एक देश की सीमा से दूसरे देश की सीमा तक इंसान की आवाजाही सामान्य बात हो सकती है, किंतु जब किसी युवती को दुर्गम रास्तों से चुपचाप सीमा पार कराकर दूसरे शहर में ले जाया जाए, उसके लिए पहले से विवाह तय हो और उसके पीछे बिचौलियों का संगठित नेटवर्क काम कर रहा हो, तब मामला मानव तस्करी की गंभीरता का हो जाता है। वस्तुतः ग्वालियर जीआरपी की हालिया कार्रवाई ने इसी भयावह पक्ष की ओर देश का ध्यान खींचा है।

बांग्लादेश के कुतुपालोंग शरणार्थी शिविर से म्यांमार मूल की चार युवतियों को अवैध तरीके से भारत लाया गया था। जिसमें कि  ग्वालियर में स्वर्ण जयंती एक्सप्रेस के जनरल कोच से 25 वर्षीय मुबीन को हिरासत में लिया गया और पूछताछ के बाद उसकी निशानदेही पर उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ से 35 वर्षीय मोहम्मद हसन को पकड़ा गया है। गहराई से पता करने पर सामने आया है कि चारों युवतियों को आगे जम्मू-कश्मीर ले जाकर मैरिज कराने की योजना थी। वस्तुतः आज यह कार्रवाई इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसने एक ऐसे रास्ते की ओर संकेत किया है जिसमें बांग्लादेश का शरणार्थी शिविर, सीमा पार कराने वाले बिचौलिए, भारत के भीतर ठिकाने, रेल मार्ग और आगे विवाह की व्यवस्थाजैसी अलग-अलग कड़ियां एक-दूसरे से जुड़ती दिखाई दे रही हैं। 

गृह मंत्रालय के अनुसार नेपाल, बांग्लादेश और म्यांमार से महिलाओं और लड़कियों को बेहतर जीवन, रोजगार और सुविधाओं के वादे पर भारत लाने के मामले सामने आए हैं। सरकारी रिकॉर्ड में यह भी दर्ज है कि भारत से महिलाएं और लड़कियां आगे मध्य-पूर्व तथा दक्षिण-पूर्व एशिया तक पहुंचाई जाती रही हैं। यानी समस्या की दिशा एकतरफा नहीं है। भारत की बेटियों को भी विदेशों में रोजगार, विवाह, मनोरंजन या दूसरे अवसरों के नाम पर फंसाकर शोषण के मामलों का सामना करना पड़ रहा है। मई 2026 में सीबीआई ने भारतीय नागरिकों को आकर्षक नौकरियों का झांसा देकर दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों, विशेषकर म्यांमार और कंबोडिया, स्थित साइबर अपराध परिसरों तक पहुंचाने वाले एक संगठित नेटवर्क की जांच शुरू की। तब भी पीड़ितों को वहां जबरन साइबर धोखाधड़ी में लगाए जाने की बात सामने आई थी। दरअसल, विदेशों में फंसी भारतीय महिलाओं की समस्या का आकार भी इस तथ्य से समझा जा सकता है कि विदेश मंत्रालय के आंकड़ों में पिछले वर्षों के दौरान खाड़ी देशों से भारतीय महिलाओं को सुरक्षित भारत वापस लाने के अनेक मामले दर्ज हैं। 2021 से 2025 के बीच अकेले कुवैत, ओमान, यूएई, कतर और सऊदी अरब जैसे देशों से बड़ी संख्या में महिलाओं की सहायता, शिकायतों के समाधान या सुरक्षित वापसी के मामले दर्ज हुए। 

