अब समझ में आया कि माननीय सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जवल भुईयां को SIR से असली परेशानी क्या हो सकती है? आजकल सोशल मीडिया और न्यूज चैनलों पर जस्टिस उज्जवल भुईयां का नाम लगातार चर्चा में है।  SIR को लेकर उनकी टिप्पणियों पर देश में बहस चल रही है। सवाल यह है कि आखिर SIR जैसी प्रक्रिया, जिसका उद्देश्य मतदाता सूची को शुद्ध और वास्तविक मतदाताओं तक सीमित रखना है, उसे लेकर इन्हें इतनी आपत्ति क्यों है?

यहाँ एक तथ्य जानना भी जरूरी है

जस्टिस उज्जवल भुईयां के पिता सुचेंद्र नाथ भुईयां कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI) से जुड़े रहे थे। स्वतंत्रता के बाद वे कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रभावित हुए। CPI पर प्रतिबंध के दौर में वे भूमिगत रहे और 1951 में गिरफ्तार भी हुए। वे असम छात्र सम्मेलन के जनरल सेक्रेटरी भी रहे। जहाँ भी देखते हैं भारत विरोधी शक्तियों के साथ कम्युनिस्ट मार्क्स पुत्रों का कॉकटेल उपलब्ध है।

बहरहाल, बाद में उन्होंने कानून के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई और असम के एडवोकेट जनरल भी रहे है।ये सभी बातें उनके पिता के सार्वजनिक जीवन से जुड़े सर्वज्ञात तथ्य हैं।अब सवाल यह है कि क्या किसी व्यक्ति के पारिवारिक या वैचारिक इतिहास का उसकी वर्तमान न्यायिक सोच पर कोई प्रभाव पड़ सकता है? अथवा पड़ा है क्या?यह एक सवाल जायज हो सकता है, लेकिन इसका उत्तर बिना प्रमाण के नहीं दिया जा सकता।फिर भी SIR पर जस्टिस भुईयां की टिप्पणियों ने गंभीर बहस जरूर खड़ी कर दी है।देश में बड़ी संख्या में ऐसे लोगों के नाम मतदाता सूची में होने की आशंका जताई जाती रही है, जिनकी नागरिकता पर प्रश्न हैं। दूसरी ओर, SIR का उद्देश्य मतदाता सूची की जाँच और शुद्धिकरण बताया जा रहा है।

ऐसे में देश की जनता का सवाल बिल्कुल स्वाभाविक है—क्या मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करना गलत है? जहाँ पर दो करोड़ से अधिक वोटर जांच में मृत पाये गये? क्या वास्तविक भारतीय नागरिकों का अधिकार सुरक्षित रखना गलत है? जहाँ 6 करोड़ से अधिक multiple voters मिले..क्या अवैध घुसपैठ और नागरिकता के प्रश्न पर कठोरता से विचार नहीं होना चाहिए? जहाँ पर बांग्लादेश बॉर्डर के ही कुछ जिलों की 4करोड़ से अधिक आबादी कम हो गई हो और भारत के संसद में इतनी ही बांग्लादेशी घुसपैठ पर 20 वर्षों से चर्चा हो? 

और यदि SIR में किसी अपात्र 13 करोड़ व्यक्तियों का नाम हटाया जाता है, तो केवल उसके अधिकार की चिंता होगी या उन करोड़ों वास्तविक नागरिकों के अधिकार की भी, जो अपने मताधिकार की "शुचिता और मौलिक अधिकारों से वंचित हो रहे हैं? 

यहाँ सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी पर आरोप लगाने से पहले प्रमाण आवश्यक हैं।हम यह नहीं कह सकते कि जस्टिस उज्जवल भुईयां अपनी टिप्पणियाँ अपने पिता की CPI पृष्ठभूमि के कारण कर रहे हैं। इसका कोई प्रत्यक्ष प्रमाण सामने नहीं है।लेकिन उनकी टिप्पणियों पर संवैधानिक और सार्वजनिक बहस अवश्य होनी चाहिए।क्योंकि लोकतंत्र में न्यायपालिका का सम्मान जरूरी है, लेकिन न्यायिक टिप्पणियों पर सवाल पूछना भी नागरिकों का अधिकार है।

देश की जनता यह जानना चाहती है— SIR का विरोध किस आधार पर है?
नागरिकता और मताधिकार के संबंध को संविधान किस तरह देखता है? और क्या देश की मतदाता सूची को पूरी तरह शुद्ध और विश्वसनीय बनाना आवश्यक नहीं है? इसको अविश्वसनीय कौन बनाना चाहते हैं और क्यों?  इन सवालों का उत्तर किसी व्यक्ति की विचारधारा देखकर नहीं, बल्कि संविधान, कानून और प्रमाण के आधार पर होना चाहिए। अब भारत के नागरिकों को तथ्यों पढ़ने, देखने और जांचने का स्वभाव बना लेना चाहिए अन्यथा वो हर समय किसी धोखे में ही रहेगा।अब, क्योंकि देश में न्याय व्यवस्था, धरना प्रदर्शन, आन्दोलनों और धरनाजीवी नेताओं के सार्वजनिक बयानों पर विश्वास तभी मजबूत होगा, जब निर्णयों के पीछे केवल भारत का संविधान दिखाई दे— भारत का हित दिखाई दे— किसी पश्चिमी विचारधारा की छाया और संजाल नहीं। अन्यथा सब बौद्धिक नक्सली ही मानने होंगे। जो भारत विरोधी शक्तियों के हाथ की कठपुतली बनकर काम कर रहे हैं।
 

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