‘बाल गृह’ नहीं, अपनत्व का घर: बच्चों की पहचान बदलने की पहल

 

औपचारिक नामों से आगे बढ़कर स्थानीय भाषा, प्रकृति और संस्कृति से जुड़े नाम देने की तैयारी; 21 सितंबर तक जिलों से मांगी गई रिपोर्ट

 

रायपुर, 3 सितंबर 2026|
किसी बच्चे के लिए घर केवल चार दीवारों का नाम नहीं होता। वह सुरक्षा, अपनत्व और अपनी पहचान का एहसास है। ऐसे में यदि किसी संरक्षण गृह का नाम ही बच्चे के मन में अकेलेपन, अभाव या हीनभावना का भाव पैदा करे, तो उस पहचान को बदलना भी बाल संरक्षण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाता है।

इसी सोच के साथ छत्तीसगढ़ राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने प्रदेश में संचालित बाल एवं बालिका संरक्षण गृह तथा बाल संप्रेक्षण गृहों को नई, सकारात्मक और बालहितैषी पहचान देने की पहल की है। आयोग की अध्यक्ष डॉ. वर्णिका शर्मा ने महिला एवं बाल विकास विभाग के प्रमुख सचिव को पत्र भेजकर इन संस्थाओं के वर्तमान औपचारिक एवं संस्थागत नामों के स्थान पर ऐसे नाम रखने का आग्रह किया है, जिनमें अपनत्व, सम्मान, सुरक्षा और सकारात्मक भविष्य का भाव दिखाई दे।

नाम बदलेगा तो नजरिया भी बदलेगा

यह पहल केवल नाम बदलने की प्रशासनिक कवायद नहीं है। इसके पीछे बच्चों के मनोविज्ञान और सामाजिक पहचान को लेकर एक महत्वपूर्ण विचार है। जिस नाम से किसी बच्चे को बार-बार संबोधित किया जाता है, वह उसकी स्वयं की पहचान और उस संस्था के प्रति उसके भाव को प्रभावित कर सकता है।

‘बाल गृह’, ‘संप्रेक्षण गृह’ जैसे प्रशासनिक शब्द सरकारी व्यवस्था में अपनी उपयोगिता रखते हैं, लेकिन बच्चों की भावनात्मक दुनिया में उनकी जगह कुछ अधिक आत्मीय और सकारात्मक नाम ले सकते हैं। आयोग का मानना है कि संस्था की पहचान ऐसी हो, जो बच्चों को यह एहसास कराए कि वे किसी व्यवस्था में महज एक संख्या नहीं, बल्कि सम्मान और संभावनाओं से भरे जीवन के हिस्सेदार हैं।

‘पलाश’ और ‘परिषा’ जैसे नामों से मिली प्रेरणा

आयोग ने जम्मू में बाल संरक्षण संस्थाओं के लिए प्रचलित ‘पलाश’ और ‘परिषा’ जैसे सकारात्मक नामों का उल्लेख करते हुए छत्तीसगढ़ में भी इसी प्रकार गरिमापूर्ण नाम अपनाने की अनुशंसा की है।

छत्तीसगढ़ में यह पहल अपने आप में विशेष अर्थ रखती है, क्योंकि राज्य की पहचान उसकी समृद्ध लोक-संस्कृति, प्रकृति, जनजातीय परंपराओं और स्थानीय भाषायी विविधता से गहराई से जुड़ी है।

 ऐसे में किसी बाल संरक्षण संस्था का नाम स्थानीय परिवेश से लिया जाए तो वह बच्चों और समाज—दोनों के लिए अधिक आत्मीय हो सकता है।

नामकरण में होगी स्थानीय मिट्टी की खुशबू

आयोग ने सुझाव दिया है कि जिलों में नामकरण करते समय स्थानीय भाषा, संस्कृति, प्रकृति, लोक परंपरा और क्षेत्रीय पहचान से जुड़े सकारात्मक एवं प्रेरणादायक नामों को प्राथमिकता दी जाए।

