौरान केंद्रीय मंत्री ने सम्मेलन का टीजर जारी करने के साथ आधिकारिक लोगो का अनावरण किया। ‘फार्म टू फोर्क इनोवेशन को बढ़ावा देना’ विषय पर एग्रीवोल्टिक्स पिच हब की भी घोषणा की गई। नेशनल सोलर एनर्जी फेडरेशन ऑफ इंडिया (एनएसईएफआई) को इसका ज्ञान भागीदार बनाया गया है।

3एफ—फूड, फ्यूल और फाइबर—के ढांचे पर आधारित यह पिच हब एग्रीवोल्टिक्स के भविष्य को आकार देने वाले नवोन्मेषी समाधानों को मंच देगा।

खेती की जमीन बनेगी आय और ऊर्जा का दोहरा आधार

एग्रीवोल्टिक्स का उभरता मॉडल भारत की कृषि अर्थव्यवस्था में एक नए अध्याय की शुरुआत कर सकता है। इसका लक्ष्य सिर्फ सौर ऊर्जा बढ़ाना नहीं, बल्कि खेती की जमीन को सुरक्षित रखते हुए किसान की आय के नए स्रोत तैयार करना है। यदि तकनीक, लागत और स्थानीय कृषि परिस्थितियों के बीच सही संतुलन कायम किया जाता है, तो खेत भविष्य में केवल अन्न का उत्पादन केंद्र नहीं, बल्कि स्वच्छ ऊर्जा और स्थिर आय का भी आधार बन सकते हैं।

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