फिल्म आस्वादन : “अंगूठो” – समाज की जड़ों को झकझोरती एक सशक्त प्रस्तुति

नई दिल्ली।

भारतीय सिनेमा केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज के आईने के रूप में भी कार्य करता है। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए निर्देशक कुणाल मेहता द्वारा निर्देशित और स्टेज OTT, हरियाणा द्वारा निर्मित फिल्म अंगूठो ने गहरी सामाजिक संवेदना और सशक्त विषयवस्तु के माध्यम से दर्शकों को सोचने पर विवश किया है।

1 अगस्त 2026 को भारतीय चित्र साधना और दिल्ली फिल्म आयाम के संयुक्त तत्वाधान में फिल्म का विशेष प्रदर्शन आयोजित किया गया, जिसके पश्चात फिल्म के विभिन्न पहलुओं – कथानक, निर्देशन, अभिनय, और सामाजिक संदर्भ – पर विस्तृत चर्चा हुई। यह आयोजन न केवल फिल्म प्रेमियों के लिए, बल्कि समाज और सिनेमा के संबंध को समझने के इच्छुक लोगों के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण रहा।

फिल्म “अंगूठो” की कहानी एक बेहद साधारण, किन्तु गहन प्रतीकात्मक घटना के इर्द-गिर्द घूमती है। एक संपन्न व्यक्ति, जिसे ‘सेठ’ कहा गया है, अनजाने में एक दलित के घर का पानी पी लेता है – वह भी उस समय जब वह अचेत अवस्था में होता है। यह घटना केवल एक संयोग नहीं, बल्कि समाज में व्याप्त जातिगत भेदभाव पर एक करारा प्रहार बनकर उभरती है।

जब चेतना लौटती है और सत्य सामने आता है, तब यह घटना समाज की जड़ मानसिकताओं को चुनौती देती है। फिल्म रेखांकित करती है कि इंसान की मूलभूत आवश्यकताएं – जैसे पानी – किसी भी सामाजिक विभाजन से परे हैं। यह संदेश दर्शकों को यह सोचने पर विवश करता है कि क्या वास्तव में हमारे बनाए हुए सामाजिक ढांचे मानवीय मूल्यों से ऊपर हैं?

कुणाल मेहता का निर्देशन सादगी में गहराई का उत्कृष्ट उदाहरण है। उन्होंने बिना किसी अतिशयोक्ति के, बेहद सहज और प्रभावी तरीके से कहानी को प्रस्तुत किया है। फिल्म की सिनेमैटोग्राफी और बैकग्राउंड स्कोर भी कथा के भाव को और प्रखर बनाते हैं। हर फ्रेम में एक संवेदनशीलता और यथार्थ का स्पर्श महसूस होता है, जो दर्शकों को कहानी से जोड़े रखता है।

फिल्म प्रदर्शन के पश्चात आयोजित चर्चा सत्र आयोजन की विशेषता रहा। इसमें उपस्थित फिल्म विशेषज्ञों, विद्यार्थियों और दर्शकों ने फिल्म के विभिन्न आयामों पर अपने विचार साझा किए। जाति व्यवस्था, सामाजिक असमानता, और सिनेमा की भूमिका जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर गहन संवाद हुआ।

सिनेमा केवल कहानी कहने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज में परिवर्तन लाने की एक सशक्त शक्ति भी है। ‘अंगूठो’ जैसी फिल्में दर्शकों को केवल भावनात्मक रूप से नहीं, बल्कि वैचारिक रूप से भी प्रभावित करती हैं।

अंगूठो एक ऐसी फिल्म है जो अपनी सादगी में ही गहन संदेश समेटे हुए है। यह दर्शकों को अपनी सोच पर पुनर्विचार करने और समाज में व्याप्त भेदभाव को समझने की प्रेरणा देती है।

भारतीय चित्र साधना और दिल्ली फिल्म आयाम द्वारा इस प्रकार के आयोजनों का उद्देश्य केवल फिल्मों का प्रदर्शन नहीं, बल्कि एक स्वस्थ और जागरूक समाज के निर्माण में योगदान देना है। ‘अंगूठो’ इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो यह दर्शाता है कि सिनेमा के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन की शुरुआत संभव है।

 

 

 


 

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