तस्करी का सबसे खतरनाक चेहरा

वस्तुतः यहाँ कहना यही है कि मानव तस्करी का अर्थ सिर्फ किसी महिला को वेश्यावृत्ति में धकेलना नहीं है। जबरन श्रम, यौन शोषण, फर्जी विवाह, घरेलू बंधुआ श्रम, बच्चों की तस्करी और झूठे रोजगार के नाम पर विदेश भेजना इसके अलग-अलग रूप हैं। संयुक्त राष्ट्र मादक पदार्थ एवं अपराध कार्यालय के दक्षिण एशिया संबंधी आंकड़ों में महिलाओं और लड़कियों की बड़ी हिस्सेदारी मानव तस्करी के पहचाने गए पीड़ितों में सामने आती है। विवाह के नाम पर तस्करी विशेष रूप से गंभीर है क्योंकि इसमें अपराध को सामाजिक स्वीकार्यता की आड़ मिल जाती है। अमेरिकी विदेश विभाग की भारत संबंधी मानव तस्करी रिपोर्ट में भी भारत के भीतर और भारत से बाहर महिलाओं के शोषण के लिए फर्जी विवाहों के इस्तेमाल का उल्लेख किया गया है। उसी रिपोर्ट में भारत में नेपाली और बांग्लादेशी महिलाओं तथा लड़कियों को झूठे रोजगार के वादों से लाकर शोषण करने के मामलों का भी उल्लेख है। इस पूरे प्रकरण में मध्य प्रदेश जीआरपी की त्वरित कार्रवाई सराहनीय है। सूचना मिली, ट्रेन की पहचान हुई, संदिग्ध को ग्वालियर में उतारा गया, पूछताछ हुई, दूसरे व्यक्ति का पता चला और फिर अलीगढ़ में दबिश देकर युवतियों को बरामद किया गया। अपराध के मामले में सूचना से कार्रवाई और कार्रवाई से बरामदगी तक पहुंचने की यह गति महत्वपूर्ण है। चार युवतियों की जिंदगी संभवतः एक ऐसे रास्ते की ओर बढ़ रही थी जहां उनकी इच्छा, स्वतंत्रता और भविष्य किसी दूसरे व्यक्ति के आर्थिक हित के सामने गौण हो सकते थे। समय पर हुई कार्रवाई ने उस संभावना को रोक दिया।

वैसे  भारत सरकार ने सभी जिलों में एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट्स को मजबूत करने की दिशा में कदम उठाए हैं। गृह मंत्रालय के अनुसार मानव तस्करी रोकने के लिए राज्यों को वित्तीय सहायता दी गई है और भारत ने बांग्लादेश, यूएई, कंबोडिया तथा म्यांमार के साथ मानव तस्करी रोकने के लिए सहयोग तंत्र भी स्थापित किए हैं। भारत-बांग्लादेश सीमा पर सीमा सुरक्षा बल के एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट्स, निगरानी, संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान, तकनीकी उपकरण और संयुक्त गश्त जैसे उपाय भी किए जा रहे हैं।फिर भी ग्वालियर की घटना बताती है कि अपराधी रास्ते बदलते हैं, माध्यम बदलते हैं और अपनी गतिविधियों को वैध सामाजिक प्रक्रियाओं के भीतर छिपाने की कोशिश करते हैं, इसलिए सिर्फ सीमा पर निगरानी पर्याप्त नहीं है। रेलवे स्टेशन, बस अड्डे, किराये के मकान, संदिग्ध विवाह नेटवर्क, फर्जी दस्तावेज, ऑनलाइन संपर्क और धन के लेन-देन तक जांच पहुंचानी होगी।

लक्ष्य अपराध शून्य भारत का होना चाहिए

यह उम्मीद करना कठिन लग सकता है कि भारत कभी पूरी तरह अपराध-मुक्त हो जाएगा। फिर भी विकसित भारत की कल्पना में ऐसी व्यवस्था अवश्य होनी चाहिए जहां अपराधी को यह विश्वास रहे कि कानून उससे तेज गति से आगे बढ़ता है। ग्वालियर की कार्रवाई यही संदेश देती है। यदि ऐसी सक्रियता हर संदिग्ध तस्करी के मामले में दिखाई दे, यदि सूचना पर तत्काल कार्रवाई हो, यदि राज्यों के बीच पुलिस समन्वय मजबूत हो और सीमा पार नेटवर्क की कड़ियां भी एक साथ तोड़ी जाएं, तो मानव तस्करी के खिलाफ लड़ाई कहीं अधिक प्रभावी हो सकती है।

ऐसे में कहना यही है कि भारत की बेटी हो या किसी दूसरे देश की बेटी, उसकी कीमत किसी बिचौलिए की जेब से तय नहीं हो सकती। अपराधी ये जान जाएं, उसका जीवन किसी अवैध नेटवर्क का माल नहीं है।ग्वालियर की चार युवतियों की बरामदगी में  जिस तेजी से कार्रवाई हुई, यदि वही तत्परता हर ऐसे मामले में दिखाई देने लगे तो अपराधियों के लिए भारत में रास्ते लगातार संकरे होते जाएंगे। उम्मीद यही होनी चाहिए कि वह दिन आए जब मानव तस्करी जैसी संगठित अमानवीयता के लिए भारत में कोई सुरक्षित रास्ता शेष न रहे।

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