रेपो दर 5.25 से बढ़कर 5.50 प्रतिशत, फरवरी 2023 के बाद पहली बार हुई वृद्धि

भारतीय रिजर्व बैंक ने 7 अक्टूबर 2026 को घोषित अपनी मौद्रिक नीति (मॉनेटरी पॉलिसी) के माध्यम से रेपो दर में 25 आधार बिंदुओं की वृद्धि करते हुए इसे 5.25 प्रतिशत से बढ़ाकर 5.50 प्रतिशत कर दिया है। भारत में फरवरी 2023 के बाद पहली बार रेपो दर में वृद्धि की घोषणा की गई है। अब संभवतः समस्त बैंक अपने ऋणों पर ब्याज दरों में बढ़ोतरी की घोषणा करेंगे। दरअसल, भारत ही नहीं, बल्कि विश्व के अन्य देशों में भी मुद्रास्फीति की दर में वृद्धि देखी जा रही है और मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के उद्देश्य से जापान, अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा आदि देश पहले से ही ब्याज दरों में वृद्धि की घोषणा कर चुके हैं। भारतीय रिजर्व बैंक के पास भी मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के उद्देश्य से रेपो दर में वृद्धि करने के अतिरिक्त और कोई उपाय था भी नहीं। रेपो दर में वृद्धि वित्तीय बाजार में लगाए जा रहे अनुमान के आधार पर ही रही है। भारतीय रिजर्व बैंक ने यह भी स्पष्ट किया है कि निकट भविष्य में रेपो दर में कमी की संभावना अब कम ही है, बल्कि वित्तीय बाजार का अनुमान है कि दिसंबर माह में होने वाली भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति की बैठक में भी संभवतः रेपो दर में 25 आधार बिंदुओं की पुनः वृद्धि की घोषणा की जाएगी।

वैश्विक अस्थिरता से कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव

दरअसल, वैश्विक स्तर पर वित्तीय बाजार में अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है, क्योंकि रूस-यूक्रेन युद्ध, इजराइल-हमास युद्ध, ईरान-अमेरिका युद्ध तो लंबे समय से चल ही रहे थे, अब सऊदी अरब-हूती युद्ध भी छिड़ गया है और इसमें पाकिस्तान एवं तुर्की भी शामिल हो गए हैं। इस सबका विपरीत प्रभाव वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की आपूर्ति पर पड़ा है और कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने लगी हैं, जिससे विश्व के कई देशों में मुद्रास्फीति की स्थिति लगातार गंभीर होती जा रही है। भारतीय रिजर्व बैंक ने वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए भारत में मुद्रास्फीति के अनुमान को बढ़ाया है। पूर्व में वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए भारत में मुद्रास्फीति के 5 प्रतिशत तक रहने का अनुमान लगाया गया था, जिसे अब बढ़ाकर 5.2 प्रतिशत कर दिया गया है।

महंगाई पर नियंत्रण जरूरी, लेकिन ब्याज दरों की भी एक सीमा

मुद्रास्फीति एक गंभीर समस्या के रूप में उभरकर सामने आ रही है। इसे नियंत्रित करना अति आवश्यक है, क्योंकि इसका सबसे अधिक विपरीत प्रभाव गरीब नागरिकों पर पड़ता है। मुद्रास्फीति के लगातार बढ़ने से नागरिकों की क्रय शक्ति कमजोर हो जाती है। पूरे विश्व में लगभग सभी देशों द्वारा मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के उद्देश्य से ब्याज दरों में वृद्धि की जाती है, ताकि नागरिक अपने खर्चों को बढ़ाने के लिए निरुत्साहित हों और इस धनराशि को वे बैंकों में जमा करें। साथ ही, नागरिक बैंकों से ऋणराशि लेने के लिए भी निरुत्साहित हों, क्योंकि ब्याज दर बढ़ने से ऋणराशि पर अब अधिक ब्याज देना होगा। इससे बाजार में उत्पादों की मांग में कमी आती है और उत्पादों की कीमतें कम होने लगती हैं तथा अंततः मुद्रास्फीति पर नियंत्रण स्थापित होने लगता है। परंतु, ब्याज दरों में एक सीमा से अधिक वृद्धि करने से आर्थिक विकास दर विपरीत रूप से प्रभावित होने लगती है।

भारतीय आर्थिक दर्शन में आपूर्ति बढ़ाने पर जोर

प्राचीन भारतीय ग्रंथों में तो मुद्रास्फीति का उल्लेख ही नहीं मिलता है, क्योंकि उत्पादों की पर्याप्त आपूर्ति बाजार में बनाए रखी जाती थी। बल्कि शास्त्रों में उत्पादों के दाम कम होते जाने का उल्लेख जरूर मिलता है। वर्तमान स्थिति बिल्कुल भिन्न है। बाजार में उत्पादों की मांग बढ़ जाती है, परंतु आपूर्ति सुनिश्चित नहीं हो पाती है। इससे इन उत्पादों की कीमतों में वृद्धि दृष्टिगोचर होने लगती है।