यानी बस्तर की प्रकृति, सरगुजा की लोक-स्मृतियां, मैदानी छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक परंपराएं और अलग-अलग अंचलों की स्थानीय पहचान—इन सबमें ऐसे अनेक शब्द और प्रतीक मौजूद हैं, जो किसी संस्था को सरकारी पहचान से आगे बढ़ाकर आत्मीय पहचान दे सकते हैं।

यह नाम किसी फूल, नदी, वृक्ष, लोकपरंपरा, संस्कृति या ऐसे भाव का प्रतीक हो सकता है, जो बच्चे के भीतर उम्मीद और आगे बढ़ने की प्रेरणा पैदा करे।

बच्चों से भी पूछा जाएगा उनका पसंदीदा नाम

इस पहल का सबसे संवेदनशील पक्ष यह है कि नामकरण केवल ऊपर से तय करने के बजाय संबंधित संस्थाओं में रहने वाले बच्चों, देखरेखकर्ताओं और अन्य हितधारकों से सुझाव लेने की बात कही गई है।

इससे बच्चे स्वयं अपनी संस्था की नई पहचान तय करने की प्रक्रिया का हिस्सा बन सकेंगे। उनके लिए यह अनुभव महज एक प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि अपनी आवाज और पसंद को महत्व दिए जाने का भी संदेश होगा।

एक ऐसे बच्चे के लिए, जिसने जीवन में कई बार परिस्थितियों के कारण निर्णयों से दूरी महसूस की हो, अपनी संस्था का नाम चुनने में उसकी राय शामिल होना अपने आप में आत्मविश्वास बढ़ाने वाला कदम हो सकता है।

21 सितंबर तक मांगी गई रिपोर्ट

आयोग ने महिला एवं बाल विकास विभाग से आवश्यक दिशा-निर्देश जारी कर जिलों से प्रस्तावित नामों की सूची प्राप्त करने तथा इस संबंध में की गई कार्रवाई से आयोग को 21 सितंबर 2026 तक लिखित रूप से अवगत कराने का आग्रह किया है।

अब नजर इस बात पर होगी कि जिलों से आने वाले नाम कितने स्थानीय, कितने रचनात्मक और कितने बालमन के करीब होते हैं।

संस्था नहीं, भविष्य संवारने का केंद्र

बाल संरक्षण संस्थाओं को केवल प्रशासनिक व्यवस्था के रूप में देखने के बजाय उन्हें बच्चों के सुरक्षित, सम्मानजनक और सकारात्मक विकास के केंद्र के रूप में स्थापित करना इस पहल का मूल उद्देश्य दिखाई देता है।

नाम बदलना अपने आप में किसी संस्था की पूरी व्यवस्था नहीं बदल सकता, लेकिन कभी-कभी बदलाव की शुरुआत शब्दों से ही होती है। एक कठोर प्रशासनिक पहचान की जगह यदि कोई ऐसा नाम सामने आए, जिसमें घर जैसा अपनत्व हो, तो वह बच्चे के मन में एक नई अनुभूति पैदा कर सकता है।

आखिरकार, बाल संरक्षण का अर्थ केवल बच्चे को सुरक्षित स्थान उपलब्ध कराना नहीं है। इसका वास्तविक उद्देश्य उसे यह विश्वास दिलाना भी है कि उसका अतीत चाहे जैसा रहा हो, उसका भविष्य सम्मान, सुरक्षा और संभावनाओं से भरा हो सकता है।

छत्तीसगढ़ में बाल संरक्षण गृहों के नाम बदलने की यह पहल इसी बड़े विचार की ओर एक छोटा लेकिन संवेदनशील कदम है—संस्था की पहचान से आगे बढ़कर बच्चे को अपनत्व की पहचान देने का।

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