प्राचीन भारतीय आर्थिक दर्शन के अनुसार, मूल्य वृद्धि को बाजार में वस्तुओं/उत्पादों की आपूर्ति को बढ़ाकर नियंत्रित किया जाना चाहिए, न कि इन उत्पादों की मांग में कमी करने के प्रयास कर इन वस्तुओं/उत्पादों की कीमतों पर नियंत्रण स्थापित किया जाए। पूंजीवादी व्यवस्था के अंतर्गत ब्याज दर में की गई वृद्धि के कारण बाजार पर होने वाले नकारात्मक प्रभाव को आंकने का प्रयास ही नहीं किया जाता है। यदि उत्पादों की मांग में कमी करने के प्रयास किए जाएंगे तो इन उत्पादों का निर्माण कम होगा। इससे विनिर्माण इकाइयों एवं इन इकाइयों में कार्यरत श्रमिकों पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है। उत्पादन कम होने के चलते विनिर्माण इकाइयों द्वारा बहुत संभव है कि श्रमिकों की छंटनी की जाने लगे। इससे देश में बेरोजगारी फैल सकती है।

मजबूत आर्थिक विकास के बीच ब्याज दर बढ़ोतरी का असर सीमित

परंतु, भारत में इस तरह की समस्या वर्तमान परिस्थितियों में दिखाई नहीं देती है। भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा भी यह संभावना व्यक्त की गई है कि रेपो दर में की गई वृद्धि का भारतीय अर्थव्यवस्था पर विपरीत प्रभाव पड़ने की संभावना लगभग शून्य है, क्योंकि भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा वित्तीय वर्ष 2026-27 में भारत के सकल घरेलू उत्पाद में होने वाली वृद्धि दर को संशोधित कर इसे पूर्व के अनुमान 6.7 प्रतिशत से बढ़ाकर 7.1 प्रतिशत कर दिया गया है। अन्यथा, सामान्यतः ब्याज दरों में वृद्धि का आर्थिक विकास दर पर विपरीत प्रभाव दिखाई देता है।

भारत में आर्थिक विकास दर मजबूत बनी हुई है। हाल के समय में विशेष रूप से विनिर्माण के क्षेत्र एवं सेवा के क्षेत्र में आकर्षक वृद्धि दर दर्ज हुई है। विभिन्न उत्पादों के निर्यात भी तेज गति से बढ़ रहे हैं। निजी क्षेत्र में निवेश भी अब बढ़ने लगा है, जबकि सरकारी क्षेत्र में निवेश तो पहले से ही मजबूत बना हुआ है। बैंकों द्वारा प्रदान की जाने वाली ऋणराशि में अतुलनीय वृद्धि दिखाई दे रही है और वस्तु एवं सेवा कर, आयकर एवं कॉरपोरेट कर के संग्रहण में मजबूत वृद्धि दिखाई दे रही है।

आयातित महंगाई से भी भारत पर दबाव

भारत उपभोग आधारित अर्थव्यवस्था है, अतः स्थानीय स्तर पर निर्मित उत्पादों का बाजार भारत में ही उपलब्ध रहता है। केंद्र सरकार की नीतियों के चलते इन उत्पादों के अन्य देशों से आयात को निरुत्साहित किए जाने के प्रयास किए जा रहे हैं। अन्यथा, यदि इन उत्पादों का आयात आसानी से होने दिया जाए तो संभव है कि इन उत्पादों के साथ मुद्रास्फीति भी आयातित होने लगे, जैसा महंगे कच्चे तेल के आयात से हो रहा है। भारत में बढ़ रही मुद्रास्फीति के लिए कुछ हद तक अन्य देशों से आयातित उत्पादों (स्वर्ण, इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद, कच्चा तेल आदि) की बढ़ी हुई कीमतें भी जिम्मेदार हैं।

अमेरिकी बांड यील्ड बढ़ने से विदेशी निवेश पर दबाव

भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा रेपो दर में 25 आधार बिंदुओं की वृद्धि के निर्णय के पीछे एक और महत्वपूर्ण कारण जिम्मेदार है। दरअसल, अमेरिका के केंद्रीय बैंक यूएस फेडरल रिजर्व ने यूएस फेड दर में वृद्धि की घोषणा की है। इससे अमेरिका में बांड यील्ड में अतुलनीय वृद्धि देखने में आई है। 30 वर्षीय बांड यील्ड बढ़कर 5.60 प्रतिशत के स्तर को पार कर गई है, जो वर्ष 2002 के बाद से सबसे अधिक है। इससे विदेशी संस्थागत निवेशक तेजी से विकास कर रही अर्थव्यवस्थाओं से अपने निवेश को निकालकर अमेरिकी बांड में अपना निवेश बढ़ा रहे हैं। इसके चलते भारत सहित कई देशों की मुद्राओं की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेजी से गिर रही है।

रुपये को मजबूती और विदेशी निवेश आकर्षित करने की चुनौती

अतः अपने देश की मुद्रा को अंतरराष्ट्रीय बाजार में मजबूती प्रदान करने के उद्देश्य से भी कई देशों द्वारा ब्याज दरों में वृद्धि की जा रही है, ताकि विदेशी निवेश को अपने देश में आकर्षित किया जा सके। भारत में रेपो दर में वृद्धि से भारत के बांड बाजार में भी भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी किए जाने वाले बांड पर यील्ड में सुधार होगा, जिससे विदेशी निवेशक भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी किए जाने वाले बांड में अपना निवेश बढ़ा सकते हैं।

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